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Saturday, November 30, 2019

धरती से सबसे दूर आकाशीय पिंड - अरोकोथ (Arrokoth)



अल्टिमा थुले या आराकोथ 
अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान का न्यू होराइजन्स (New Horizons) अपने नाम को चरितार्थ करता हुआ नए क्षितिज का निर्माण कर रहा है. 2006 में प्लूटो के अध्ययन के लिए छोड़े गये अन्तरिक्ष यान ने इस वर्ष के प्रारंभ में हमसे सबसे दूर स्थित आकाशीय पिंड की खोज की थी. उस समय इसे अल्टिमा थुले (Ultima Thule) का नाम दिया गया था. यह बर्फीला पिंड अल्टिमा थुले प्लूटो से भी करीब एक बिलियन मील (1.6 बिलियन किलोमीटर) मील दूर है. 16 किमी लम्बे और 32 किमी चौड़ाई वाले इस पिंड के बारे में नासा के प्रबंधक जिम ब्रिडेंस्टाइन का मानना है कि अल्टिमा थुले में उन अंशों को पाया गया है, जिससे सौर मंडल का निर्माण हुआ है.

हाल में हमसे लगभग 6 बिलियन मील दूर खोजे गए पिंड को अरोकोथ (Arrokoth) का आधिकारिक नाम दिया गया है. देसी अमेरिकी भाषा में इसका मतलब आकाश होता है. इस सम्बन्ध में साउथवेस्ट रिचर्स इंस्टीट्यूट के मुख्य वैज्ञानिक एलन स्टर्न के अनुसार, 'अरोकोथ नाम आसमान (यानी ऊंचाई) की ओर देखने को प्रेरित करता है. साथ ही ये शब्द तारों की दुनिया के बारे में और जानने की उत्सुकता को दर्शाने वाला भी है. यह सौर मंडल के सबसे बाहरी क्षेत्र के कुइपर बेल्ट में स्थित है.'

Sunday, May 27, 2018

बीस अरब सूर्य इतना बड़ा ब्लैक होल!!!

चित्रकार की कल्पना में ब्रम्हांड में स्थित ब्लैक-होल

ब्लैक होल या कृष्ण-विविर, अन्तरिक्ष के सबसे अबूझ पहेलियों में से एक हैं. हमें ये तो पता है कि ये वो पिंड हैं जिनका घनत्व बहुत अधिक होता है और अपने अति-शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण के कारण ये अपने आस-पास की समस्त चीजों को हमेशा के लिए अपने अन्दर समा लेते हैं. प्रकाश तक एक बार यही इसके अन्दर चला जाए तो वापस नहीं आ सकता है. इसी खतरनाक और रहस्यमय ब्लैक होल की खोज की कड़ी में एक नया और अद्भुत अध्याय जुड़ा है. 

आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के खगोल वैज्ञानिकों के यूरोपियन स्पेस एजेंसी के आंकड़ों की अध्ययन से किये गए नवीन  खोज पर यकीन किया जाए तो उन्होंने एक ऐसे ब्लैक होल का पता लगाया है जिसका आकार हमारे सूर्य से कम-से-कम २० अरब ज्यादा बड़ा है यानि इसके अन्दर हमारे सूर्य जैसे २० अरब तारे समाहित हो सकते हैं. रोजाना तेज रफ़्तार से बढ़ता यह ब्लैक होल हर दुसरे दिन हमारे सूर्य जितने बड़े खगोलीय पिंड को निगल रहा है और अपना वजूद बढ़ाते चला जा रहा है. अनुमान के अनुसार यह प्रत्येक दस वर्ष में 1% की दर से बढ़ रहा है. 

