Showing posts with label Planet (ग्रह). Show all posts
Showing posts with label Planet (ग्रह). Show all posts

Sunday, May 13, 2018

गणनाओं की देन – नेपच्यून या वरुण (Neptune) ग्रह

नीलवर्ण ग्रह - नेपच्यून (वरुण) अपनी वलय-प्रणाली के साथ (कंप्यूटर जनित चित्र)
सौरमंडल के प्रारंभिक सभी ग्रहों को हमारे जिज्ञासु और मेधावी पूर्वज प्राचीन काल से ही पहचानते आये हैं. यूरेनस (अरुण) को भी वे देख सके थे भले ही उसे दूर स्थित कोई तारा समझ बैठे थे.  परन्तु अत्यंत दूर स्थित नेपच्यून (यह हमारी पृथ्वी की तुलना में सूर्य से तीस गुना ज्यादा दूर स्थित है) का पता न तो वे नग्न आखों से लगा सके, न उस वक़्त उपलब्ध दूरबीन से. तो आखिर नेपच्यून की खोज कैसे हुयी? 

नेपच्यून वह पहला ग्रह बना जिसके अस्तित्व यानि होने की भविष्यवाणी उसे देखने के पहले ही गणनाओं के माध्यम से कर दी गयी थी. हुआ यूँ कि नए-नए खोजे गए यूरेनस के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानने को उत्सुक खगोल-शास्त्री उसपर नजर गड़ाये बैठे ही रहते थे, और इसी के दौरान पता चला कि यूरेनस अपने परिक्रमा कक्ष में चलते हुए कुछ विचलित हो जाता है याने इसके सामान्य परिक्रमा पथ में परिवर्तन हो जाता है – कुछ यूं समझिये कि चलते-चलते थोड़े समय के लिए रास्ते से थोड़ा हट जाता है. इस विचलन के कारण के बारे में सबसे पहले अलेक्सिस बोवार्ड (Alexis Bouvard) ने किसी दूसरे ग्रह की उपस्थिति की सम्भावना व्यक्त की – जिसका गुरुत्वीय प्रभाव इस गड़बड़ी का कारण हो सकता था. बाद में जोहान गेले (Johann Galle) ने 23 सितम्बर 1846 को शातिशाली दूरबीन से इसकी खोज उसी स्थान पर की जिस स्थान पर ग्रह के होने की सम्भावना वेरियर (Verrier) ने प्रदर्शित की थी. इसके सबसे बड़े चाँद ट्राइटन (Triton) को भी जल्द ही खोज लिया गया था परन्तु बाकी के चंद्रमों की जानकारी बहुत बाद में ही हो पायी जब शक्तिशाली दूरबीनों और अन्तरिक्ष अभियानों ने हमारे खोजों की गति को आगे बढ़ाया. 

नेपच्यून (Neptune) या हमारा वरुण, सौरमंडल के केंद्र सूर्य से दूरी के क्रम में आँठवा तथा अंतिम मुख्य ग्रह है. अपने आकार में यह बाह्य गैसीय दानव ग्रह सौरमंडल में चौथा स्थान रखता है. नेपच्यून का नाम समुद्र के रोमन देवता के सम्मान में रखा गया था. भारतीय अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने भी उसी क्रम में इसका नामकरण जल के देवता ‘वरुण’ के नाम पर किया. 

सूर्य से इसकी दूरी पृथ्वी से सूर्य की दूरी से पूरे तीस गुना ज्यादा है. सूर्य से पृथ्वी के मध्य की दूरी को एक खगोलीय इकाई (Astrological Unit) माना जाता है तो इस दृष्टि से यह सूर्य से 30.1 खगोलीय इकाई (AU) के बराबर है या लगभग 4.50 अरब किलोमीटर.  इतनी दूर स्थित होने के कारण इसे सूर्य की एक परिक्रमा करने में लगभग 164.79 पृथ्वी वर्ष लगते हैं मतलब हमारे औसत जीवन में यह आधा चक्कर भी अपने तारे का नहीं लगा पाता. या यूं कहें कि अगर हम इस ग्रह पर जन्में होते तो अपना पहला जन्मदिवस भी नहीं मना पाते – मतलब न केक, न चॉकलेट, न उपहार – बड़ा दुखद होता. नहीं!!!

