Showing posts with label Russian Mission. Show all posts
Showing posts with label Russian Mission. Show all posts

Tuesday, May 15, 2018

स्पुतनिक-3 - आज से ठीक 60 वर्ष पहले सफल प्रक्षेपण

स्पुतनिक-3 (Sputnik-3)
आज से ठीक 60 वर्ष पहले 15 मई 1958 सोवियत संघ (USSR) ने विश्व के पहले सफल कृत्रिम उपग्रह श्रृंखला स्पुतनिक (Sputnik) के तीसरे उपग्रह (Sputnik-3) का सफल प्रक्षेपण किया था.  इस उपग्रह का मकसद धरती के उपरी वातावरण और नजदीकी अन्तरिक्ष के वातावरण का गहन अध्ययन करना था. स्पुतनिक-3 एक स्वचालित प्रयोगशाला की तरह था जिसमें अन्वेषण के लिए काफी सारे उपकरण भेजे गए थे.

यहाँ एक शानदार बात यह है कि वास्तव में हम जिस स्पुतनिक-3 की बात कर रहे हैं वह मूल स्पुतनिक-3 नहीं था. हुआ यूं कि स्पुतनिक-3 का प्रक्षेपण 20 अप्रैल 1958 के दिन निर्धारित किया गया था, परन्तु कुछ तकनिकी खामियों की वजह से प्रक्षेपण 27 अप्रैल को किया गया. परन्तु प्रक्षेपण के साथ ही दिक्कतों का सिलसिला शुरू हो गया. शुरूआती 1 मिनट तब सब ठीक रहा परन्तु अगले ही क्षण गड़बड़ी शुरू हो गयी . बूस्टर राकेट नष्ट हो गए और लांच व्हीकल गिरना शुरू हो गया. बाद में उपग्रह को क्रेश की जगह से खोज निकाला गया और पुनः प्रयोग के उद्देश्य से प्रयोगशाला लाया गया परन्तु विद्युत् भाग में शोर्ट-सर्किट के कारण यह जलकर अनुपयोगी हो गया.

तब बैक-अप उपग्रह और बूस्टर राकेट से 15 मई की सुबह इसका सफल प्रक्षेपण किया गया. दिक्कतें तब भी आयीं थी परन्तु उपग्रह कक्षा में स्थापित हो गया. 6 अप्रैल 1960 को लगभग 2 वर्ष के पश्चात पृथ्वी के वातावरण में प्रविष्ट होते समय जलकर यह नष्ट हो गया.

Sunday, October 16, 2016

स्पुतनिक २ - पहली बार जीवित प्राणी अन्तरिक्ष में

स्पुतनिक –  1 (Sputnik-1) के सफल प्रक्षेपण के साथ अन्तरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में प्रथम कदम बढाने के बाद उत्साहित सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने केवल 32 दिनों के अन्दर स्पुतनिक अभियान का दूसरा उपग्रह सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर विश्व को पुनः आश्चर्य में डाल दिया. इतने कम समय के भीतर दूसरा अभियान वैसे ही कम आश्चर्य की बात नहीं थी, पर इस अभियान की जो सबसे हैरत में डालने वाली बात थी इस अभियान में जीवित पशु को अन्तरिक्ष भेजना – दुसरे शब्दों में कहें तो मानव को अन्तरिक्ष भेजने की चुनौती का सामना करने की दिशा में पहला कदम . इस उपग्रह में लाइका (Laika) नामक कुतिया को अन्तरिक्ष भेजा गया और वह पहली ऐसी जीवित प्राणी बनी जो अन्तरिक्ष में पहुची, ये अलग बात है कि दुर्भाग्यवश वह अन्तरिक्ष में ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी. 

स्पुतनिक-2 (Sputnik-2), नामक विश्व का दूसरा कृत्रिम उपग्रह 3 नवम्बर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया. सोवियत संघ का यह उपग्रह लगभग 4 मीटर ऊँचा था जिसका उपरी आकर एक कोने की तरह का था. इस बार जीवित प्राणी के साथ इस उपग्रह में बहुत से नए यन्त्र लगाए गए थे ताकि यान के अनेक पहलुओं पर नजर रखी जा सके और उसे कण्ट्रोल किया जा सके.

इस यान में रेडियो ट्रांसमीटर, तापमान नियंत्रण करने के लिए प्रणाली, एक टेलीमेट्री प्रणाली, प्रोगाम इकाई जैसे कई यूनिट थे. लाइका के लिए एक अलग से केबिन बनाया गया था. इस उपग्रह से हरेक चक्कर में कुल 15 मिनट के लिए डाटा धरती में स्थित कण्ट्रोल रूम तक ट्रान्सफर किया जाता था. साथ ही इसमें सूर्य के विकिरण और कॉस्मिक किरणों के अध्ययन के लिए दो फोटोमीटर लगाए गए थे.

मजे की बात यह है कि संसार का पहला उपग्रह प्रक्षेपित कर पूरी दुनिया को स्तंभित कर देने वाले यह दोनों  अभियान (स्पुतनिक-1 और स्पुतनिक-2) सोवियत संघ के मुख्य उपग्रह प्लान का हिस्सा नहीं थे. मुख्य प्लान बाद में स्पुतनिक-3 के रूप में दुनिया के सामने आया. वास्तव में सोवियत संघ के मुख्य प्लान की सफलता में कुछ संदेह था क्यूंकि मुख्य उपग्रह का आकर बहुत बड़ा था. इसलिए इस बड़े पैमाने की योजना के बदले कोरोलेव (स्पुतनिक सीरीज के निर्माता) ने दो छोटे उपग्रह का प्रस्ताव रखा. एक बात और भी है कि स्पुतनिक सीरीज के इन दोनों उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की एक वजह अमेरिका से पहले अन्तरिक्ष क्षेत्र में बाजी मारने की भी थी, जिसमे वे पूर्ण रूप से सफल भी रहे.

