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Sunday, December 13, 2020

आर्टेमिस I (Artemis I ) - चाँद पर प्रथम महिला अन्तरिक्ष यात्री (2024)

रात्रि-आकाश को अपनी सुन्दरता से सुशोभित करने वाला हमारा चाँद

Artemis Mission Logo
विगत कुछ वर्षों से अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का प्रिय बना हुआ है और लगातार चन्द्र-अभियानों का एक रोचक सिलसिला चल पड़ा है, परन्तु चाँद पर मानव भेजने का अभियान दशकों से रुका हुआ है. परन्तु जल्द ही अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा वर्ष 2024 के लिए प्रस्तावित ओरियन क्रू यान में दो मानवों को चाँद पर उतारने की तैयारी में लगा हुआ है. इस अभियान का नाम आर्टेमिस (Artemis) – I रखा गया है. 

इस अभियान का नामकरण भी दिलचस्प है. नासा का अपोलो अभियान चन्द्रमा के अन्वेषण को समर्पित था और चाँद की धरती पर पहला कदम भी रखने वाले नील आर्मस्ट्रोंग और उनके साथी एडविन ‘बज़’ एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस भी अपोलो-11 में गए थे. इसलिए दशकों बाद शुरू इस अभियान का नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं में वर्णित अपोलो की जुड़वाँ बहन आर्टेमिस (Artemis) के नाम पर ही रखा गया है.  

आर्टेमिस अन्तरिक्ष यान - चन्द्रमा के पास अपनी कक्षा में 
प्रथम आर्टेमिस अभियान के लिए नासा ने 18 अंतरिक्ष यात्रियों की सूची तैयार की है जिसमें नौ पुरुष और नौ महिलाएं हैं. भारत में इसकी विशेष चर्चा इसलिए भी है क्योंकि इन पुरुषों में से एक भारतीय मूल के राजा जॉन वुर्पूतूर चारी या राजा चारी भी शामिल हैं. राजा चारी भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं जो वायुसेना में कर्नल हैं. 43 वर्ष के राजाचारी अमेरिका के एयर फोर्स एकेडमी, MIT  और यूएस नेवल टेस्ट पायलट स्कूल से ग्रेजुएट हैं. वैसे इस सूची में से केवल एक पुरुष और एक महिला को ही चुना जाएगा. आर्टिमिस मिशन के बाद इस दशक के अंत में मानव की अंतरिक्ष में लंबे समय तक उपस्थिति के लिए अभियान चलाए जाएंगे. नासा की योजना तो मंगल पर इंसान भेजने की भी जो अन्तरिक्ष अन्वेषण को बदल कर रख देगी. 

आर्टेमिस अभियान के लिए चयनित 24 अन्तरिक्ष यात्री (इनमें से  केवल 1 पुरुष और 1 महिला ही जायेंगे)
आर्टेमिस अभियान की एक खास बात यह भी है कि पहली बार कोई महिला चाँद की धरती पर कदम रखेगी. महिलाओं ने अपनी शक्ति अन्तरिक्ष के क्षेत्र में शिद्दत से दर्ज कराई हैं परन्तु यह सफलता इतिहास में स्वर्णिम अध्याय होगा. 


Tuesday, October 8, 2019

शनि ग्रह के 20 नए चंद्रमाओं की खोज





शनि – अद्भुत वलयों से सुशोभित सौर मंडल का सबसे सुन्दर ग्रह (मेरे लिए तो हमारी वसुधा) अब और भी शानदार हो चला है. वैज्ञानिकों ने इसके 20 नए साथियों यानि चंद्रमाओं की खोज की घोषणा की है. इस खोज के साथ ही शनि के ज्ञात चंद्रमाओं की संख्या 82 हो गयी है और अब वह महाग्रह बृहस्पति से आगे निकल गया है जिसके वर्तमान तक 79 ज्ञात उपग्रह हैं. इसके पहले पिछले ही वर्ष 12 नए चंद्रमाओं के साथ बृहस्पति का कद और ऊँचा हो गया था.