अरे हाँ, एक बात और, सूर्य से इतनी दूरी की वजह से यह जगह बेहद ठंडी है इतनी ठंडी की यहाँ बादलों में तापमान (-) 218 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है (जरा सोचिये 0 डिग्री सेल्सियस में तो बर्फ जम जाती है, उससे भी 218 कम). वहीं कोर का तापमान होता है 5100 डिग्री सेल्सियस. अब इस अंतर के बारे में आप कल्पना कीजिये.

नेपच्यून या वरुण, की बनावट अपने पड़ोसी ग्रह यूरेनस या अरुण से बहुत मिलती-जुलती है. यूरेनस की तरह ही इसके वातावरण में पानी की बर्फ के अलावा जमी हुयी अमोनिया और मीथेन गैसों की बर्फ प्रचुर मात्रा में है. इसलिए इसे भी यूरेनस की तरह ‘बर्फीला गैस दानव’ कहकर सम्बोधित किया जाता है. इसका वायुमंडल हाइड्रोजन, हीलियम और हाइड्रो-कार्बन से बना है.  नेपच्यून की तस्वीरों में बादल, तूफ़ान और मौसम का बदलाव स्पष्ट तौर पर नजर आता है, इसका एक कारण यह भी है कि इस ग्रह पर चलने वाली तूफ़ान हवाएं सौरमंडल के किसी भी अन्य ग्रह की तुलना में काफी तेज रफ़्तार से चलती हैं.  बृहस्पति पर चलने वाले तूफ़ान से बने ‘ग्रेट रेड स्पॉट’ की तरह ही नेपच्यून पर वायेजर को एक ‘बड़ा गाढ़ा धब्बा’ नजर आया था जब 1989 में वह इस ग्रह के पास से गुजरा था. नील वर्ण से सुशोभित यह ग्रह मीथेन की प्रचुरता के कारण यह रंग धारण करता है (पृथ्वी का नीला रंग जीवन-दायक जल की वजह से होता है, ऐसे ही बता दिया )

एक बात और – ग्रह के पास बहुत ही विरल वलय-प्रणाली पायी गयी है जो मुख्यतः बर्फ से बनी हैं और सिलिकेट या कार्बन के यौगिकों से निर्मित है. यह वलय प्रणाली रक्त-वर्ण आभा से युक्त है. 
नेपच्यून का सबसे बड़ा चाँद - ट्राइटन (Triton)

अंत में बात करते हैं – इसके उपग्रहों की. नेपच्यून बाह्य ग्रहों में या गैसीय दानवों में इस मामले में सबसे गरीब है जिसके पास केवल 14 उपग्रह हैं. यूरेनस (अरुण) के पास लगभग दोगुने 27 उपग्रह हैं. शनि और बृहस्पति से तो कोई मुकाबला ही नहीं है. इसका सबसे बड़ा उपग्रह है ट्राइटन (Triton) – इतना विशाल और भारी की नेपच्यून की कक्षा में स्थित समस्त द्रव्यमान का 99.5% अकेले ट्राइटन पूर्ण करता है. मतलब बाकी मिलाकर केवल 0.5% द्रव्यमान रखते है. अब इसी बारे में एक शानदार बात भी है कि यह बाकी उपग्रहों की तुलना में विपरीत दिशा में घूमता है और शायद नेपच्यून के निर्माण के समय बना उसका उपग्रह न होकर कोई क्षुद्र ग्रह हो जो नेपच्यून के गुरुर्वाकर्षण में फंस गया हो. बेचारा. इसकी खोज ग्रह की खोज के केवल 17 दिन बाद ही विलियम लासेल (William Lassell) के द्वारा की गयी थी. 

दूसरा उपग्रह या चाँद था नेरेइड (Nereid). इसके बाद वायेजर ने इसके 6 और उपग्रह खोज निकाले. अगले सारे उपग्रह इसी शताब्दी में खोजे गए. सबसे नया उपग्रह 2013 में खोजा गया. नेपच्यून के उपग्रहों के नामों की खास बात है कि जहाँ ग्रह का नाम रोमन समुद्र देवता पर रखा गया है – वहीँ उपग्रहों के नाम भी समुद्र के अन्य देवताओं पर रखे गए हैं.

