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Sunday, May 13, 2018

मार्स लैंडर ‘इनसाइट (InSight)’ – मंगल की ओर


इसी माह 5 मई 2018, दिन शनिवार को नासा (NASA) ने अपने बहुप्रतीक्षित नवीनतम मार्स लैंडर –‘इनसाइट (InSight)’ को मंगल ग्रह की ओर प्रक्षेपित किया. अंतरिक्ष यान को एटलस-वी रॉकेट (Atlas-V Rocket) के जरिए कैलिफोर्निया (California) स्थित वंडेनबर्ग वायुसेना अड्डा (Vandenberg Air Force Base) से अंतर्राष्ट्रीय समय शाम चार बजकर 35 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया. 

नासा की समस्त अंतरिक्ष अभियानों और योजनाओं में मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाने का लक्ष्य सर्वप्रमुख है. नासा सहित समस्त मानव जाति का पृथ्वी के बाहर एक और घर (ग्रह) का सपना कब पूरा होगा और होगा भी कि नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा. परन्तु, नासा विश्व के अन्य अन्तरिक्ष संस्थानों और वैज्ञानिकों के साथ इस दिशा में हर संभव प्रयास करने में जुटा हुआ है. 

इस दिशा में नासा के लिए सबसे पहली और बड़ी चुनौती है – मंगल ग्रह पर अन्तरिक्ष यात्री भेजना. मंगल पर किसी भी मानव-अभियान के पहले नासा को अभी इस रहस्यमय लाल-ग्रह के बारे में अनेकों जानकारियाँ ज्ञात करना आवश्यक है और इसी उद्देश्य से – खासतौर से वहाँ आने वाले भूकंप और उसके खतरों की पहचान के लिए इस यान की रचना की गयी है. नासा में इनसाइट अभियान के प्रमुख वैज्ञानिक जिम ग्रीन (Jim Green) के अनुसार अन्तरिक्ष अध्ययनों से यह पता चला है कि मंगल पर अनेकों बार भूकंप और भू-स्खलन की प्रक्रिया हुयी है और उल्का पिंडों के टकराने के भी प्रमाण मौजूद हैं. लेकिन मंगल ग्रह की भूकंप सहने की क्षमता और इससे उस ग्रह पर आने वाले परिवर्तनों को जानना अत्यंत आवश्यक है. इसलिए इस लैंडर में सबसे प्रमुख उपकरण सिस्मोमीटर (Seismometer) है जो भूकंप मापने का उपकरण है. लैंडर के मंगल की सतह पर उतरने के बाद एक ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सिस्मोमीटर को स्थापित करेगा. 

इसमें लगा एक अन्य उपकरण ग्रह की सतह में उष्मा के प्रवाह की निगरानी करेगा. इसके लिए मंगल ग्रह की सतह पर 10 से 16 फुट गहरा सुराख किया जाएगा जो कि पूर्व के अभियानों से काफी ज्यादा गहरा होगा. यह रोबोटिक लैंडर, इसके साथ ही रेडियो तरंगों के माध्यम से मंगल ग्रह की आन्तरिक सतह का पता लगाने का भी प्रयास करेगा.

‘इनसाइट’ का पूरा नाम है – इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टीगेशंस, जियोडेसी एंड हीट ट्रांसपोर्ट  (Interior Exploration using Seismic Investigations, Geodesy and Heat Transport).  और इसे लॉकहीड मार्टिन स्पेस सिस्टम्स (Lockheed Martin Space Systems) ने बनाया है. पहले यह मार्च 2018 में प्रक्षेपित होने वाला था.  सम्पूर्ण परियोजना का व्यय 83 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताया जा रहा है. मंगल ग्रह के मौसम और उसमें होने वाली भू-गर्भीय हलचलों की सटीक जानकारी होने पर ही नासा अपने अन्तरिक्ष यानों और अन्तरिक्ष यात्रियों को इस चुनौतीपूर्ण अभियान के लिए तैयार कर पाने में सक्षम हो पायेगा.  यदि सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो मार्स लैंडर –इनसाइट इस वर्ष 26 नवम्बर 2018 को मंगल ग्रह की धरती पर उतरेगा और भविष्य के द्वार खोलने में सहयोग प्रदान करना शुरू कर देगा...