ग्रह से काफी दूर स्थित इन बाह्य चंद्रमाओं के साथ अब इसके आस-पास का घेरा चंद्रमाओं से समृद्ध लगने लगा है तो वहीँ कई और नए चंद्रमाओं की उपस्थिति की संभावना भी बढ़ गयी हैं. इन नए चंद्रमाओं की खोज के साथ सौर मंडल के निर्माण की प्रारंभिक अवस्था में ग्रहों और अन्य पिंडों के मध्य होने वाले टक्करों को समझने और चंद्रमाओं के निर्माण की प्रणालियों को समझने में बेहतर मदद मिलेगी, विशेषकर गैसीय दानव ग्रहों की स्थिति में, क्योंकि इन्हीं ग्रहों के पास उपग्रहों का समृद्ध भण्डार है अन्यथा आतंरिक चार ग्रहों के पास कुल 3 ही चाँद हैं जिनमें से 2 (बुध और शुक्र) उपग्रह  विहीन हैं.

ये नए चाँद केवल 3 मील चौड़े हैं और बेहद धुंधले नजर आते हैं. फिर भी सौभाग्यवश वे हवाई के मौना केया ज्वालामुखी पर लगे खोजी सुबारू टेलिस्कोप की नजरों में आ गए. मुश्किल से दिखने वाले इन चंद्रमाओं की खोज में लगभग 15 वर्ष लग गए. वैज्ञानिक स्कॉट एस. शेप्पर्ड और उनके साथी इसकी खोज में 2004 से प्रयासरत रहे थे. अत्याधुनिक कंप्यूटर और यंत्रों से इतने वर्ष तक एकत्रित चित्रों और डाटा के अध्ययन से इन नए पड़ोसियों का पता चला.

इन खोजे गए 20 उपग्रहों में से 17 उपग्रह शनि के घूर्णन के विपरीत दिशा में परिक्रमा करते हैं और शेष 3 ग्रह की दिशा में. शेप्पर्ड और उनके साथियों का विश्वास है कि ये चन्द्रमा सौरमंडल में शनि के नजदीक पहुंचे किसी वृहद् पिंड के टुकड़े है जिसे शनि ने अपने गुरुत्व में कैद कर लिया था. कालांतर में अनेकों टक्करों से यह पिंड छोटे छोटे पिंडों के रूप में विखंडित हो गया और यहीं इन बाह्य चंद्रमाओं के निर्माण का कारण रहा होगा. वैसे भी वैज्ञानिकों के अनुसार सौर मंडल की प्रारंभिक अवस्था में ऐसे टक्कर आम बात रही होगी.

  ख़ास बात   शेप्पर्ड और उनके साथियों ने इन 20 चंद्रमाओं के नामकरण के लिए जनता से सुझाव मांगे हैं. आप भी इस प्रतियोगिता में भाग लेकर नाम सुझा सकते हैं और शायद आपका दिया नाम इतिहास में दर्ज हो जाए. अंतिम तिथि है – 6 दिसम्बर 2019.

 नाम देने के लिए   @SaturnLunacy पर TWIT कीजिये Twitter से, और साथ ही यह बताएं कि आपने यह नाम क्यों चुना 
जल्दी कीजिये फिर...