नेपच्यून के पास अभी तक केवल वायेजर -2 ही पहुँच सका है (हैं न वायेजर श्रृंखला अद्भुत- ये आज भी काम कर रहे हैं, आपको पता). भविष्य में इस दिशा में शायद प्रयास हो और इस ग्रह और इसके उपग्रहों के बारे में हम ज्यादा से ज्यादा जान सके क्योंकि धरती के प्रेक्षणों से इतनी दूर स्थिति पिंडों की जानकारी असंभव है. तो बस इन्तजार है समुद्र के देवता के गर्त में छिपे रहस्यों से पर्दा उठने का...

Sunday, April 29, 2018

पहला आधुनिक ग्रह - यूरेनस (Uranus) या अरुण

अपने वलय प्रणाली के साथ यूरेनस
लेख का शीर्षक काफी लोगों को थोड़ा अजीब सा लगा होगा – ये पहला आधुनिक ग्रह आखिर है क्या बला!!! चलिए इसी बारे में बात की शुरुआत करते हैं – यूरेनस (Uranus) या अरुण के पहले के हमारे सभी सौरमंडल के साथी ग्रह (बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि) प्राचीन काल से ही हमें ज्ञात रहे. वैसे तो यूरेनस को भी नग्न आखों से देखा जाता है परन्तु इसकी रोशनी बाकी ग्रहों से इतनी कम होती है कि हमारे पूर्वजों ने इसे दूर स्थित कोई तारा ही समझा था. वो तो 13 मार्च (मेरे जन्मदिवस पर :-)) 1781 को विलियम हर्शेल (William Herschel)नामक खगोलशास्त्री ने इसकी खोज शक्तिशाली दूरबीन से की और इसे ग्रह का दर्जा पाने का मौका मिला. यह दूरबीन से खोजा गया पहला ग्रह था – यानि पहला आधुनिक ग्रह. सरल सी बात...

यूरेनस या अरुण हमारे हमारे सितारे सूर्य से दूरी के क्रम में सातवाँ ग्रह है. गैसीय दानव ग्रहों में वर्गीकृत यह ग्रह हमारे धरती से 63 गुणा बड़ा (सौरमंडल में तीसरा सबसे बड़ा ग्रह) है परन्तु वजन में केवल 14.5 गुणा क्यूंकि लगभग पूरा ग्रह ही गैसों से बना हुआ है. कठोर तथा द्रवीय संरचना के नाम पर इसमें पानी, जमी हुयी अमोनिया और मीथेन की बर्फ है. मतलब बर्फ का खजाना – बस खाने लायक नहीं; इसलिए यह सौरमंडल में सबसे ठंडा ग्रह है, इतना ठंडा की इसका तापमान -224 सेंटीग्रेड तक चला जाता है. इसके इतना ठंडा (नेप्चून से भी ज्यादा) होने के रहस्य का स्पष्तः कारण अज्ञात है. कुछ परिकल्पनाएं है जो कहती हैं की शायद अपने निर्माण काल में किसी बड़े पिंड से इसकी टक्कर हुयी होगी जिससे इसके निर्माण के समय उपस्थित उष्मा अन्तरिक्ष में निष्काषित हो गयी होगी. ये भी संभावना है कि बाह्य वायुमंडल में कोई अवरोध सूर्य की उष्मा को अन्दर आने से रोक देता हो. या शायद कोई अवरोध कोर की गर्मी को धरातल पर आने से रोक रहा हो. 

गैसीय दानव ग्रह यूरेनस के केंद्र में ही चट्टान होने की प्रबल सम्भावना है, अन्यथा पूरा ग्रह ही बादलों और बर्फो से बना हुआ है. वैज्ञानिकों ने जो ग्रहीय संरचना का अनुमानित मॉडल तैयार किया है उसके अनुसार ग्रह में तीन अलग-अलग परते हैं. लोहा-निकिल-सिलिकेट का चट्टानी कोर इसके केंद्र में, मध्य में बर्फ और बाह्य भाग में गैसें. मध्य भाग में बर्फ के साथ जल वाष्प भी है जिसमें उच्च विद्युत चालकता भी है. अमोनिया की प्रचुर मात्रा की वजह से इसे ‘अमोनिया सागर’ भी कहा जाता है.  