इस अभियान की सबसे महत्पूर्ण सफलता किसी जीवित प्राणी को अन्तरिक्ष में सुरक्षित ले जाने की थी जिसमें यह मिशन सफल भी रहा. उस समय सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने लाइका के दस दिनों पर जीवित रहने की आशा की थी. कक्षा में उपग्रह के स्थापित होने के पश्चात् के प्रथम दो चक्कर तक लाइका पूर्णतः सुरक्षित थी परन्तु तीसरे चक्कर के पश्चात केबिन का तापमान बढ़ने लगा और कुछ ही घंटों में उच्च तापमान की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी. यह जानकारी सोवियत युग के बाद पता चली, उस समय यह बताया गया था कि वह लगभग एक सप्ताह तक जीवित थी.

स्पुतनिक-2 की एक प्रमुख खोज और रही थी – उसने धरती के रेडिएशन (विकिरण) बेल्ट का पता लगा लिया था और उससे होकर गुजरा भी. परन्तु वह कोई महत्वपूर्ण जानकारी न दे सकता क्यूंकि वह रुसी ट्रैकिंग स्टेशन से काफी दूर था. अन्यथा अन्तरिक्ष की दुनिया की एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज सोवियत संघ के नाम होती. यहाँ पर अमेरिका के पहले उपग्रह एक्स्प्लोरर–1 (Explorer-1) ने बाजी मार ली और इस बेल्ट का नाम वान-एलन बेल्ट (Van-Allen Radiation Belt) रखा गया.

अपनी यात्रा पूर्ण कर स्पुतनिक-2, 14अप्रैल 1958 को धरती पर वापस लौटा. सोवियत संघ के इन दोनों सफल अभियानों ने जहाँ सोवियत संघ के स्वप्न को मजबूती प्रदान की वहीं अमेरिका की नींद भी उड़ सी गयी. इन दोनों देशों के बीच लगी इस होड़ से अल्प समय में ही अनगिनत अन्तरिक्ष अभियान का एक लम्बा सिलसिला चल पड़ा और अन्तरिक्ष के प्रति दीवानगी बढती ही चली गयी.

Thursday, April 10, 2014

राकेश शर्मा - भारत के प्रथम अन्तरिक्ष यात्री (First Indian on Space)

रविश मल्होत्रा
राकेश शर्मा
क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा अन्तरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय हैं. राकेश शर्मा ने सेल्युत 7 अन्तरिक्ष केंद्र में 7 दिन 21 घंटे बिताये थे. 3 अप्रैल 1984 को दो अन्य सोवियत अन्तरिक्ष यात्रियों के साथ सोयूज़ टी 11 में राकेश शर्मा को अन्तरिक्ष भेजा गया था. अन्तरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाला 6 हजार 850 किलोग्राम वजनी स्पेस क्राफ्ट कजाखस्तान से रवाना हुआ था. भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन इसरो और रूस के सोवियत इंटरकॉसमॉस स्पेस प्रोग्राम के संयुक्त उपक्रम के तहत उन्हें भारत की ओर से पहले अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चुना गया. वायुसेना के एक और अफसर विंग कमांडर रविश मल्होत्रा को शर्मा के बैकअप के तौर पर चुना गया था.  

राकेश शर्मा - रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों
लियोनिद किजिम और यूरी मालिशेव के साथ

राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था. 1970 में वे भारतीय वायु सेना में बतौर पायलट अफसर शामिल हुए. १९७१ में पाकिस्तान के साथ युद्ध में राकेश शर्मा ने मिग विमान उड़ाया और अपने मिशन में सफलता हासिल की. जिसके कारण उन्हें इस मिशन के लिए चुना गया.

शर्मा के साथ स्पेस क्राफ्ट में यूरी मालिशेव और गेनाद्री स्त्रेकलोव जैसे अनुभवी अन्तरिक्ष यात्री सवार थे. दोनों को कई बार अन्तरिक्ष में जाने का अनुभव था. उस वक्त लोगों में एक भारतीय के अन्तरिक्ष में जाने को लेकर बेहद उत्साह था और वे रेडियो और टेलीविज़न के जरिये पल-पल की खबर रख रहे थे. अन्तरिक्ष केंद्र में रहते हुए राकेश शर्मा ने भारत पर केन्द्रित पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम में हिस्सा लिया. उन्होंने अन्तरिक्ष केंद्र में लाइफ साइंसेज के अलावा कई अन्य प्रयोग भी किये. साथ ही उन्होंने गुरुत्वाकर्षणहीन वातावरण में योगाभ्यास भी किया. अन्तरिक्ष मंव रहने के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने जब राकेश शर्मा से पूछा कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, तो राकेश शर्मा ने जवाब दिया. सारे जहां से अच्छा. भारत में राकेश शर्मा को अशोक चक्र से सम्मानित किया गया है. इसके अलावा उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च पुरस्कार हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन से भी नवाजा गया.