Saturday, August 31, 2019

भारतीय वैज्ञानिक शिशिर कुमार मित्रा के नाम पर चाँद का क्रेटर


अन्तरिक्ष के क्षेत्र में भारत का नया दूत चंद्रयान-2 अपने ऐतिहासिक लक्ष्य से बस कुछ ही दूर है और चन्द्रमा के अनजाने हिस्से में उतरने और अध्ययन के पहले वह अपने अत्याधुनिक मैपिंग कैमरे से चन्द्रमा की शानदार तस्वीरें भेज रहा है – इन तस्वीरों में चन्द्रमा के गड्ढों (क्रेटरों) की अनेक तस्वीरें हैं. इन्हीं क्रेटरों की तस्वीरों में एक क्रेटर है – चंद्रा क्रेटर जो कि भारत के महान वैज्ञानिक श्री शिशिर कुमार मित्रा के नाम पर सम्मानपूर्वक रखा गया है. आइये इनके बारे में जानने का प्रयास करते हैं -


शिशिर कुमार मित्रा जी का जन्म वर्ष 1890 में बंगाल प्रेसिडेन्सी में हुआ था. आशुतोष मुखर्जी, डॉ. सीवी रमन, चार्ल्स फैब्री, मैरी क्यूरी और कैमिल गटन जैसे विश्व के महान वैज्ञानिकों के साथ उन्होंने कार्य किया. मित्रा जी ने ओजोन परत के क्षेत्र में विस्तृत शोध व विश्लेषण के पश्चात् पृथ्वी के वायुमंडल के बारे में सिद्धांत दिए. उन्होंने पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में स्थित ई लेयर और एफ लेयर के बारे में अनेक नवीन तथ्यों को उजागर किया. अपने शोध उपरी वायुमंडल (TheUpper Atmosphere) के प्रकाशन के बाद उनकी गणना चर्चित भौतिक वैज्ञनिकों में होने लगी.



भारत में सर्वप्रथम मित्रा जी ही कलकत्ता स्थित विज्ञान यूनिवर्सिटी कॉलेज की अपनी प्रयोगशाला से मित्रा रेडियो ट्रां​समिशन के ज़रिए 1926 में कार्यक्रम जारी करते थे.


1927 में पहली बार भारतीय ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना हुई थी जो बाद में ऑल इंडिया रेडियो के रूप में स्थापित किया गया था.



अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय यूनियन ने जब खोजे गए आकाशीय पिंडों के नामकरण का निर्णय लिया तो एक समूह की स्थापना की गयी जिसके आधार पर पद्म भूषण से सम्मानित मित्रा के नाम पर एक क्रेटर का नाम रखे जाने की घोषणा 1970 में की थी. वैसे उनको ये सम्मान मृत्यु के सात साल बाद मिला.


वह समय भारत अन्तरिक्ष क्षेत्र में बस शुरुआत ही कर रहा था, परन्तु आज हमने चन्द्रमा, मंगल के प्रथम सफल अभियानों के बाद पुनः चाँद के अनजाने हिस्से के अध्ययन (चंद्रयान-2), सूर्य के लिए (आदित्य-1) और मानव मिशन के लिए (गगनयान) के साथ अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में देश और ध्वज का नाम प्रकाशित कर लिए है.

भारतीय वैज्ञानिकों, जन और इसरो को इस उपलब्धि हेतु – जय भारत माँ

Thursday, January 10, 2019

चीनी अन्तरिक्ष यान चांग ई-4 - चन्द्रमा के अनदेखे हिस्से पर


हमारा पड़ोसी देश चीन अकल्पनीय रूप से सभी क्षेत्रों में आशातीत सफलता पाते नजर आ रहा है. अन्तरिक्ष के क्षेत्र में उसकी महत्वाकांक्षा जो भी हो, फिलहाल जिस रफ़्तार से वह अन्तरिक्ष अभियानों को गति दे रहा है जल्द ही इस क्षेत्र में उसे महाशक्ति का दर्जा मिल ही जाएगा. अन्तरिक्ष में रात्रि कालीन रोशनी के लिए दर्पण लगाने की लगभग पूर्ण तैयारियों की घोषणा के बीच चीन ने एक और कारनामा कर दिखाया. 