Friday, July 10, 2015

मंगल का विस्तृत वर्चुअल नक्शा - मार्स ट्रेक (Mars Trek)


अन्तरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए मंगल ग्रह सदा से कौतुहल का विषय बना रहा है. मंगल ग्रह पर वर्त्तमान में कार्यरत विभिन्न अभियानों ने इस दिलचस्पी को और ज्यादा बढ़ा दिया है. 

लोगों की इस लाल ग्रह के प्रति इसी रुचि को देखते हुए नासा ने एक बेहद अद्भुत, ज्ञानवर्धक  और मनोरजक अनुभव पेश किया है – मार्स ट्रेक (Mars Trek). कभी आपने Google Earth का उपयोग किया है. गूगल अर्थ एक सॉफ्टवेर है जो हमारी धरती का नजदीकी चित्र प्रस्तुत करती है. मार्स ट्रेक बिलकुल इसी तरह हमें मंगल ग्रह की धरती का अन्वेषण करने का एक अविस्मरणीय अवसर प्रदान करता है. 


इस टूल की मदद से आप अपने स्मार्ट फ़ोन या कंप्यूटर के ब्राउज़र से मंगल ग्रह की सतह का विस्तृत नजारा देख सकते हैं. इसमें ज़ूम करने का फीचर भी है जिससे आप मंगल के महत्वपूर्ण स्मारक चिन्हों को बेहद हाई डेफिनिशन में देख सकते हैं. इसके 3D फीचर का प्रयोग करके आप ग्रह को चारों ओर घूमा कर भी देख सकते हैं. 

इन सभी खूबियों के अलावा इसमें एक और भी खासियत है कि आप वर्तमान में कार्यरत सभी मार्स ऑर्बिटर की स्थिति का पता भी लगा सकते हैं. 
तो मार्स को और नजदीक से देखने के लिए तैयार हो जाइए इस वर्चुअल मार्स ट्रेक के साथ.
लिंक है -  http://marstrek.jpl.nasa.gov/

Saturday, May 23, 2015

लाल ग्रह मंगल (Mars -The Red Planet)

सौर-परिवार के किसी सदस्य ने अगर वैज्ञानिकों और खगोल-वेत्ताओं के साथ सामान्य जन से लेकर फिल्म, टेलीविज़न, पुस्तकों और चित्रकथाओं
से जुड़े रचनात्मक मन को सबसे ज्यादा रोमांचित किया है, तो वह है हमारा पडोसी ग्रह – मंगल जिसे उसके लाल रंग के कारण ‘लाल-ग्रह’ के नाम से भी जाना जाता है. मंगल ग्रह को अनेकों शताब्दियों से जाना जाता रहा है. रात्रि आकाश में इसे नग्न आखों से भी देखा जा सकता है जो एक चमकते सितारे की तरह दिखाई देता है. लोवेल द्वारा मार्स पर देखी नहरें हों, या मार्स पर नजर आने वाली रहस्यमय चेहरे जैसी आकृति जो फेस ऑन द मार्स के नाम से प्रसिद्ध हो, या उड़न-तश्तरियों की कहानियाँ हों, सबने इस रहस्यमय ग्रह को और भी रहस्यमय बना दिया है.

सूर्य से दूरी के क्रम में चौथा और आकर में सांतवा बड़ा ग्रह मंगल सदा से कौतुहल का विषय रहा है. मंगल ग्रह को अनेकों शताब्दियों से जाना जाता रहा है. रात्रि आकाश में इसे नग्न आखों से भी देखा जा सकता है जो एक चमकते सितारे की तरह दिखाई देता है. वैज्ञानिक इसे पृथ्वी का जुड़वा ग्रह भी मानते हैं. उनके अनुसार इन दो ग्रहों का निर्माण संभवतः साथ ही हुआ था परन्तु पृथ्वी पर जीवन के लायक वातावरण निर्मित हुआ और जीवन की शुरुआत हुयी, वहीँ मंगल का वातावरण कालांतर में जीवन के प्रतिकूल हो गया. लेकिन फिर भी वैज्ञानिकों को आशा है कि मंगल में आज भी जीवन किसी-न-किसी रूप में विद्यमान है इसलिए दशकों से वैज्ञानिक इस ग्रह पर जीवन की संभावनाओं के प्रमाण खोज रहे हैं.

मंगल ग्रह का नाम रोमन मिथकों में युद्ध के देवता मार्स पर रखा गया है. मार्स रोमन मिथकों में कृषि का संरक्षक देवता भी है. यूनान में इसे एरिस के नाम से जाना जाता है जो भी युद्ध का देवता है. मंगल ग्रह पर  आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण यह लालपन लिया हुआ दिखाई देता है, इसलिए इसका एक और नाम लाल-ग्रह (The Red Planet) भी पड़ा है.

