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Sunday, January 31, 2021

पाँच ग्रहों वाले तारे (HD 108236) की दुर्लभ खोज - सेंटौरस तारासमूह में

असीम और अनंत ब्रम्हाण्ड में खरबों या शायद उससे भी ज्यादा तारे होंगे. अपने आकार, ऊर्जा, परिक्रमा और जीवन की अवस्थाओं में विभिन्नता के साथ ये सभी तारे अपनी आकाशगंगाओं को प्रदीप्त कर रहे हैं. इन तारों में से बहुत से तारे अपनी विशेषताओं में हमारे सूर्य की तरह हैं, जो हमारे खगोलविदों को आकर्षित करते हैं. ग्रहों से परिपूर्ण ये तारक-ग्रह प्रणाली हमें ऐसी जानकारी देने की उम्मीद जगाते हैं जिससे वैज्ञानिकों को ग्रहों के निर्माण के बारे में बेहतर तौर पर पता चल सकता है. 

HD 108236 तारा और उसका परिवार 
ठीक ऐसे ही एक तारा और उसका परिवार वैज्ञानिकों ने हमसे 211 प्रकाशवर्ष दूर खोज निकाला है. HD 108236 नामक यह नक्षत्र सेंटौरस (Centaurus) तारासमूह में स्थित है. इसे अलग-अलग नामों जैसे TOI-1233, TIC 260647166, और HIP 60689 से भी जाना जाता है. हमारे सूर्य से मिलते इस तारे के परिवार में पांच ग्रह हैं जो इसका चक्कर लगा रहे हैं. प्राप्त आकंड़ों की गणना के मुताबिक यह सूर्य से 12 प्रतिशत छोटा है और उसका भार भी 13 प्रतिशत कम है.

2020 में नासा के ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) की मदद से  इस तारे के चार बड़े ग्रहों की खोज हुई थी. इसका सबसे आंतरिक ग्रह HD 108236b एक गर्म सुपर अर्थ की श्रेणी में आता है. इसका व्यास हमारी पृथ्वी का 1.6 गुना है. यह ग्रह अपने तारे का केवल 3.9 दिन में ही एक चक्कर लगा लेता है जिसकी वजह से यह अपनी सौर प्रणाली का सबसे गर्म ग्रह है. इसका तापमान 826 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.

नासा का ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) उपग्रह 


इसके अलावा शेष तीन बड़े ग्रह बाह्य ग्रह हैं जिनके नाम क्रमशः HD 108236c, HD 108236d HD और 108236e  हैं. ये तीनों ही नेप्च्यून के जैसे गैसीय दानव ग्रह हैं. ये ग्रह क्रमशः अपने तारे के 6. 2 दिन, 14.2 दिन और 19.6 दिन में एक चक्कर लगाते हैं. की अगुआई में यह शोध जर्नल एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में प्रकाशित होने  जा रहा है.

बाद में किये गए अध्ययन में इस प्रणाली में एक और ग्रह का पता चला जिसका भर प्रथ्वी के भार का दोगुना है.HD 108236f नाम का यह ग्रह तारे का एक चक्कर 29.5 दिनों में लगा लेता है. इस पांचवे ग्रह की खोज के साथ या ऐसा तीसरा सौर परिवार हो गया है जिसमें पांच या अधिक ग्रह हैं.

ऑस्ट्रियन एकेडमी और साइंसेस के स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ एंड्रिया बोनफेंटी, जो इस शोध दल के प्रमुख हैं उनके अनुसार, “टेस के मापन से पता चला कि अंदर वाला ग्रह त्रिज्या के गैप में आता है. जबकि तीन बड़े बाहरी ग्रह गैसीय आवरणों वाले ग्रहों की तरह हैं इससे इस सिस्टम का अध्ययन वायुमंडलीय विकास के शोध के लिहाज से बहुत उपयोगी हो सकता है.”

Tuesday, January 26, 2021

भारतीय उपग्रह एस्ट्रोसैट (Astrosat) ने खोजा दुर्लभ तारों का समूह

 


गत वर्ष सितम्बर में भारत ने अन्तरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में लम्बी छलांग लगाते हुये अपना पहला बहु-तरंगदैधर्य अंतरिक्ष उपग्रह (Multi-Wavelength Space Satellite) स्थापित किया था. इस उपग्रह का नाम एस्ट्रोसैट (Astrosat) रखा गया है. इस एस्ट्रोसैट की सहायता से हमारे खगोलविदों ने हमारी आकाशगंगा में गोलाकार तारासमूह की खोज की है. इस वृहद् तारापुंज को वैज्ञानिक जगत में ‘ब्रह्माण्ड के डायनासोर’ की उपाधि दी गयी है.