चीन के अन्तरिक्ष यान  चांग ई-4 (Chang'e-4) ने चन्द्रमा के उस हिस्से पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की है जिसे उसका न देखा जा सकने वाला हिस्सा (dark side ) कहते हैं. इस हिस्से को हम कभी भी धरती से देख नहीं सकते हैं. चांद के इस अनदेखे हिस्से पर उतरने वाला यह दुनिया का पहला यान है। चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (सीएनएसए) ने बताया कि 3 जनवरी को स्थानीय समयानुसार सुबह 10:26 बजे यान अपनी निर्धारित जगह पर सफलतापूर्वक उतर गया है.  चांग ई-4 यान को आठ दिसंबर को सिचुआन प्रांत के शिचांग  सेटेलाइट लांच सेंटर से मार्च-3बी रॉकेट की मदद से लांच किया गया था। इसके पूर्व चीन 2013 में चांग ई-3 (Chang'e-3) को चांद पर उतार चुका है.

 इस अँधेरे भाग में इस अन्तरिक्ष यान ने दक्षिण पोल-एटकेन बेसिन  (South Pole-Aitken Basin) के वोन कारमन (Von Kármán  ) क्रेटर में लैंडिंग की है. यह हमारे सौरमंडल में सबसे बड़ा ज्ञात क्रेटर याने गड्ढा है. इस चांद के इस क्रेटर का व्यास तकरीबन 2,500 किलोमीटर और गहराई करीब 13 किलोमीटर है। 

चांद के इस अनदेखे हिस्से पर भेजे गए यान और धरती पर स्थित केंद्र के बीच संपर्क स्थापित करना एक बेहद मुश्किल कार्य है क्योंकि वह हिस्सा कभी भी धरती पर स्थित केंद्र की ओर नहीं आने वाला है. इसलिए इस अन्तरिक्ष यान और धरती के बीच संपर्क के लिए चीन ने मई में ही क्यूकिआओ (Queqiao) नाम का एक रिले सेटेलाइट लांच कर दिया था।

चांद अपनी धुरी पर इस तरह से घूमता है कि इसका 41 फीसद हिस्सा धरती से कभी नहीं दिखता। इस हिस्से के बारे में कोई जानकारी नहीं होने के कारण इसे 'डार्क साइड' भी कहा जाता है। हालांकि यह हिस्सा अंधेरे में नहीं है। चांद के दोनों हिस्सों पर सूर्य की बराबर रोशनी पड़ती है और दोनों हिस्सों पर करीब दो-दो हफ्ते के दिन-रात होते हैं।

Friday, June 15, 2018

क्या पृथ्वी के पास 20 चाँद थे!!!

पिछले कुछ दिन इतने ज्यादा व्यस्त रहे कि ऑनलाइन आने का लगभग मौका ही नहीं मिल पाया, अभी भी काफी देर से ही समय मिल पाया है तो पता चला की 2000 FACEBOOK LIKES का महत्वपूर्ण पड़ाव तो 3 दिन पहले ही पार हो चूका है. एक बार फिर से सभी पाठकों का शुक्रिया. 



मेरी आखिरी पोस्ट चाँद और पृथ्वी के आपसी संबंधों के ऊपर थी. आज उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हमारी धरती और चंदामामा की बात करेंगे. एक बात जो हम सभी जानते हैं कि बाह्य ग्रह चंद्रमाओं के मामले में बहुत समृद्ध रहे हैं, वहीँ आंतरिक चार ग्रहों के पास केवल 3 ही चन्द्रमा हैं. बुध और शुक्र उपग्रह विहीन हैं और मंगल के पास भी केवल दो ही चाँद हैं. फिर भी वैज्ञानिकों को हमेशा से धरती जैसे महत्वपूर्ण ग्रह के पास केवल एक चाँद का होना खटकता था. सोचिये तो कितना अच्छा होता कि हमारे पास भी काफी सारे चाँद होते. रात्रि आकाश की तो शोभा में चार चाँद, या यूं कहें की कई सारे चाँद लग जाते. परन्तु ऐसा हुआ तो नहीं. या शायद कभी हुआ भी था हो...