यूरेनस, सूर्य से लगभग 3 अरब किलोमीटर (अधिकतम दूरी) और 2.74 अरब किलोमीटर (न्यूनतम दूरी) पर अंडाकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करता है. इतनी लम्बी परिक्रमा कक्षा eके कारण इसे हमारे 84 वर्षों के बराबर समय लगता है. इसकी परिक्रमा पथ की सटीक गणना के लिए वैज्ञानिक अध्ययन कर ही रहे थे कि एक शानदार खोज हो गयी. हुआ ऐसा की समय के साथ ग्रह की कक्षा अनुमान से मेल खाते नहीं मिल पा रही थी तब जॉन सी. एडम्स (John C. Adams) ने किसी नए ग्रह की इसकी कक्षा के बीच होने की सम्भावना व्यक्त की जिसके गुरुत्वाकर्षण से यह विसंगतियां आ रही थी होंगी. और आखिरकार नेपच्यून (Neptune) भी मिल ही गया, बिलकुल व
हाँ, जहाँ इसकी सम्भावना व्यक्त की गयी थी.

एक और शानदार बात – एक सौर परिक्रमा के 84 पृथ्वी वर्षों में इसके ध्रुवों पर केवल एक बार दिन होता है और एक बार रात यानि 42 पृथ्वी वर्ष लगातार दिन और फिर लगातार रात. इसका कारण है कि यूरेनस की घूर्णन धुरी सौरमंडल के तल के समानांतर है जिससे आधी परिक्रमा में एक ध्रुव सूर्य की ओर रहता है और अगले भाग में दूसरा ध्रुव.
यूरेनस के पाँच सबसे प्रमुख प्राकृतिक उपग्रह
अंत में बात करते हैं यूरेनस के ज्ञात प्राकृतिक उपग्रहों की – यूरेनस के वर्तमान तक कुल 27 उपग्रह आधिकारि तौर पर ज्ञात हैं और इन सभी के नामकरण अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध पात्रों (खासकर शेक्सपियर) के ऊपर किये गए हैं, जैसे – मिरांडा (Miranda)  और  एरियल (Ariel) - द टेम्पेस्ट (The Tempest) से, टाइटेनिया (Titania) और ओबेरोन (Oberon) - अ मिडसमर नाईट’स ड्रीम्स (A Midsummer Night's Dreams) से. कुछ उपग्रहों के नाम अलेग्जेंडर पोप (Alexander Pope) की कृतियों से भी लिए गए हैं जैसे अम्ब्रिअल (Umbrial). इनमें टाइटेनिया सबसे बड़ा और सौरमंडल में आठंवा सबसे बड़ा चाँद है. 

यूरेनस बहुत सुदूर स्थित है. दुर्भाग्यवश या ये कहें कि व्यावहारिक दिक्कतों की वजह से यूरेनस के लिए अभियान नहीं हो पाए हैं. अभी तक सबसे नजदीक वायेजर 2 (Voyager 2) ही पहुँच पाया है, जिसने जनवरी 1986 में इसके चाँद ओबेरोन के चित्र भेजे थे. इसके बाद यूरेनस या इसकी प्रणाली अछूती ही रह गयी है.

भविष्य में नयी जानकारियों की आशाओं के साथ....

Thursday, April 12, 2018

वलयों से सुशोभित दुनिया – शनि

 
शनि ग्रह अपने वलयों के साथ (Saturn with its Rings)
भले ही शुक्र ग्रह (Venus) को ‘सौन्दर्य की देवी’ का नाम दिया गया हो, पर अपने अद्भुत वलयों से सुशोभित शनि ग्रह (Saturn), सुन्दरता में अद्वितीय है. (हमारी धरती-पृथ्वी को छोड़कर). हमारे पौराणिक गाथाओं से युक्त देश में इसका नाम सूर्यपुत्र शनिदेव के नाम पर रखा गया है. बाह्य ग्रहों (Outer Planets) में शामिल शनि ग्रह एक गैसीय दानव (Gas Giant) ग्रह है, जो सूर्य से दूरी के क्रम में छठवां ग्रह है. यह हमारे सौरमंडल में बृहस्पति (Jupiter) के बाद दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है. 