 
आकाशगंगा के पिंडों को निगलता ब्लैक होल
इतनी अधिक मात्रा में खगोलीय पिंडों को निगलते वक़्त घर्षण और तेज रफ़्तार के कारण उत्पन्न गर्मी से इतनी अधिक मात्रा में प्रकाश उत्पन्न हो रहा है इसके एक्रियेसन बेल्ट में कि यह हमारी सम्पूर्ण आकाशगंगा की तुलना में हजारों गुना अधिक उज्जवल है. यदि यह हमारी आकाशगंगा में आ जाए तो चाँद से कई गुणा ज्यादा चमकदार होगा और इसके प्रकाश में कोई भी तारा दिखाई नहीं देगा.

हालांकि खगोल वैज्ञानिकों का ये भी मानना है कि इस तरह के ब्लैक होल असामान्य हैं और बेहद संख्या में बेहद नगण्य हैं. इतने विशालतम आकार को देखते हुए उनका यकीन है कि ये ब्रम्हांड के शुरुआत से ही विद्यमान होंगे. अभी यह नया ब्लैक होल पृथ्वी से काफी दूर है परन्तु यदि यह आकाशगंगा में भी आ गया तो भी यह कई सारे तारों को निगलने में इसे कुछ ही समय लगेगा. साथ ही इससे प्रचुर मात्रा में निकलने वाली पराबैंगनी किरणें तथा एक्स-रे से पृथ्वी का जीवन भी संकट में आ जाएगा. 

अभी अध्ययन अपने शुरूआती स्तर पर है पर वैज्ञानिक बेहद बेचैनी से इसके बारे में ज्यादा जानने जुटे हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास  है कि यह ब्लैक होल के बारे में उनकी जानकारी को समृद्ध करेगा.

Saturday, August 5, 2017

मंगल ग्रह का नियाग्रा फॉल (जलप्रपात)




धरती के वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल और आशाओं के प्रतीक मंगल ग्रह की नासा ने कुछ तस्वीरें विगत दिनों जारी की हैं जिसमें नियाग्रा जलप्रपात की तरह का एक विशाल झरना नजर आ रहा है. वैसे यहाँ दो बातें जरूरी है - एक यह कि यह झरना पानी से नहीं बल्कि पिघले हुए लावा की वजह से बना हुआ है. दूसरा कि यह झरना सक्रिय नहीं है. वैज्ञानिकों के अनुसार एक समय मंगल पर लावा बहता रहता था, उसी लावे के प्रवाह के निशान इस सूखे झरने में देखे जा सकते हैं.

2005 में मंगल ग्रह पर भेजे गए यान MRO ने ये तस्वीरें भेजी हैं। यह यान पिछले काफी समय से मंगल की तस्वीरें भेज रहा है। नासा ने कहा कि मंगल पर पानी की तलाश में काफी समय खर्च किया गया है। अगर यहां पानी मिलता है, तो यह जीवन की मौजूदगी का संकेत होगा। अब ये नई तस्वीरें बताती हैं कि एक समय में मंगल आज की स्थितियों के मुकाबले ज्यादा जीवंत हुआ करता था। मंगल की सतह पर फैला पिघला हुआ लावा इसी बात का संकेत करता है। ये तस्वीरें उसी लावा प्रवाह का नतीजा दिखाती हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी नई गैलक्सी 'सरस्वती'



अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हमारा देश भारत लगातार नयी सफलताओं के साथ विश्व के चुनिन्दा देशों में शामिल हो चूका है. इसी कड़ी में पहली बार भारत में वैज्ञानिकों की एक टीम ने अब तक की सबसे बड़ी आकाशगंगाओं यानि गलाक्सियों एक बड़ा समूह खोजने का दावा किया है जिसे सुपरक्लस्टर (एक क्लस्टर में लगभग 1000 से 10,000 गैलेक्सी होती हैं। एक सुपरक्लस्टर में 40 से 43 क्लस्टर शामिल होते हैं) भी कहा जाता है। यह गैलक्सी पृथ्वी से 400 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर बताई जा रही है और इसका आकार 200 लाख अरब सूरजों के बराबर बताया जा रहा है। उनकी गणना के मुताबिक यह आकाशगंगा दस अरब साल पुरानी होनी चाहिए. इस गैलक्सी को वैज्ञानिकों ने 'सरस्वती' नाम दिया है।