जी हाँ, यदि इसराइल के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के दल के दावे पर विश्वास किया जाए तो पृथ्वी के पास एक या दो नहीं वरन कुल 20 छोटे-छोटे चाँद थे. अब एक समय में कुल कितने चाँद थे, ये तो उन्होंने नहीं बताया है. पर उनका दावा है कि हमारा चाँद कोई पृथक आकाशीय पिंड नहीं है बल्कि मौजूदा चाँद की उत्पत्ति 20 छोटे-छोटे चंद्रमाओं के मिलने से हुयी है. उनके अनुसार अरबों वर्ष पूर्व जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तब अन्तरिक्ष में आवारा धूमता कोई क्षुद्र ग्रह या पिंड, पृथ्वी से आ टकराया. इस टक्कर की वजह से पृथ्वी से काफी मात्रा में पदार्थ छिटक गया. इसका एक बड़ा हिस्सा तो अन्तरिक्ष में फ़ैल गया परन्तु बाकी बचा पदार्थ पृथ्वी का चक्कर लगाने लगा और कालांतर में पहले चन्द्रमा का निर्माण हुआ. इसी तरह की प्रक्रिया आगे भी चलती रही और दूसरे-तीसरे चन्द्रमा का निर्माण हुआ. करोड़ों वर्ष की बीतते-बीतते ये चन्द्रमा एक बड़े पिंड में परिवर्तित हुए और हमारा वर्तमान चाँद अस्तित्व में आया.  


इसके पूर्व चाँद की उत्पत्ति के विषय में जायंट हाइपोथीसिस सिद्धांत प्रचलित था. इसके अनुसार अरबों वर्ष पूर्व, पृथ्वी के निर्माण के बाद मंगल ग्रह के बराबर का एक ग्रह थिया, पृथ्वी से टकराया था. इस टक्कर से थिया से धूल और चट्टान जैसे तत्व पृथक हुए और चाँद का निर्माण हुआ. परन्तु वर्तमान खोजों में पाया गया है कि चन्द्रमा में पृथ्वी पर पाए जाने वाले तत्व ज्यादा मात्रा में मिले हैं, जिससे इसराइल के वैज्ञानिकों का तर्क है कि चाँद, पृथ्वी के ही पृथक हुए भागों से बना है. 


वैसे, पिछली बात को आगे बढ़ाये तो एक अद्भुत बात ये है कि अगर हमारा चाँद अचानक से गायब हो जाए यानि लुप्त हो जाए तो उसका गुरुत्वाकर्षण बंध नहीं रहेगा और पृथ्वी पूरे रफ़्तार से अपनी कक्षा में लट्टू की तरह घूमेगी. बहुत तेज- इतनी तेज की एक दिन केवल 6 घंटे का रह जाएगा. हैं न अजीब. फिर सोयेंगे कब और जागेंगे कब. तब तो किसी दिन सोयेंगे तो एक दिन छोड़ कर उठेंगे. काम के घंटे भी कुछ मिनट. 


मजेदार होगा न!!!

Sunday, June 10, 2018

चाँद के दूर जाने से हुआ 24 घंटे का दिन – पहले था 18 घंटे का

पृथ्वी और चाँद के बीच की लगातार बढ़ती दूरी से दिन हुए लम्बे 

ज्वार-भाटा की अवधारणा से हम सभी अपने स्कूल के समय से ही परिचित हैं. सामान्य शब्दों में पृथ्वी पर स्थित सागरों के जल-स्तर का अपने सामान्य स्तर से ऊँचा उठना (ज्वार) और फिर पुनः नीचे आना (भाटा) कहलाता है. लेकिन वास्तविकता में यह ज्वार-भाटा की अवधारणा धरातल और वायु पर भी लागू होती है. सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा का परस्पर गुरुत्वाकर्षण ही इस प्राकृतिक घटना का कारण है. वैसे पृथ्वी पर इस घटना का मुख्य कारण चन्द्रमा का पृथ्वी की परिक्रमा करना है. जब चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के सीध में होता है तो उच्च-ज्वार और जब समकोणीय अवस्था में होता है तो निम्न-ज्वार आता है.
 
