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Saturday, August 3, 2019

पहली बार किसी नए ग्रह का जन्म होते देख रहे वैज्ञानिक

PDS 70 बी और वलयाकार गैसीय बादल 

अन्तरिक्ष में अनवरत अपनी दृष्टि लगाए और नए-नए खोजों की जिज्ञासा के क्रम में चिली के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने ऐसे एक युवा ग्रह को खोज निकाला है जिसके चारों ओर गैसे और धूल-कणों की एक वलयाकार आकृति नजर आ रही है, ये कुछ ऐसा ही है जैसे वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार महाग्रह बृहस्पति के चारों ओर स्थित था – और जिससे उसके चंद्रमाओं का निर्माण हुआ है. हमसे करीब 370 प्रकाशवर्षों की दूरी पर स्थित PDS 70b नामक यह गैसीय दानव ग्रह गणना के अनुसार हमारे महाग्रह बृहस्पति से कई गुना विशाल है और अभी यह अपने निर्माण की प्रक्रिया में ही है.  यह ग्रह PDS 70 नामक बौने तारे की परिक्रमा कर रहा है.

सामान्यः तारों से निकली गैस और धूल-कणों से ग्रह निर्मित होते हैं और यदि ग्रह विशाल हो तो वह अपनी कक्षा में फैले गैसों एवं धूल-कणों से अपना वलय निर्मित कर लेता है. इस वलय  में स्थित पदार्थ कालांतर में उसके उपग्रहों का रूप ले लेते है, ठीक बृहस्पति ग्रह की तरह – जो अपने आप में एक सम्पूर्ण ग्रहीय-उपग्रहीय प्रणाली है.

ग्रह के चारों ओर बना यह वलय लगभग 1 करोड़ साल के समय में उपग्रहों में बदल जाएगा. हमारे सौर प्रणाली में यह घटना आज से तकरीबन 4 अरब वर्ष पहले घटित हुयी होगी. इसलिए वैज्ञानिक इस खोजे गए ग्रह और उसके वलय के प्रति कौतुहल से भरे हैं. अभी तक नगण्य संख्या में ही ऐसे ग्रह खोजे गए हैं और यह विशाल ग्रह होने के कारण अध्ययन हेतु बेहतर स्थितियां प्रकट करता है.

इस ग्रह और इसके वलय के अध्ययन से वैज्ञानिकों को हमारे सौरमंडल के निर्माण के बारे में बेहतर समझ विकसित करने में मदद होगी.

Tuesday, August 13, 2013

अरूण (युरेनस)


अरूण (युरेनस) सूर्य से क्रम में सांतवा तथा आकार में हमारे सौरमंडल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है. ग्रीक मिथकों में युरेनस स्वर्ग का राजा माना जाता है.

युरेनस पहला ग्रह है जिसे आधुनिक काल में खोजा गया था. इसकी खोज का श्रेय विलियम हर्शेल को जाता है जिन्होंने १३ मार्च १७८१ को इसे अपनी शक्तिशाली दूरबीन से खोजा था. इसे कभी कभी हर्शेल के पुच्छल तारे के नाम से भी पुकारा जाता है. वैसे १६०० के करीब भी युरेनस को देखा गया था परन्तु तब इसे असमान में विचरते लाखों तारों में से एक समझ कर ध्यान नहीं दिया गया था.

युरेनस का घूर्णन अक्ष सौर मंडल में अनोखा है. अन्य सभी ग्रह लम्बवत घूर्णन करते हैं वहीँ युरेनस अपने अक्ष के सामानांतर घूर्णन करता है, दुसरे शब्दों में यह लेता हुआ है और लुढ़कते हुए अपनी परिक्रमा कर रहा है. इस स्थिति के कारण इसके विषुवतीय क्षेत्र के बदले ध्रुवों को सूर्य से सीधी किरने प्राप्त होती है परन्तु आश्चर्यजनक तौर से इसका विषुवतीय क्षेत्र ज्यादा गर्म है. इसका कारण फिलहाल तक अज्ञात है.