पुणे के इंटरयूनिवर्सटी सेंटर फॉर एस्ट्रॉनोमी ऐंड एस्ट्रोफिजिक्स और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों के दल ने यह खोज की है। इस संस्थान के वैज्ञानिक पिछले वर्ष गुरुत्वाकर्षीय तरंगों की बड़ी खोज में भी शामिल थे। साइंटिस्ट्स के मुताबिक यह गैलक्सी समूह काफी चमकदार है।

जेम्स वेब अन्तरिक्ष दूरबीन James Webb Space Telescope (JWST)


अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अमेरिकी अतरिक्ष संस्था नासा यूरोपीयन स्पेस एजेंसी और कैनेडियन स्पेस एजेंसी के साथ मिलकर नए युग के लिए जेम्स वेब अन्तरिक्ष दूरबीन James Webb Space Telescope (JWST) का निर्माण कर रहा है (पहले इसका नाम नेक्स्ट जनरेशन स्पेस टेलिस्कोप रखा गया था). इस निर्माणाधीन दूरबीन की अगले साल अक्टूबर २०१८ में पूर्ण होने की सम्भावना है. जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप जैसे अन्य मिशनों की वैज्ञानिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए डिजायन किया गया है.

अत्याधुनिक यह दूरबीन अन्तरिक्ष में और दूर तक झांकने में अभूतपूर्व सहयोग प्रदान करेगी. इसका रिजल्युसन और संवेदनशीलता अत्यधिक बेहतरीन है. जहाँ हबल टेलिस्कोप का व्यास 2.4 मीटर है वहीँ यह दूरबीन 6.५ मीटर व्यास की है. 

नासा की यह जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन हाल में खोजी गई 'ट्रैपिस्ट-1' ग्रह प्रणाली के पृथ्वी के आकार के ग्रहों और बृहस्पति ग्रह के उपग्रह 'यूरोपा' पर जीवन के संकेत खोजेगी.

वाशिंगटन में नासा मुख्यालय में जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन के निदेशक एरिक स्मिथ ने कहा कि यह दूरबीन हमारे ब्रहमांड में कुछ अतुलनीय चीजों को खोजेगी. 2100 से अधिक प्रस्तावित शुरुआती अवलोकन के साथ आगे भविष्य में यह दूरबीन अन्तरिक्ष में गहरे देखकर अनगिनत आश्चर्यों को सामने लाएगी.

पहले एसएलएस रॉकेट प्रक्षेपण में अंतरिक्षयात्री नहीं भेजेगा नासा


नासा अपने बहुप्रतीक्षित और महत्वकांक्षी योजना के अंतर्गत स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) रॉकेट और ओरियन अंतरिक्षयान की पहली एकीकृत उड़ान में अंतरिक्षयात्रियों को नहीं भेजेगा. यह प्रक्षेपण इंसानों को सुदूर अंतरिक्ष और फिर मंगल पर ले जाने वाले अन्वेषण अभियानों का हिस्सा है. फरवरी में नासा ने अपने अन्वेषण अभियान-1 या ईएम-1 के लिए एसएलएस रॉकेट और ओरियन के पहले प्रक्षेपण में चालक दल को भेजने की व्यवहार्यता परखने का प्रयास शुरू किया था.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि आंकड़ों को मापने और सभी परिणामों के आकलन के बाद नासा पहले प्रक्षेपण के लिए मूल योजना पर काम करना जारी रखेगा. इसके तहत एकीकृत प्रणालियों का उड़ान परीक्षण चालक दल के बिना किया जाना है. नासा ईएम-1 अभियान के लिए प्रक्षेपण तिथि को वर्ष 2019 में रखने के लिए प्रयासरत है. 