पर ज्वार, ब्रम्हांड में और भी काफी सारे प्रभाव लाते हैं. वे हमारी पृथ्वी को गर्म करते हैं. उत्पन्न ऊर्जा की यह मात्रा बहुत अधिक होती है और इस उर्जा को ग्रहण कर चाँद और तेजी से घूमता है, इतना तेज की वह धीरे-धीरे हमसे दूर जाता जा रहा है. होता यूं है कि ज्वार की वजह से धरती पर जो द्रव्य (समुद्र का पानी खासतौर से) ऊपर उठता है, वह चाँद को धरती की ओर और तेजी से खींचता है (क्योंकि इस स्थिति में उस उठे हुए द्रव्य की वजह से उस स्थान पर पृथ्वी और चाँद की दूरी थोड़ी कम हो जाती है). उस पर पड़ने वाले इस अतिरिक्त बल से चन्द्रमा का घूर्णन बढ़ता जाता है और तेज रफ़्तार से घूमता यह चाँद लम्बी दूरी तय करने लगता है यानि इसका परिक्रमा पथ धीरे-धीरे हर ज्वार के कारण बढ़ता चला जाता है. वैज्ञानिकों ने हाल में शुद्धता से जब पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच की दूरी को मापा तो पता चला की चन्द्रमा हर वर्ष हमसे 1.5 इन्च दूर जा रहा है.

ज्वार की वजह से समुद्र के किनारे एकत्र रेत और गाद के जीवाश्म संरचनाओं का अध्ययन एरिज़ोना विश्वविद्यालय के चार्ल्स सॉनेट ने किया और इस प्रभाव का अध्ययन करने का प्रयास किया.  इसी दौरान गोडार्ट स्पेस सेण्टर के रिचर्ड रे ने गत माह नेचर पत्रिका में अपना एक शोध प्रकाशित किया. इस शोध के अनुसार किसी ग्रह के उपग्रह के परिक्रमा पथ में आने वाला परिवर्तन ग्रह पर ज्वार को विकृत करता है. यह विकृति जल-वायु-भूमि तीनों पर पड़ती है.अपने अध्ययन में उन्होंने पृथ्वी की संरचना में इस वजह से होने वाले परिवर्तन के बारे में बताया. पूर्ण अध्ययन ने धरती और चाँद के करोड़ों साल पुराने रिश्ते पर एक नया प्रकाश डाला. 

पत्रिका में प्रकाशित इस शोध के अनुसार आज से 90 करोड़ वर्ष पूर्व धरती पर एक दिन केवल 18.2 घंटे का हुआ करता था. लगातार ज्वार की घटना और पृथ्वी द्वारा चाँद को प्रदान की गयी उर्जा के परिणामस्वरूप उसके परिक्रमा पथ में वृद्धि की वजह से धरती की अपने अक्ष पर घूर्णन गति कमतर होती गयी और अब उसे 24 घंटे लगते है एक घूर्णन पूर्ण करने में. भला ये क्या बात हुयी – वैज्ञानिक इसे इस तरह समझाते हैं कि धरती एक घुमते हुए स्केटर की तरह व्यवहार कर रही है जो अपनी बाहें फैलाने के दौरान अपनी गति कम कर लेती है. ठीक ऐसे ही ज्वार के समय धरती की बाहें फैली हुयी होती हैं क्यूंकि इस पर उपस्थित द्रव्य ऊपर/बाहर की ओर गति करते हैं इस स्थिति में धरती की रफ़्तार कम होती जाती है और इस सिलसिले की वजह से लगातार धरती अपने धुरी पर धीमी पड़ती जा रही है.