 

अन्तरिक्ष विभाग की जानकारी के अनुसार इस तारा समूह में बड़ी संख्या में ऐसे तारे हैं जो गर्म पराबैंगनी विकिरण के साथ चमकते हैं. ऐसे तारे ब्रम्हाण्ड में बहुत कम ही देखे गए हैं. इस गोलाकार तारापुंज में ऐसे करीब 34 पराबैंगनी चमकीले तारे खोजे गए हैं.  वैज्ञानिकों के दल ने इन तारों के सतह के तापमान, चमक जैसे गुणों का पता लगाया. इन तारों का केंद्र पूरी तरह से खुला हुआ है और इसके कारण ही ये बहुत गर्म बन गए हैं. ये तारे सूर्य जैसे तारों के अंतिम अवस्था में हैं.

ऐसे तारपुंज खगोलविदों के लिए विशेष प्रयोगशाला मानी जाती हैं क्योंकि ऐसे पुंजों में जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के तारे एक साथ अध्ययन हेतु उपलब्ध होते हैं. जहाँ कुछ तारे अभी अपने शैशवकाल में हैं तो कुछ अंतिम अवस्था में.

एस्ट्रोसैट से प्राप्त आंकड़ों और चित्रों को भारत के विज्ञान और तकनीकी विभाग के इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के खगोलविदों ने गहरा अध्ययन किया और गर्म पराबैंगनी चमकीले तारों को तुलनात्मक रूप से ठंडे लाल दानव तारों और अन्य अवस्थाओं के तारों से अलग किया. शोधकर्ता दल के वैज्ञानिक श्री सुब्रमण्यम के अनुसार पराबैंगनी चमकीले तारों में से एक हमारे सूर्य से 3000 गुना ज्यादा चमकीला है तथा उसकी सतह का तापमान एक लाख केल्विन है.

अध्ययन में पाया गया कि प्राप्त गर्म पराबैंगनी विकिरण वाले तारों में ज्यादातर तारों में बाहरी परत नहीं के बराबर होती है और वे जीवन की अंतिम प्रमुख उपगामी दैत्याकार अवस्था या एसिम्प्टोटिक जायंट अवस्था से नहीं गुजरते बल्कि सीधे ही सफेद बौने तारे बन जाते हैं.

Saturday, August 5, 2017

ब्रम्हांड के सबसे छोटे सितारे की खोज

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमण्डल के शनि ग्रह जितने आकार के सितारे की खोज हमसे 600 प्रकाशवर्ष दूरी पर की है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सबसे छोटे आकार का सितारा है जिससे छोटा सितारा सैद्धांतिक रूप से संभव नहीं है।




इंग्लॅण्ड में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के इस तारे को पृथ्वी से करीब ६०० प्रकाशवर्ष की दूरी पर खोज निकाला है. यह सितारा हमारी अपनी आकाशगंगा में स्थित है. अभी इसका नाम EBLM J0555-57Ab रखा है. उन्होंने इसकी खोज की जब यह अपने से अधिक बड़े पिंड के सामने से गुजरा था.

इस सितारे की सबसे खास बात यही है कि यह उतना ही छोटा है जितना कोई सितारा हो सकता है. इसका द्रव्यमान ठीक उतना ही अनुमानित है जितने में हाइड्रोजन का हीलियम में संविलियन हो सके. अगर यह थोड़ा सा भी और छोटा होता तो इसमें यह प्रक्रिया संभव ही नहीं हो पाती और यह कभी भी दीप्तमान नहीं हो पाता.

Monday, September 23, 2013

तारों की जीवन गाथा (NCERT)

रात को आसमान में चमकते हुए तारे दिल और आँखों को जितना सुकून पहुचाते हैं उतना ही जिज्ञासु मन को उलझन और कौतुहल से भर देते हैं. 


तारों की इसी रहस्यमय और अलौलिक दुनिया को हमारे सामने लाती यह दिलचस्प किताब तारों के जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक के सफ़र तक हमें सरल हिंदी भाषा में ले जाती है. 
  
पुनः राजेश भाई का एक और अनमोल  प्रयास.

जयंत विष्णु नार्लीकर द्वारा लिखित और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा प्रकाशित एक शानदार पुस्तक