इस वर्ष अक्टूबर में निकट से गुजरेगा रहस्यमय क्षुद्र ग्रह

(वैश्विक निगरानी नेटवर्क की क्षमता जांचेगी नासा)


पृथ्वी पर जीवन करोड़ों वर्ष पहले आया था परन्तु हर चीज की तरह यह भी हमेशा नहीं रहेगा. असीमित अन्तरिक्ष में घुमते अनगिनत पिंड गाहे-बगाहे हमारे धरती के समीप आ जाते हैं. पुच्छल तारे (धूमकेतु) और क्षुद्र ग्रहों के रूप में पृथ्वी पर खतरा बना ही रहता है. अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था नासा और विश्व के अन्य सभी अन्तरिक्ष संस्थान अपनी वेधशालाओं से इन संभावित खतरों पर नजर रखे रहती हैं.

इस वर्ष भी अर्थात 2017 में भी 10 मीटर से 30 मीटर के आकार का एक क्षुद्र ग्रह पृथ्वी के नजदीक से गुजरेगा. यह 12 अक्टूबर को पृथ्वी के करीब से गुजरेगा और वैज्ञानिक इस बात से सुनिश्चित है कि यह पृथ्वी की सतह से 6,800 किमी से अधिक निकट नहीं आएगा. यह क्षुद्रग्रह 2012 से दूरदर्शी के रेंज से बाहर चल रहा है.

इसे ध्यान में रखते हुए नासा अपने वेधशालाओं के नेटवर्क को परखने के लिए इस क्षुद्रग्रह की मदद लेने की योजना बना चूका है. यह नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय पहलू के उपयोग के लिए मिलकर निगरानी के अभियान का एक बेहतरीन मौका है. यह परिक्षण पृथ्वी के पास से गुजरने वाली हरेक संभावित खतरे पर नजर रखने और आपात स्थिति में उससे निपटने की तैयारी करने में मददगार साबित होगा.

वैसे यह एक सामूहिक प्रयास है, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा वेधशालाएं, विश्वविद्यालय और दुनिया भर की प्रयोगशालाएं शामिल हैं, जिसमें सामूहिक रूप से पृथ्वी के पास वस्तु पर निगरानी की क्षमताओं व सीमाओं को जानने और उन्हें और सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया जाएगा.

Wednesday, February 22, 2017

पृथ्वी सदृश्य सात नए ग्रहों की खोज



अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने सौर परिवार से बाहर एक या दो नहीं बल्कि पूरे नौ नए ग्रहों की खोज की घोषणा की है जो हमारी पृथ्वी के सदृश्य हैं, और इनमें से तीन तो अपने तारे से जीवन की प्रबल संभावनाओं इतनी दूरी (ऐसी दूरी जहाँ पर तरल रूप में द्रव कठोर धरातल के ऊपर स्थित हो, और ग्रह न तो ज्यादा गर्म हो और ना ही ज्यादा ठंडा जैसे हमारी अपनी धरती) पर स्थित हैं ये सभी ग्रह त्रेपिस्ट - 1 (TRAPPIST - I) नाम के तारे का चक्कर लगा रहे हैं. 

अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले दस वर्षों में शायद हम किसी एलियन (परग्रही) सभ्यता का पता लगा सकें, तब तक रोमांचित रहिये...

Friday, December 30, 2016

चीन - चाँद के सुदूर क्षेत्र में जाने वाला पहला देश!

विगत वर्षों में चीन ने अपने अन्तरिक्ष अनुसन्धान कार्य में तेजी लायी है और चाँद पर जाने वाले चुनिन्दा देशों की कतार में खड़ा हो चूका है. परन्तु विगत दिनों चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अन्तरिक्ष योजना के अंतर्गत घोषणा की है कि वह चाँद के धरती से नजर ना आने वाले सुदूर या अँधेरे क्षेत्र (धरती से हम चाँद का केवल एक हिस्सा देख पाते हैं, दुसरे भाग की तस्वीर हमें अन्तरिक्ष में भेजे विभिन्न अभियानों से ही प्राप्त हुयी है)  में जाने का इच्छुक है और उसने 2018 के लिए प्रस्तावित इस अभियान की व्यापक तैयारियां भी प्रारंभ कर दी है. 