Friday, December 30, 2016

चीन - चाँद के सुदूर क्षेत्र में जाने वाला पहला देश!

विगत वर्षों में चीन ने अपने अन्तरिक्ष अनुसन्धान कार्य में तेजी लायी है और चाँद पर जाने वाले चुनिन्दा देशों की कतार में खड़ा हो चूका है. परन्तु विगत दिनों चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अन्तरिक्ष योजना के अंतर्गत घोषणा की है कि वह चाँद के धरती से नजर ना आने वाले सुदूर या अँधेरे क्षेत्र (धरती से हम चाँद का केवल एक हिस्सा देख पाते हैं, दुसरे भाग की तस्वीर हमें अन्तरिक्ष में भेजे विभिन्न अभियानों से ही प्राप्त हुयी है)  में जाने का इच्छुक है और उसने 2018 के लिए प्रस्तावित इस अभियान की व्यापक तैयारियां भी प्रारंभ कर दी है. 

चाँद पर वैसे तो दर्जनों अभियानों के तहत विभिन्न अन्तरिक्ष यान (मानव रहित और मानवीय ) भेजे जा चुके हैं, परन्तु अगर चीन अपने अभियान में सफल हुआ तो वह ऐसा करने वाले विश्व का प्रथम देश बन जाएगा क्यूंकि अभी तक किसी भी अभियान में चाँद के सुदूर क्षेत्र में अन्तरिक्ष यान नहीं उतारा गया है. 

इस प्रस्तावित लूनर प्रोब का नाम चैंग-इ- 4 (Chang'e-4) रखा गया है. चीन अन्तरिक्ष में यान भेजने और उन्हें पुनः वापस लाने की तकनीक पर काम कर रहा है. इस अभियान के तहत चीन चन्द्रमा की धरातलीय संरचाने का अध्ययन करेगा और उसके धरातल से नमूने एकत्रित करेगा ताकि चन्द्रमा के बनने की प्रक्रिया के बारे में और विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सके. 

Monday, March 23, 2015

हम चन्द्रमा के केवल एक पक्ष ही क्यों देख पाते हैं? (Far Side of the Moon)

चन्द्रमा का अग्र भाग (गैलिलियो द्वारा) और पृष्ठ भाग (अपोलो 16 द्वारा) प्रेषित 
हमारी धरती के एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा के बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह यह की हमने आज तक कभी चन्द्रमा का दूसरा भाग देखा ही नहीं है! हम लोगों में से बहुतों ने इसे पढ़ा और समझा भी है अपनी विद्यालयीन किताबों में. पर यक़ीनन ऐसे बहुत से लोग होंगे जो इस बारे में थोड़ा विस्तार पूर्वक जानना पसंद करेंगे. अगर आप उनमें से हैं तो यह लेख आपके लिए है...

किसी भी उपग्रह की दो प्रकार की गतियाँ होती हैं –
  • उसकी वह गति जिसमे वह अपने परिक्रमा पथ में अपने ग्रह के चारों ओर एक चक्कर लगता है, इसे परिक्रमण गति कहा जाता है, और लगने वाले समय को परिक्रमण काल.
  • दूसरी वह गति जिसमे वह अपने अक्ष पर किसी लट्टू की तरह घूमता है. इस गति को घूर्णन गति और कस काल को घूर्णन काल कहते हैं.
चन्द्रमा की इन गतियों के बारे में सबसे मुख्य बात है कि उसका परिक्रमण काल और घूर्णन काल लगभग बराबर है. कहने का मतलब यह कि वह जितने समय में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है लगभग उतने ही समय में वह अपनी धुरी पर भी एक चक्कर पूरा घूम जाता है. इसी कारण उसका एक ही भाग हमेशा धरती के सामने होता है और दूसरा हिस्सा हमेशा हमसे छुपा हुआ. वैसे चन्द्रमा की यह मंद गति हमेशा से ही ऐसी नहीं रही थी होगी. चन्द्रमा पर पड़ने वाले पृथ्वी के शक्तिशाली गुरुत्व के खिंचाव के कारण ही चन्द्रमा की यह गति मंद पड़ी है. इसका सीधा अर्थ यह भी है कि शायद लाखों साल पहले चन्द्रमा का छुपा भाग भी अपनी धरती की ओर देखकर इसकी सुन्दरता पर जलता था होगा.