आकार में मगल पृथ्वी से छोटा है और सौरमंडल में केवल बुध (Mercury) ग्रह ही उससे छोटा है. परन्तु मंगल पर विस्तृत जलमंडल ना होने की वजह से वहाँ का स्थलमंडल (जमीनी भाग) लगभग पृथ्वी के बराबर है. जलमंडल के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों को पूरा यकीन था कि मंगल में बहता जल और समुद्र होंगे. 1965 में मेरीनर-4 के रूप में मंगल के पहले सफल अभियान में जब यह अन्तरिक्ष यान मंगल के नजदीक पंहुचा तब इसके द्वारा एकत्रित आकड़ों में जल की उपलब्धता के सबूत तो नहीं मिले पर इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिले थे कि अपने जीवन के शुरूआती समय में इसमें पर्याप्त मात्रा में जल था होगा. यह बात जहां वैज्ञानिकों को निराश कर गयी, वहीँ एक उम्मीद भी जगा गयी कि शायद मंगल में सतह के नीचे पानी हो और इस जल और संभावित जीवन की खोज में इसके पश्चात अनेक अभियान मंगल के अध्ययन के उद्देश्य से छोड़े गए, जो आज भी लगातार जारी है.

मंगल के प्रति विज्ञान-जगत की दीवानगी का आलम इस बात से भी पता किया जा सकता है कि अभी तक के किसी भी ग्रह के आधार पर सर्वाधिक अभियान मंगल को ध्यान में रख कर किये गए हैं और वर्तमान में एक या दो नहीं वरन पुरे सात अन्तरिक्ष यान मंगल के अध्ययन में सक्रीय हैं. इनमे से पांच 2001 मार्स ओडिसी (2001 Mars Odyssey), मार्स एक्सप्रेस ( Mars Express), मार्स रिकोनासांस ऑर्बिटर (Mars Reconnaissance Orbiter), मेवन (MAVEN) and मंगलयान या मार्स मिशन ऑर्बिटर (Mars Orbiter Mission) इसकी परिक्रमा कर रहे हिं और दो इसकी सतह पर कार्यरत हैं – मार्स एक्स्प्लोरर रोवर अपोर्च्यूनिटी (Mars Exploration Rover Opportunity) और मार्स साइंस लेबोरेटरी क्यूरोसिटी (and the Mars Science Laboratory Curiosity)
मंगल ग्रह पर लेख अभी जारी है...जल्द ही आगे का लेख उपलब्ध होगा...

Thursday, December 19, 2013

मंगल पर लगी अंतरिक्ष यानों की भीड़

भारत के पहले अंतरग्रहीय अभियान मंगलयान के कारण हमारा लाल ग्रह चर्चा में है, परन्तु वास्तविकता ये है कि इस समय अनेक अंतरिक्ष खोजी यान मंगल की कक्षा में उपस्थित हैं या उस ओर प्रशस्त हैं. पत्रिका में प्रकाशित ये चित्र उनकी एक झलक बेहद ख़ूबसूरती से प्रस्तुत करती है. 

©2013, Rajasthan Patrika Group

यिन्गहुओ 1 (Yinghuo-1) - चीन का प्रथम मंगल अभियान, फोबोस ग्रन्ट (Phobos Grunt)

यिन्गहुओ - 1 (YINGHUO - I )
फोबोस ग्रन्ट (Phobos Grunt )
यिन्गहुओ, चीन के द्वारा मंगल ग्रह के अध्ययन और अन्वेषण के उद्देश्य से छोड़ा गया प्रथम अंतरिक्ष प्रोब था. इसे कजाखस्तान के बैकोनुर कोस्मोड्रम से रूसी फोबोस ग्रन्ट सैंपल रिटर्न (मंगल के उपग्रह फोबोस के अध्ययन के उद्देश से) नामक अन्तरिक्ष यान के साथ-साथ 8 नवम्बर 2011 को प्रक्षेपित किया गया था. इस मिशन के प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार यिन्गहुओ को 2 वर्षों तक मंगल की परिक्रमा करनी थी तथा मंगल ग्रह की धरातलीय संरचना, वातावरण, आयनोस्फीयर और चुम्बकीय क्षेत्र का अध्ययन करना था. प्रक्षेपण के पश्चात् फोबोस ग्रन्ट को दो बार ईंधन जलन की प्रक्रिया पूर्ण करनी थी जिससे ये दोनों यान धरती के गुरुत्वाकर्षण से निकलकर मंगल की ओर निकल सकें. परन्तु दुर्भाग्यवश यह संभव नहीं हुआ और दोनों प्रोब्स कक्ष में ही उलझे रह गए. 17 नवम्बर को यिन्गहुओ को चीन की अंतरिक्ष संस्था द्वारा असफल घोषित कर दिया गया और 15 जनवरी 2012 को ये दोनों प्रोब्स धरती के वातावरण में पुनः दाखिल हुए और प्रशांत महासागर के ऊपर नष्ट हो गए.