चाँद पर वैसे तो दर्जनों अभियानों के तहत विभिन्न अन्तरिक्ष यान (मानव रहित और मानवीय ) भेजे जा चुके हैं, परन्तु अगर चीन अपने अभियान में सफल हुआ तो वह ऐसा करने वाले विश्व का प्रथम देश बन जाएगा क्यूंकि अभी तक किसी भी अभियान में चाँद के सुदूर क्षेत्र में अन्तरिक्ष यान नहीं उतारा गया है. 

इस प्रस्तावित लूनर प्रोब का नाम चैंग-इ- 4 (Chang'e-4) रखा गया है. चीन अन्तरिक्ष में यान भेजने और उन्हें पुनः वापस लाने की तकनीक पर काम कर रहा है. इस अभियान के तहत चीन चन्द्रमा की धरातलीय संरचाने का अध्ययन करेगा और उसके धरातल से नमूने एकत्रित करेगा ताकि चन्द्रमा के बनने की प्रक्रिया के बारे में और विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सके. 

Wednesday, August 31, 2016

HD 164595 - पृथ्वी से 94 प्रकाशवर्ष दूर की दुनिया से मिला सिग्नल

मई २०१५ में रेडियो टेलिस्कोप से अन्वेषण करते रूसी अन्तरिक्ष अनुसन्धान कर्ताओं को HD 164595 नाम सौर प्रणाली से एक तीव्र रेडियो सिग्नल प्राप्त हुआ. 

रूसी वैज्ञानिकों के इस खुलासे के बाद इस सौर प्रणाली के एकमात्र ग्रह में जीवन की संभावनाओं को टटोला जा रहा है. 

यह प्रणाली हमसे ९४ प्रकाशवर्ष दूर है और एकमात्र ग्रह का आकर नेपच्यून जितना है. वैसे हमारी जानकारी के अनुसार यह ग्रह अपने सितारे से काफी नजदीक है, इसलिए जीवन संभव दिखता नहीं है.

भविष्य इस बारे में यकीनी तौर पर बताएगा, तब तक पड़ोसियों की उम्मीद पर...

Wednesday, December 23, 2015

अपोफिस (Apophis) - 2029/2036 में टकराव की आशंका के साथ पृथ्वी की ओर बढ़ रहा एक क्षुद्रग्रह

एशिया और उत्तरी अफ्रीका के लोगों को 13 अप्रैल 2029 की सुबह एक बेहद दिलचस्प नजारा देखने का सु-अवसर प्राप्त हो सकता है, जब एक एस्टेरोइड 99942 अपोफिस (Apophis) धरती से बेहद पास से केवल 20000 मील की दूरी से गुजरेगा. वैसे तो धरती के पास से अनेक एस्टेरोइड गुजरते रहे हैं और अनगिनत धरती के वायुमंडल में प्रवेश भी करते हैं. कई नष्ट हो जाते हैं तो कुछ नगण्य धरातल तक पहुचकर धरती को नुकसान भी पहुँचा चुके हैं, परन्तु 1000 फीट से भी अधिक व्यास वाले इस  एस्टेरोइड जितने बड़े एस्टेरोइड के धरती के इतने करीब से गुजरने की घटना लगभग डेढ़ हजार वर्षों में केवल एक बार ही होती है. 