युरेनस की संरचना में अन्य गैसीय महाकाय ग्रहों की तरह हाइड्रोजन और हीलियम की प्रचुरता है. परन्तु यह केवल वातावरण तक ही है. धरातलीय संरचना में ये एक चट्टानी ग्रह की तरह है जिसमे चट्टान के साथ विभिन्न प्रकार की बर्फ भी उपस्थित है.

अन्य गैसीय ग्रहों की तरह युरेनस में भी बादल बहुत तेज गति से गमन करते हैं तथा इसमें भी वलय पाए ग्रह हैं जो एक समय केवल शनि की विशिष्ट पहचान माने जाते थे. वोएजर ने इसके वलयों का विस्तृत अध्ययन किया है तथा साथ ही इसके पूर्व ज्ञात चंद्रमाओं के अतिरिक्त दस नए चन्द्रमा खोजे थे. वर्तमान में युरेनस के २७ उपग्रह ज्ञात हैं. इन उपग्रहों के नाम परंपरागत तौर पर ग्रीक या रोमन मिथक पर ना रखकर शेक्सपीयर तथा अलेक्जेंडर पोप की रचनाओं के किरदारों पर रखे गए हैं.

Saturday, August 10, 2013

शनि (Saturn)

शनि गैस दानव ग्रहों में से दूसरा, सूर्य से दूरी के क्रम में छठवां तथा आकर की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा गृह है. शनि का नामकरण कृषि के रोमन देवता सैटर्न पर किया गया है. हिन्दू धर्म में शनि देव के रूप में स्थापित हैं.

शनि को प्रागैतिहासिक काल से जाना जाता रहा है. गैलिलियो ने इसे दूरबीन से सबसे पहले १६१० में देखा था, तब उन्हें इसे वलय गृह के कानों की तरह नजर आये थे. बाद में शक्तिशाली दूरबीनों और अंतरिक्ष यानों ने पता गलाया की ये शनि के सुन्दर वलय हैं. पृथ्वी से निरिक्षण करने पर ये वलय अलग-अलग काल में अलग-अलग नजर आते हैं. यहाँ धयान देने वाली बात यह है कि सभी गैस दानव ग्रहों में कमोबेश वलय पाए जाते हैं लेकिन शनि के वलय सबसे अधिक विकसित और दृष्टिगत हैं.
१९७९ में सर्वप्रथम पायनियर ११ ने शनिं की यात्रा की थी. उसके पश्चात् अभी तक के सर्वाधिक सफल अंतरिक्ष अभियान वोएजर १ तथा २ ने भी शनि का निरिक्षण किया. कासिनी मिशन पूरे चार वर्षों तक शनि की परिक्रमा कर उपयोगी जानकारी भेजता रहा.

शनि मुख्यतः हाइड्रोजन और हीलियम से बना है जिनका अनुपात ३:१ है. इस तरह ये बृहस्पति के समकक्ष है.

शनि के वलयों में से ए और बी पृथ्वी से देखे जा सकते हैं. सी नामक धुंधला वलय भी शक्तिशाली दूरबीन से देखा जा सकता है. प्रथम दो वलयों के बीच की दूरी को कासिनी डिवीज़न कहा जाता है. वोएजर अभियानों ने शनि के अनेक वलयों की खोज की है जो पृथ्वी से किये निरिक्षण में अज्ञात थे. शनि के वलय छोटे-छोटे कणों से मिलकर बने हैं जिनके कुछ सेंटीमीटर से लेकर किलोमीटर तक के कण संभव हैं. शनि के वलयों का घनत्व काफी कम हैं. इन वलयों के मध्य कुछ रहस्यमय आकृतियाँ भी पायी गयी हैं जो शायद चुम्बकीय क्षेत्रों के कारण बनी हो सकती हैं.

शनि के वलय के बारे में दो सिद्धांत प्रचलित हैं. प्रथम में यह माना जाता हैं कि ये वलय शनि के किसी पूर्व चन्द्रमा के अवशेष हैं जो किसी कारण से नष्ट हो गया और उसके टुकड़े शनि के गुरुत्वाकर्षण के कारण रिंग की शक्ल में व्यवस्थित हो गए हैं. दूसरा विचार यह कहता है कि शनि के बनने के समय उपस्थित नेबुला पदार्थों जिससे शनि का जन्म हुआ है, ये वलय उन्हीं पदार्थों के अवशेष हैं जो शनि में परिवर्तित नहीं हो पाए थे.
शनि के  कुछ चन्द्रमा गडरिये (शेफर्ड) की तरह का व्यवहार करते हैं अर्थात ये वलयों को बिखरने से रोकते हैं तथा उन्हें बांधकर रखते हैं.