शनि, सूर्य से लगभग 1.4 अरब किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इसे सूर्य की एक परिक्रमा करने में 10759 पृथ्वी दिवस लग जाते हैं याने शनि पर एक वर्ष (सूर्य की एक परिक्रमा) हमारे 29.5 वर्षों के बराबर होती है – उस हिसाब से हमारी औसत आयु मात्र 2 वर्ष है शनि ग्रह पर. उपसौर (Perihelion) और अपसौर (Aphelion)में लगभग 15.5 करोड़ किलोमीटर का अंतर होता है याने शनि के परिक्रमण मार्ग में ग्रह की सूर्य से क्रमशः निकटतम और अधिकतम दूरी होती है.  

शनि की अद्भुत वलय प्रणाली (Ring System) इसे सौरमंडल में अनुपम स्थान प्रदान करती है. शनि के यह वलय वास्तव में वलयों का एक समूह है जिसमें नौ मुख्य वलय और तीन अपूर्ण वलय शामिल हैं. ये वलय मुख्य रूप से अन्तरिक्षीय चट्टानों के टुकड़ों, धूल और 93%  तक बर्फ से निर्मित हैं. वलयों की औसत मोटाई 20 मीटर तक है. वैसे वलय प्रणाली बाकी बाह्य ग्रहों या गैसीय दानवों में भी हैं, परन्तु शनि के वलय सुस्पष्ट होने की वजह से विशिष्ट हैं. शनि के इन वलयों की उत्पत्ति के लिए मुख्य रूप से दो संभावनाएं मानी जाती हैं – सबसे प्रचलित मान्यता यह है की यह शनि का कोई बड़ा सा चाँद था जो नष्ट हो गया, परन्तु इसके अवशेष शनि से दूर ना जा पाए और गुरुत्व में बंधकर वह इसके इर्द-गिर्द एकत्र हो गए. दूसरी संभावना यह है कि जिन निहारिकीय सामग्रियों से शनि का निर्माण हुआ है ये उसकी बची हुयी मात्रा है जो किसी कारण ग्रह का रूप न बन सकी और वलयाकार आकृति में ढलकर शनि का हिस्सा बनी रह  गयी. परन्तु कुछ गणनाएं दूसरी मान्यता को ख़ारिज करती हैं जो शनि और इन वलयों की उम्र में अंतर पर आधारित हैं. 
टाइटन (Titan )

उपग्रहों के मामले में भी शनि बेहद धनी है. अभी तक इसके कुल 62 चन्द्रमा स्पष्टतः खोजे जा चुके हैं, जिनमे से 53 का  आधिकारिक तौर पर नामकरण भी किया जा चुका  है. वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि वलयों के बीच अनेक चन्द्रमा और होंगे, परन्तु बढती संख्या के कारण उन्हें वलय का भाग मान लिया जाना ज्यादा उचित होगा. वैसे शनि के इस विशाल उपग्रह प्रणाली में टाइटन (Titan) भी है जो कि शनि का सबसे बड़ा और सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा चाँद है. टाइटन तो बुध ग्रह (Mercury) से भी बड़ा है और एकमात्र चाँद है जिसका अपना वायुमंडल है; जिसकी वजह से यह कभी कभी एक लघु ग्रह होने का आभास भी देता है. 

शनि का बाह्य भाग मुख्य रूप से गैसों का बना है जिसकी वजह से इस गैस दानव के रूप में वर्गीकृत किया गया है, परन्तु इसका आतंरिक कोर  लोहा, निकिल और सिलिकॉन-ऑक्सीजन यौगिकों से निर्मित चट्टानों से बनी है जो हाइड्रोजन की एक मोटी परत से घिरा हुआ है. अमोनिया के क्रिस्टलों से युक्त उपरी वायुमंडल की वजह से यह पीला वर्ण प्रदर्शित करता है. यह ग्रह ध्रुवों पर चपटा और भूमध्य रेखा के समीप कुछ उभरा हुआ है, मानों किसी ने नर्म गेंद को ऊपर नीचे से पकड़ कर दबा दिया हो. पर ये गेंद, हमारे गोले से 318 गुणा भारी है. 