यही कारण है कि वैज्ञानिक जगत इस नजदीकी मिलन का बड़ी बेसब्री से इन्तेजार कर रहे हैं क्योंकि यह क्षुद्र ग्रहों के अध्ययन के लिए अब तक का सबसे बेहतरीन अवसर प्रदान करेगी. परन्तु इस उत्साह में एक भय और आशंका भी शामिल है - वैज्ञानिकों के एक वर्ग के अनुसार इस नजदीकी मुलाक़ात में यह क्षुद्र गृह हमारी धरती को टकराकर उसे बहुत घातक नुक्सान पहुंचा सकता है, इस बात की सम्भावना चालीस में से एक की है, और अन्तरिक्ष पिंडों के मनचले स्वाभाव और अनिश्चितता को देखते हुए यह भय होना लाजिमी भी है. संभवतः इसलिए अपोफिस का नामकरण प्राचीन मिस्र के अन्धकार और अव्यवस्था के देवता पर रखा गया है. वैसे वैज्ञानिकों द्वारा पूर्व में इसका नामकरण 2004 MN4 किया गया था. वैसे एक अन्य अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि सूर्य परिक्रमा के पश्चात् २०३६ में यह पृथ्वी के परिक्रमा पथ से गुजरेगा तब एक नगण्य ही सहीं परन्तु इसकी धरती से टक्कर होने की आशंका रहेगी. 


इस घटना को नंगी आखों से देखा जा सकेगा, जैसे नासा के नियर अर्थ ऑब्जेक्ट प्रोग्राम के प्रबंधक डॉन येओमंस कहते हैं – “यह यकीनी तौर पर आकाश में दिखने वाली सबसे चमकीली वस्तु नहीं होगी, परन्तु यह आसानी से नंगी आखों से दिखाई देगी.”

वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा इन्तेजार इसकी आतंरिक संरचना को जानने के लिए है, क्योंकि इतने नजदीक से किसी क्षुद्रग्रह का गुजरना आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से बहुत सारे नए रहस्य उजागर कर सकता है. परन्तु यह भी सच है कि धरती के आधुनिकतम उपकरण भी पृथ्वी पर रहकर बहुत सी बातें पता नहीं कर सकते इसलिए इस क्षुद्र गृह के परिक्रमा पथ पर एक प्रोब स्थापित करने पर विचार किया जा सकता है, वैसे वर्तमान तक ऐसा कोई अभियान प्रस्तावित नहीं है. यहाँ एक बात यह भी है कि अगर यह वाकई पृथ्वी से टकरा सकता है तो इस बात की पुख्ता जानकारी और बचाव अभियान के लिए अभी से प्रयत्न करना होगा, परन्तु यह भी संभव है कि इस टकराव की आशंका गलत ही साबित हो. इसलिए बेहतर यही होगा कि ये फैसला भविष्य पर छोड़कर इसके आगमन का इन्तेजार शुभकामनाओं के साथ किया जाए. 

Friday, July 10, 2015

नासा के स्विफ्ट उपग्रह ने कैद की ब्लैक होल की यादगार तस्वीर

नासा के स्विफ्ट उपग्रह ने हाल ही में सुदूर अन्तरिक्ष में एक अद्भुत नजारा कैद किया. V404 सिग्नी (Cygni) हमसे लगभग 8000 प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक द्वि-आधारी (Binary) तारा प्रणाली है जिसमें उसका सूर्य के सदृश्य एक अन्य सितारे के साथ आपसी परिक्रमा पथ है. इस प्रणाली में मौजूद एक ब्लैक होल के विष्फोट (eruption) ने नासा के इस उपग्रह को संकेन्द्रीय छल्लों का यह खूबसूरत नजारा देखने में मदद की. नासा के अनुसार हर कुछेक दशकों में इस ब्लैक होल में यह विष्फोट होता है. पिछली बार 1989 में यह दर्ज किया गया था. 
Cygni ४०४ पर केन्द्रित छल्लों की तस्वीर जो एक ब्लैक होल विष्फोट का परिणाम है 
स्विफ्ट में लगे शक्तिशाली एक्स-रे टेलिस्कोप की सहायता से एंड्रू बियर्डमोर के नेतृत्व में लीसेस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक दल ने एक नज़ारे को रिकॉर्ड किया जिसमे संकेन्द्रीय छल्लों (Rings) की खूबसूरती देखते ही बनते हैं. उन्होंने इन छल्लों को व्यास लगभग हमारे चन्द्रमा का आधा अनुमानित किया है. इन चित्रों को मिलाकर उन्होंने एक चलचित्र (movie) भी बनायीं है. इस खोज के अध्ययन से यह जानने में मदद होगी की अंतर-तारकीय (inter-stellar) धुल के कण इन छल्लों में किस प्रकार और कहाँ गति करते हैं. 