यिन्गहुओ का अर्थ है – झिलमिलाता ग्रह जो कि मंगल ग्रह के लिए प्रयुक्त प्राचीन चीनी नाम है. यिन्गहुओ और फोबोस ग्रन्ट, चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन और रसियन स्पेस एजेंसी का संयुक्त अभियान था जिसके लिए 26 मार्च 2007 को दोनों संस्थाओं के मध्य एक समझौता हुआ था.

यिन्गहुओ – 1 का प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य मंगल ग्रह के प्लाज्मा वातावरण और चुम्बकीय क्षेत्र की विस्तृत छानबीन करना, मंगल ग्रह में आयनों के छूट भागने की प्रक्रिया और उसके कारण की जांच करना तथा मंगल ग्रह पर चलने वाली धुल भरी आँधियों का निरीक्षण करना था.
इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु इस प्रोब में चार उपकरण थे जिसमे एक प्लाज्मा पैकेज (जिसमे इलेक्ट्रान एनालाइजर, आयन एनालाइजर और मॉस स्पेक्ट्रोमीटर शामिल थे), फ्लक्सगेट मैग्नेटो मीटर, एक रेडियो  ओकल्टेशन साउंडर और एक ऑप्टिकल इमेजिंग सिस्टम लगे थे.
अगर यह मिशन सफल होता तो मंगल के बारे में हमारे ज्ञान में अवश्य वृद्धि होती परन्तु एक छोटी सी तकनिकी खराबी के कारण यह मिशन पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से ठीक तरह से आजाद नहीं हो पाया और एक शानदार मिशन का आगाज़ होते ही अंत हो गया.

Thursday, November 14, 2013

मंगल यान - कक्षा उन्नयन के पांच चरण संपन्न

मंगल यान - प्रक्षेपण के दौरान
भारत के बहुप्रतीक्षित और महत्वाकांक्षी मंगल यान परियोजना की कक्षीय दूरी बढाने की प्रथम तीन सफल प्रयत्नों के पश्चात् 10  नवम्बर को किया गया कक्षा उन्नयन की प्रक्रिया ईंधन के रिसाव की तकनीकी गड़बड़ी की वजह से अपूर्ण या आंशिक सफल रही.

मंगल यान के प्रक्षेपण के समय 1 दिसम्बर को पृथ्वी की कक्षा छोड़कर इसे मंगल की ओर रवाना करने से पहले कुल 6 कक्षा उन्नयन अभियान प्रस्तावित किये गए थे जिनके लिए 6, 7, 8, 10, 11, 16 नवम्बर की तिथि निर्धारित थी. इस प्रक्रिया का उद्देश्य था कि धरती के गुरुत्वीय बंध से निकलने के लिए आवश्यक एस्केप वेलोसिटी (11.2 km/s) को धीरे धीरे प्राप्त करना, जिसके पश्चात इसे मंगल की दिशा में रवाना किया जाए. प्रथम तीन सफल चरणों के पश्चात चौथा अभियान तकनीकी गड़बड़ी की वजह से अधूरा रह गया जिसे पूरा करने के लिए एक पूरक अभियान के तहत चौथे अभियान हेतु निर्धारित १ लाख किलोमीटर की एपोगी का लक्ष्य प्राप्त किया गया.  

प्रस्तुत है संपन्न चरण – सक्षेप में

प्रथम  कक्षा उन्नयन –

प्रथम कक्षीय उन्नयन अभ्यास 6 नवम्बर 2013 को किया गया जिसमे 440 न्यूटन तरल ईंधन के दहन के साथ अंतरिक्ष यान को 416 सेकंड में 28,825 किलोमीटर की एपोगी तक ले जाया गया वहीँ पेरोगी को 252 किलोमीटर रखा गया.