शनि के कम से कम १५० चन्द्रमा माने जाते हैं जिनमे से वर्तमान में ५३ के नाम अधिकारिक रूप से रखे जा चुके हैं. शनि का सबसे बड़ा चन्द्रमा टाइटन है जो खोज के बाद से ही वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल का विषय रहा है.
शनि के चंद्रमों की सूची और सम्बंधित जानकारी जल्द ही.


Thursday, August 8, 2013

बृहस्पति (Jupiter)

बृहस्पति ग्रह
बृहस्पति या ज्यूपिटर क्रम के हिसाब से सौरमंडल का पांचवा परन्तु सबसे बड़ा ग्रह  है. इस ग्रह  की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की इस एक ग्रह  का द्रव्यमान, सौर मंडल के बाकी सभी ग्रहों के द्रव्यामन के योग का भी दुगुना है. शायद इसी लिए इस ग्रह का नाम ज्यूपिटर रखा गया है क्योंकि रोमन मिथकों में जुपिटर देवताओं के राजा थे. हिंदी मिथक के आधार पर भी इस ग्रह  का नाम बृहस्पति रखा गया है जो की देवताओं के गुरु माने जाते हैं.

बृहस्पति के सबसे पहला निरिक्षण गैलिलियो ने दूरबीन से किया था साथ ही उस समय संभव अपनी दूरबीन से उन्होंने इसके चार प्रमुख चंद्रमाओं – आयो, युरोपा, गेनिमेड और कैलिस्टो की भी खोज कर ली थी. गलीलियो के द्वारा खोजे जाने के कारण उनके सम्मानस्वरूप इन चंद्रमाओं को गलिलियाँ चन्द्रमा भी कहते हैं.
बृहस्पति के लिए प्रथम अभियान पायनियर १० के साथ प्रारंभ हुआ. पायनियर की अगली कड़ी पायनियर ११ के बाद वायेजर श्रंखला के दोनों यान इस ग्रह  का अध्ययन करते हुए गुजरे. गैलिलियो अभियान के अंतर्गत गैलिलियो यान पूरे आठ वर्षों तक इसकी परिक्रमा करता रहा और जरूरी आंकड़े भेजता रहा.

बृहस्पति को कुछ वैज्ञानिक असफल सितारा भी कहते हैं क्योंकि इसकी आतंरिक संरचना सूर्य की तरह की ही है जिसमे हाइड्रोजन और हीलियम प्रचुर मात्रा में उपस्थित हैं, परन्तु इसमें नाभिकीय संविलियन के लायक उर्जा नहीं है अन्यथा बृहस्पति स्वयं एक सितारा होता.

बृहस्पति का चुम्बकीय क्षेत्र अन्यंत शक्तिशाली है जो ६५ करोड़ किलोमीटर तक फैला हुआ है. यह चुम्बकीय क्षेत्र शनि ग्रह  की कक्षा तक फैला हुआ है, इसके सभी उपग्रह इसी क्षेत्र के अन्दर स्थित हैं.

वोएजर १ से बृहस्पति में भी शनि जैसे वलयों का पता चला है जो चट्टानों के धुल कणों से बने हैं.
बृहस्पति, उपग्रहों के मामले में भी सबसे बड़ा परिवार रखता है, अभी तक इसके ६३ उपग्रह आधिकारिक रूप से ज्ञात किये जा चुके हैं.

Tuesday, August 6, 2013

मंगल (Mars)

मंगल ग्रह
क्रम के अनुसार मंगल सौरमंडल का चौथा और आकार में बुध के बाद दूसरा सबसे छोटा ग्रह है. युद्ध के रोमन देवता मार्स के ऊपर रखे गए इस ग्रह को ‘लाल ग्रह’ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसकी सतह पर आयरन ऑक्साइड की अधिकता इसे लाल आभा प्रदान करती है.