बियर्डमोर कहते हैं कि स्विफ्ट के अवलोकन से हमें अब तक का सबसे शानदार अंतर-तारीकिय धूलों के बिखराव का एक्स-रे रिंग प्राप्त हुआ है. इससे हमें इन धूलों के ब्लैक होल की ओर गति और उसके परिणाम को समझने में सहायता होगी. नासा के अनुसार हमसे लगभग 4000 और 7000 प्रकाशवर्ष दूर इन धुल-कणों की सतह इन छल्लों की बहुलता का कारण हो सकते हैं. 

इन छल्लो के बनने पर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं कि इस विष्फोट से उत्सर्जित प्रकाश में से कुछ सीधे रास्ते से स्विफ्ट तक पहुचे होंगे वहीँ कुछ ने घूमकर लम्बा रास्ता तय किया होगा. इन दोनों के बीच का समय-अंतराल एक इको प्रभाव पैदा करता है जिसके कारण ही हमें इस चित्र में फैलता हुआ Bull’s Eye (बैल की आँख के सदृश्य) नजारा प्राप्त हुआ है. 

Thursday, July 9, 2015

सबसे तेज अन्तरिक्ष यान प्लूटो के बेहद पास (New Horizons Spacecraft near Pluto)

अन्तरिक्ष विज्ञान के इतिहास में अब तक का सबसे तेज अंतरिक्षयान अपनी यात्रा में 14 जुलाई को प्लूटो के बेहद नजदीक पहुच चूका होगा तब हमें इस क्षुद्र ग्रह की बेहद शानदार तस्वीरों के साथ अनेक रहस्य खोलने वाली जानकारियाँ भी प्राप्त होंगी. 

अमेरिकी अन्तरिक्ष केंद्र नासा का 2006 में अपनी यात्रा पर रवाना हुआ न्यू होराइजन्स (New Horizons) अन्तरिक्ष यान अब तक का सबसे तेज अन्तरिक्ष यान है जो प्लूटोनियम की शक्ति से प्रति दिन लगभग 10 लाख मील का सफ़र तय कर रहा है. सौर मंडल की अपनी यात्रा में अभी यह प्लूटो और उसके पांच उपग्रहों का अध्ययन कर रहा है. इसी कड़ी में 7 जुलाई 2015 को इसने प्लूटो की बेहद शानदार तसवीर भेजी है जब वह प्लूटो से लगभग पचास लाख मील दूर था. इस चित्र में एक बड़ा भाग चमकीला नजर आ रहा है जो दिल के सामान लग रहा है. वैज्ञानिकों ने इस भाग का क्षेत्रफल लगभग 1200 मील अनुमानित किया है. इसी के बगल में एक गहरा भाग भी नजर आ रहा है जो कि ‘द व्हेल’ के नाम से पुकारा जाता है. 

वैसे यह अन्तरिक्ष यान जब प्लूटो से अपनी निकटतम दूरी पर होगा तब वैज्ञानिकों को इससे 500 गुने ज्यादा बेहतर तस्वीरों की आशा है. तब यह अन्तरिक्ष यान प्लूटो की सतह से केवल 7800 मील दूर होगा. अभी सौ साल भी नहीं हुए जब हम चाँद तक जाने का सोच भी नहीं सकते है और आज हम सौर मंडल के इस दूरस्थ सदस्य के इतने नजदीक पहुच चुके हैं. विज्ञान और मानव की असीमित सम्भावंनाओं का यह एक बेहतरीन उदाहरण है. इतने पास से यह अन्तरिक्ष यान कितने रहस्यों से पर्दा उठता है और कितनी जानकारियाँ प्रदान करता है, यह जल्द ही पता चल जाएगा, वैसे वैज्ञानिक मुख्य रूप से इसके वातावरण का अध्ययन करना चाहते हैं जिसमे हमारे ग्रह की तरह नाइट्रोजन की बहुलता है. 