द्वितीय कक्षा उन्नयन –
द्वितीय कक्षा उन्नयन अभ्यास  7 नवम्बर 2013 को किया गया जिसमे अंतरिक्ष यान को 570.6 सेकंड में 
40,186  किलोमीटर की एपोगी तक ले जाया गया

तृतीय कक्षा उन्नयन –
प्रथम कक्षीय उन्नयन अभ्यास 8 नवम्बर 2013 को सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया जिसमे अंतरिक्ष यान को 707 सेकंड में 71636 किलोमीटर की एपोगी तक ले जाया गया.


चतुर्थ कक्षा उन्नयन -
10 नवम्बर को किये गए चतुर्थ अभ्यास में तरल ईंधन में रिसाव की वजह से प्रस्तावित 135 m/s की गति के स्थान पर केवल 35 m/s की गति प्राप्त हो पाई जिसका कारण तरल एपोगी मोटर के द्वारा ईंधन का पूर्ण दहन न हो पाना बताया गया. इस तकनीकी खराबी के कारण लक्षित 1 लाख किलोमीटर की एपोगी के स्थान पर अन्तरिक्ष यान को केवल 78276 किलोमीटर की एपोगी तक पहुचाया जा सका, जो की तीसरी प्रयत्न में प्राप्त एपोगी से केवल थोड़ी ही ज्यादा थी.


पंचम कक्षा उन्नयन (पूरक)
चतुर्थ कक्षा उन्नयन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक अनिर्धारित अभियान के तहत 12 नवम्बर 2013 को एक पूरक प्रयत्न के रूप में पांचवी बार कक्षा उन्नयन किया गया और एपोगी को सफलतापूर्वक 1,18,642 किलोमीटर की एपोगी तक लाया गया.

अगला अभियान अब 16 नवम्बर 2013 को प्रस्तावित है. अगर सब ठीक रहा तो अब केवल आखिरी उन्नयन कार्य 1 दिसम्बर को किया जाएगा और मंगल यान लाल ग्रह की ओर अपनी लम्बी यात्रा पर निकल पड़ेगा.

Thursday, November 7, 2013

मंगलयान - कक्षीय दूरी बढाने की पहली प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूर्ण

भारत देश के पहले अंतरग्रहीय मिशन के तहत मंगलवार को श्रीहरिकोटा से मंगल ग्रह के लिए सफल रूप से प्रक्षेपित मंगल यान करीब 25 दिनों तक पृथ्वी की कक्षा की परिक्रमा करेगा, लेकिन इस दौरान यह एक बार भी भारत के ऊपर से नहीं गुजरेगा.

मंगल यान से जुड़ी नवीन जानकारी के अनुसार मंगल यान को पृथ्वी की कक्षा से निकालकर मंगल की कक्षा में स्थापित करने की दिशा में पहली प्रक्रिया पूरी कर ली गयी है. इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से प्राप्त जानकारी के अनुसार बुधवार रात 1:17 बजे कक्षीय दूरी बढाने की पहली प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है. कक्षीय दूरी बढाने की यह प्रक्रिया पीनिया स्थित इसरो टेलीमेट्री ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (इसट्रैक) से पूरी की गई. कक्षीय दूरी बढाए जाने के बाद अब मंगल यान की पृथ्वी से अधिकतम दूरी (एपोगी) बढ़कर 28825 किलोमीटर और न्यूनतम दूरी (पेरिगी) 252 किलोमीटर हो गयी है. इस प्रक्रिया में 440 न्यूटन तरल इंधन जलाया गया और पूरी प्रक्रिया 416 सेकंड में पूरी हुयी. इसरो के अधिकारियों के अनुसार मंगल की ओर प्रस्थान करने से पहले पांच बार और इसकी कक्षीय दूरी बढ़ाई जानी है.

अंतिम कक्षीय परिवर्तन के बाद तब मंगल यान की पृथ्वी से एपोगी २ लाख किलोमीटर हो जायेगी, जिसके बाद 1 दिसम्बर को उसे लाल ग्रह की और रवाना कर दिया जाएगा. अपनी 300 दिनों की यात्रा में लगभग 40 करोड़ किलोमीटर का सफ़र तय करके यह यान लाल ग्रह पर पहुचेगा, जहां इसे मंगल की कक्षा में स्थापित किया जाएगा. यही सबसे ज्यादा जोखिम भरा भाग है क्योंकि अगर सब ठीक न रहा तो मंगल का गुरुत्वाकर्षण इस खींचकर अपने में समा लेगा.