मंगल को प्रागैतिहासिक काल से जाना जाता है. धरती के बाहर जीवन की परिकल्पना करने वाले वैज्ञानिकों के लिए मंगल सर्वश्रेष्ठ संसार रहा है. लोवेल दे द्वारा मंगल की सतह पर निरिक्षण के दौरान पाए गई नहरों जैसी आकृतियों ने इस कल्पना को और बल दिया लेकिन अंतरिक्ष अभियानों ने इन कल्पनाओं को गलत साबित कर दिया. परन्तु इसके बाद भी मंगल मानव बस्ती बसने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त और सुगम ग्रह माना जाता है और इस दिशा में लगातार प्रयास भी हो रहे हैं.

मार्स क्यूरोसिटी रोवर
मंगल अभियान की शुरुआत में हुयी जब मैरिनर श्रृंखला का मेरिनर -४ सन १९६५ में मंगल के पास पंहुचा. इसके पश्चात् मार्स-२ नाम का प्रोब मंगल की धरती पर उतरने में सफल हुआ. वाइकिंग श्रृंखला के दो यान भी मंगल अभियान से जुड़े और १९९७ में मार्स पाथ फाइंडर मंगल की धरती पर उतरा. २००४ में मार्स एक्सपीडिशन रोवर और पुनः २००८७ में फीनिक्स अभियान मंगल पर जीवन और जीवन से जुडी संभावनाओं की तलाश में उतारे गये.

मंगल ग्रह की आतंरिक संरचना के बारे में अभी निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. यह माना गया है की इसके केन्द्रक में पिघली चट्टानों का मेंटल है. इसके ऊपर ३५ से लेकर ८० किलोमीटर की भू-पर्पटी है. वैसे मंगल का घनत्व बाकी चट्टानी ग्रहों में सबसे कम है. इसके सतह पर पानी होने के संकेत मिले हैं. ऐसा माना जाता है की कई लाख साल पहले यहाँ पर भी समुद्र थे होंगे. मंगल के ध्रुवों पर पानी बर्फ के रूप में प्राप्त हुयी है और भी कई जगहों पर बर्फ होने का अनुमान है. ये बर्फ पानी और कार्बन डाई ऑक्साइड की है.

ओलम्पस माँन
मंगल की सतह विविधताओं से भरी हुयी है. २४ किलोमीटर ऊँचा ओलम्पस मान सौर मंडल में खोजा गया सबसे बड़ा पर्वत है. वहीँ थारसिस १० किलोमीटर ऊँचा और ४००० किलोमीटर के दायरे में फैला एक वृहद् पठार है. और वैलेस ४००० किलोमीटर में फैला गहरी घाटियों की श्रृंखला है.

१९९६ में मंगल से सम्बन्घित उल्का पिंड में सूक्ष्म जीव होने के सबूत मिले थे परन्तु इस सम्बन्ध में विवाद है. अगर मंगल पर जीवन है तो भी वह अभी तक अज्ञात है.

मंगल पर चुम्बकीय क्षेत्र काफी कमजोर है. ग्लोबल सर्वेयर के अनुसार प्राप्त ये जानकारी मंगल पर किसी समय रहे विस्तृत चुम्बकीय क्षेत्र होने का अनुमान देती है.

मंगल के दो उपग्रह हैं – फोबोस और डेमोस. ये दोनों ही उपग्रह अत्यंत छोटे हैं. इनके खोज का श्रेय हॉल को जाता है. जिन्होंने १८७७ में इन दोनों चंद्रमाओं की खोज की थी.

Monday, August 5, 2013

हौमिया (haumea)

हौमिया एक क्षुद्र गृह है  136108 हौमिया रखा गया था. इसे नेपच्यून की कक्षा के बाहर खोजा गया था. हौमिया का द्रव्यमान प्लूटो के द्रव्यमान का केवल एक तिहाई है. इसका पता २००४ में पालोमार वेधशाला में एक दल ने लगाया था जिसका नेतृत्व माइक ब्राउन कर रहे थे. २००५ में स्पेन के एक दल ने भी इसका दावा किया परन्तु इसे मान्यता नहीं मिली है. १७ सितम्बर २००८७ को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष संगठन के द्ववारा इसे बौने गृह के रूप में वर्गीकृत किया था और हौमिया नाम दिया गया जो हवाई द्द्वीप में शिशु जन्म की देवी मानी जाती है.