Friday, October 31, 2014

वर्जिन गैलेक्टिक का स्पेस शिप 2 (SS2) परीक्षण उड़ान में दुर्घटनाग्रस्त

Space Ship 2 (Virgin Galactic)
31 अक्टूबर 2014, दिन शुक्रवार को एक दुखद घटना में  वर्जिन गैलेक्टिक (Virgin Galactic) के स्पेस शिप SS-2 के असफल परिक्षण उड़ान में एक पायलट की मौत हो गयी और दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया. काफी समय से प्रतीक्षित सब-ऑर्बिटल स्पेस टूरिज्म यान के इंजन में आई खराबी से उपजी असफलता की वजह से प्लेन धरती से टकराकर टुकड़ों में बंट गया. इस परिक्षण उड़ान में पहली बार एक नए तरह का मिश्रित इंधन प्रयोग किया गया था.

वर्जिन प्रमुख सर रिचर्ड ब्रान्सन की अगुआई वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना में वर्जिन गैलेक्टिक ने दावा किया था कि वह 2008 तक अंतरिक्ष यात्रियों को रवाना करने के लिए तैयार हो जायेगी. SS2 में सवार होने के पहले लगभग 500 अन्तरिक्ष यात्रा पर जाने की इच्छा रखने वाले इन ग्राहकों को कई दिनों का प्रशिक्षण दिया जाएगा, कंपनी की योजना इस यान को न्यू मक्सिको में बने नए
स्पेसपोर्ट से लांच करने की भी है.
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दुनिया की पहली मानव को ले जाने में सक्षम निजी अन्तरिक्ष यान
स्पेसशिप वन (SS1) के इस विकसित रूप को बर्ट रूतान (Burt Rutan) और उनकी कंपनी स्केल्ड कम्पोजिट (Scaled Composite) ने डिजाईन किया है.


परिक्षण उड़ान में इस यान में सिएरा नेवाडा कारपोरेशन (Sierra Nevada Corporation) के राकेट मोटर इंजन प्रयौग किया गया था जो कि एक संकर (hybrid) राकेट इंजन है. इस दुर्घटना के बाद इस इंजन में प्रयुक्त HTBP इंधन के बारे में प्रश्न उठ रहे हैं साथ ही इंजन की अस्थिरता भी एक प्रमुख विवाद का विषय बन गया है. परन्तु इस यान के इंजन को बनने वाली कंपनी के अनुसार उनका अनुबंध मई में समाप्त हो चूका था और वर्त्तमान परिक्षण उड़ान में किसी भी तरह से वह संबंद्ध नहीं है. 

दुर्घटना के बाद यान के डेब्रिस
शुक्रवार के इस अभियान के लिए SS2 को वाइट नाइट 2 (White Knight 2) कैरियर एयरक्राफ्ट के द्वारा समुद्र ताल से लगभग ४७००० फीट की उचाई पर ले जाया गया जहां से उसे छोड़ा गया. दोनों के अलग होने के बाद पायलट ने राकेट मोटर को ट्रिगर किया था. संभवतः एक बार पुनः इंजन चालू करने का प्रयास और किया गया था परन्तु जल्द ही इसके बाद यान अनियमित हो गया जिसकी परिणिति उसके टूकड़ों में बिखर जाने में हुयी. इस सबके बीच केवल दो मिनट का समय लगा.

इस दुखद घटना में न केवल पायलट शिकार हुए वरन अन्तरिक्ष पर्यटन का कार्यक्रम पुनः पीछे चला गया. घटना के कारणों की जांच जारी है.
 
मेरी सहानुभूति शिकार पायलट और उनके परिवार के साथ है.