Thursday, April 10, 2014

राकेश शर्मा - भारत के प्रथम अन्तरिक्ष यात्री (First Indian on Space)

रविश मल्होत्रा
राकेश शर्मा
क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा अन्तरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय हैं. राकेश शर्मा ने सेल्युत 7 अन्तरिक्ष केंद्र में 7 दिन 21 घंटे बिताये थे. 3 अप्रैल 1984 को दो अन्य सोवियत अन्तरिक्ष यात्रियों के साथ सोयूज़ टी 11 में राकेश शर्मा को अन्तरिक्ष भेजा गया था. अन्तरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाला 6 हजार 850 किलोग्राम वजनी स्पेस क्राफ्ट कजाखस्तान से रवाना हुआ था. भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन इसरो और रूस के सोवियत इंटरकॉसमॉस स्पेस प्रोग्राम के संयुक्त उपक्रम के तहत उन्हें भारत की ओर से पहले अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चुना गया. वायुसेना के एक और अफसर विंग कमांडर रविश मल्होत्रा को शर्मा के बैकअप के तौर पर चुना गया था.  

राकेश शर्मा - रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों
लियोनिद किजिम और यूरी मालिशेव के साथ

राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था. 1970 में वे भारतीय वायु सेना में बतौर पायलट अफसर शामिल हुए. १९७१ में पाकिस्तान के साथ युद्ध में राकेश शर्मा ने मिग विमान उड़ाया और अपने मिशन में सफलता हासिल की. जिसके कारण उन्हें इस मिशन के लिए चुना गया.

शर्मा के साथ स्पेस क्राफ्ट में यूरी मालिशेव और गेनाद्री स्त्रेकलोव जैसे अनुभवी अन्तरिक्ष यात्री सवार थे. दोनों को कई बार अन्तरिक्ष में जाने का अनुभव था. उस वक्त लोगों में एक भारतीय के अन्तरिक्ष में जाने को लेकर बेहद उत्साह था और वे रेडियो और टेलीविज़न के जरिये पल-पल की खबर रख रहे थे. अन्तरिक्ष केंद्र में रहते हुए राकेश शर्मा ने भारत पर केन्द्रित पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम में हिस्सा लिया. उन्होंने अन्तरिक्ष केंद्र में लाइफ साइंसेज के अलावा कई अन्य प्रयोग भी किये. साथ ही उन्होंने गुरुत्वाकर्षणहीन वातावरण में योगाभ्यास भी किया. अन्तरिक्ष मंव रहने के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने जब राकेश शर्मा से पूछा कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, तो राकेश शर्मा ने जवाब दिया. सारे जहां से अच्छा. भारत में राकेश शर्मा को अशोक चक्र से सम्मानित किया गया है. इसके अलावा उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च पुरस्कार हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन से भी नवाजा गया.

Thursday, December 19, 2013

सबको चाहिए चाँद और मंगल - मुकुल व्यास द्वारा लेख

चीन के ताजा चन्द्र मिशन की सफलता ने भारत और चीन के मध्य अन्तरिक्ष प्रतियोगिता का आगाज़ कर दिया है. चाँद की धरती पर यान उतारने वाला चीन तीसरा देश है. वहीँ भारत ऐसा ही एक अभियान चंद्रयान २ की तैयारी में व्यस्त है. 

इसी विषय पर मुकुल व्यास द्वारा लिखित लेख जो कल ही पत्रिका समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ है, यहाँ शेयर कर रहा हूँ. 


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