हौमिया की कक्षा अन्य क्यूपर बेल्ट पिंडों की तरह है. यह सूर्य का एक चक्कर २८३ पृथ्वी वर्षों में लगाती है. २००५ में जेमिनी और केक दूरदर्शी ने हौमिया की सतह का एक स्पेक्ट्रा प्राप्त किया था जी इसकी सतह पर क्रिस्टल में परिवर्तित पानी की बर्फ के होने का अनुमान देती है. आश्चर्यजनक रूप से इस तरह की संरचना हेतु ११० क से ज्यादा का तापमान वांछित है परन्तु अध्ययन के अनुसार हौमिया की सतह का तापमान ५० क से भी कम है. खैर आने वाले दिनों में नए अंतरिक्ष अभियानों से शायद इस बात का खुलासा हो सके.
काल्पनिक चित्रण - हौमिया और उपग्रह

वर्त्तमान तक इसके आकार का प्रत्यक्ष अध्ययन नहीं किया गया है परन्तु इससे परावर्तित प्रकाश का अध्ययन इसके अंडाकार होने का अनुमान देता है. हौमिया के दो चंद्रमाओं का भी पता चला है जिनका नाम हाईका और नमाका रखा गया है.

Sunday, August 4, 2013

The Solar System in a Brief Glance

सौर मंडल के बारे में संक्षिप्त जानकारी देता यह हाई डेफिनिशन विडियो यू-ट्यूब में देखी जा सकती है. यह विडियो वैसे तो अंग्रेजी में है पर बहुत ही सरल भाषा में.

अंतरिक्ष विषय के चाहने वालों के लिए ये एक बेहतरीन विडियो है.

 

Saturday, August 3, 2013

शुक्र (Venus)

सुन्दरता और प्यार की देवी वीनस के नाम से नवाजे गए ग्रह शुक्र का आतंरिक ग्रहों में दूसरा स्थान है. सूर्य से लगभग 108,200,000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शुक्र ग्रह को प्रागैतिहासिक काल से ही जाना जाता था क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा के बाद यही आकाश में सबसे चमकीला पिंड नजर आता था. बुध की ही तरह इसे भी कभी सुबह का तो कभी शाम के तारे के रूप में जाना जाता था.
मैगेलन से प्राप्त इमेगेस के आधार पर शुक्र 



शुक्र एक उपग्रह विहीन ग्रह है. इसका अपने अक्ष पर घूर्णन अत्यंत धीमा है. शुक्र पर एक दिन पृथ्वी के २४३ दिनों के बराबर है. पृथ्वी की इसकी केवल एक ही सतह हमेशा नजर आती है परन्तु यह चन्द्रमा की तरह कलाएं प्रदर्शित करता है.



शुक्र का वातावरण तेज़ाब की तरह है. यह मुख्यतः कार्बोन डाई ऑक्साइड से बना है जिसमे सल्फ्यूरिक अम्ल के बादलों की कई किलोमीटर मोटी परत है. इसके धरातक पर भी सैकड़ों ज्वालामुखियों का पता चला है. इन ज्वालामुखियों से निकली लावा से शुक्र गृह का अधिकाँश भाग ढाका हुआ है. यद्यपि कुछ को छोड़ कर बाकी ज्वालामुखी लाखों वर्ष से शांत हैं. इस सभी कारणों से ग्रीन हाउस प्रभाव की अधिकता के कारण शुक्र का तापमान बुध से लगभग दुगुना है जबकि यह सूर्य से बुध की तुलना में काफी दूर स्थित है.

शुक्र की सतह पर उल्का पात से बने गड्ढे
शुक्र की गर्मी का पता इस बात से भी चलता है की वहां कोई क्रेटर नहीं है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इसकी सतह से टकराने के पूर्व ही उल्का पिंड जल जाते होंगे.



शुक्र ने सदा से ही अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को आकर्षित किया है. ऐसा माना जाता रहा था की शुक्र पृथ्वी के सदृश्य होगा और शायद वहां भी जीवन होगा. इसी कारण इस गृह के लिए अनेकों अंतरिक्ष अन्वेषक मिशन चलाये गए थे. परन्तु इन अभियानों ने शुक्र की एक अलग ही तस्वीर पेश की तो प्रेम की नहीं बल्कि क्रोध से तपती धरती की तरह की थी.



मेरीनर २ अपनी कक्षा में
शुक्र पर अभी तक लगभग २० अभियान भेजे जा चुके हैं जिसमे सबसे पहला था १९६२ में मेरीनर २. सोवियत यान वेनेरा ९ ने सबसे पहले शुक्र गृह की सतह की तसवीरें भेजी थी और अमरीकी यान मैगेलन ने इसका नक्शा तैयार किया था.



चुम्बकीय क्षेत्र से रहित यह गृह पूर्णतः निर्जीव है. शायद इसलिए अब वैज्ञानिकों का ध्यान और उम्मीद मंगल गृह पर केन्द्रित है, क्योंकि बढती आबादी के कारण किसी नए निवास की खोज भविष्य की आवश्यकता हो सकती है.

बुध (मरकरी)

मरकरी) सौर मंडल का सबसे छोटा तथा सूर्य का सबसे नजदीकी ग्रह है. बुध अपनी कक्षा में सूर्य की एक परिक्रमा ८८ पृथ्वी दिनों में पूरी करता है जो किसी भी ग्रह की तुलना में सबसे तेज है . शायद इसी तेज गति के कारण ही इसका नाम रोमन देवताओं के संदेशवाहक मरकरी के नाम पर रखा गया.

प्राचीन अन्वेषकों को बुध ग्रह का पता ईसा से तीन सताब्दी पूर्व ही चल गया था. कभी इसे सुबह का तारा तो कभी सांध्य तारे के नाम से जाना जाता रहा है.  

बुध एक उपग्रह विहीन गृह है .  बुध के पास लगभग नहीं के बराबर वातावरण है जिसके कारण बुध की सतह अविश्वश्नीय रूप में तापमान के उतार – चढ़ाव को सहती है. दिन में जहां तापमान to700 K (427 °C; 800 °F) तक रहता है वहीँ रात को तापमान 100 K (−173 °C; −280 °F) तक उतर जाता है.  . ध्रुवों पर तापमान लगभग सामान रूप से 180 K (−93 °C; −136 °F) से थोडा नीचे बना रहता है . बुध की सतह गहरे गड्ढों से भरी हुयी है जो सैकड़ों किलीमीटर लम्बे और लगभग तीन किलोमीटर तक गहरे हैं. इनकी वजह से बुध की धरती हमारे चन्द्रमा की सतह सी लगती है. ये क्रेटर इस बात के सबूत हैं की बुध की सतह करोड़ों सालों से निष्क्रिय है.

मेरीनर १० - बुध का अध्ययन करते हुए
बुध में अन्य सौर ग्रहों की तरह मौसम नहीं पाए जाते. साथ ही इसकी परिक्रमा और घूर्णन पूरे सौर जगत में अनोखा है. यह सूर्य की दो परिक्रमा पूर्ण करने (दो बुध वर्ष) में अपने अक्ष पर केवल तीन बार घूमती है.  यद्यपि बुध धरती से एक चमकीले सितारे के रूप एमें नजर आता है, सूर्य से इसकी नजदीकी की वजह से शुक्र गृह की तुलना में इसे देखना बेहद कठिन है.

बुध की बारे में तथ्य परक जानकारी हेतु अभी तक दो स्पेस मिशन भेजे जा चुके हैं – मेरिनर १० और मैसेंजर. मेरीनर १०, १९७४ तथा १९७५ के दौरान तीन बार बुध की यात्रा कर चूका है तथा मैसेंजर २००४ में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था. इन यानों की बदौलत अभी तक बुध के लगभग ४५% भाग के नक्शा तैयार किया जा चुका है. भविष्य में नए मिशंस की बदौलत इस अद्भुत गृह के और रहस्यों पर से पर्दा उठेगा, पर शायद इसके लिए लम्बा इंतज़ार करना होगा क्योंकि अंतरिक्ष संस्थाओं का लक्ष्य अभी मंगल ग्रह है जहां जीवन की संभावनाएं तलाशी जा रही है.