जब वायेजर (Voyager) अन्तरिक्ष यान शनि के पास से गुजरे तो उन्होंने एक सुन्दर षटकोणीय बादलों की संरचना देखी जिसमें प्रत्येक सीधी भुजा 13,८०० किलोमीटर लम्बी थी, एक तरह से देखें तो इतनी बड़ी भुजा कि पृथ्वी के आर-पार निकल जाए.  वहीं दक्षिणी ध्रुव में अरबों वर्षों से जारी एक तेज तूफ़ान भी देखा गया है. 

शनि का वर्णन प्राचीनतम सभ्यताओं में भी मिलता है, क्योंकि अपने विशाल आकार के कारण यह नग्न आखों से एक सितारे के रूप में नजर आता है. प्राचीन काल से ही विश्व की विभिन्न पौराणिक गाथाओं और किवदंतियों में इसका उल्लेख प्राप्त होता है. प्राचीन रोमन कथाओं में कृषि के देवता सैटर्न (Saturn) के ऊपर इस ग्रह का नामकरण किया गया है जो कि युनान के देवता क्रोनस के समकक्ष है. वहीं भारतीय सभ्यता में इसे सूर्य के प्रतापी पुत्र शनिदेव के रूप में मानकर इसकी पूजा की जाती है. 

जब दूरबीन (Telescope) का आविष्कार हुआ तो गलीलियो (Galileo Galilie) ने इस ग्रह को देखा था, परन्तु उन्होंने इसके वलयों को दो नए चाँद मान लिया था. बाद में जब क्रिस्चियन होगंस (Christiaan Huygens) ने ज्यादा शक्तिशाली दूरबीन से इसे देखा तब इस ग्रह की यह खूबसूरत संरचना दुनिया के सामने आई. उन्होंने ही सौरमंडल के सबसे चर्चित चाँद टाइटन की भी खोज की. बाद में कैसिनी (Cassini) ने चार और चन्द्रमा खोज निकाले. आज तो यह संख्या काफी बड़ी हो गयी है और अनेक नए चंद्रमाओं की उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता. 

भू-प्रेक्षणों से अलग, अन्तरिक्ष अभियानों में, सर्वप्रथम पायनियर-11 (Pioneer-11) ने , 1979 में शनि का पहला फ्लाई-बाई (ग्रह के नजदीक से गुजरना परन्तु कक्षा में प्रवेश न करना) किया. उसने धरातलीय तस्वीरों के साथ वलयों का अध्ययन भी किया. अगले ही वर्ष सफलतम वायेजर श्रृंखला (Voyager Series of Dual Space-Crafts) के प्रथम उपग्रह ने ग्रह, वलयों और उपग्रहों की सुस्पष्ट तसवीरें और आंकड़े प्रेषित किये. वायेजर 2 ने भी अगले वर्ष जाकर अपना योगदान दिया. 

शनि ग्रह का पहला वृहद् अन्तरिक्षीय अभियान नासा, जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL- Jet Propulsion Laboratory), यूरोपीय अन्तरिक्ष संस्था (ESA - European Space Agency) और इटली की अन्तरिक्ष संस्था (ASI – Italian Space Agency) ने कैसिनी- होगंस (Cassini-Huygens) अन्तरिक्ष यान के रूप में शुरू किया जिसका नामकरण  शनि के प्रारंभिक दोनों आधुनिक प्रेक्षकों के सम्मान में किया गया. 1 जुलाई 2004 को यह यान शनि की कक्षा में प्रविष्ट हुआ. इस अभियान में शनि, वलयों और उसके चंद्रमाओं विशेषकर टाइटन (Titan) और फ़ोबे (Phoebe) का गहराई से अध्ययन किया और अत्यंत स्पष्ट चित्रों को धरती पर प्रेषित किया. 14 जनवरी 2005 को यह टाइटन की सतह पर उतरने में सफल हुआ. शनि पर विद्युत् के विशाल भण्डार का भी पता चला. इन खोजों से शनि के उपग्रहों पर विशाल मात्रा में बर्फ की मौजूदगी का पता चला और इसका उपग्रह एन्सेलेडस (Enceladus), पृथ्वी के बाद सर्वाधिक जीवन की संभावनाओं वाले पिंड के रूप में उभरा. टाइटन में कैस्पियन सागर जितने बड़े हाइड्रो-कार्बन समुद्र का पता चला. 

भविष्य में शनि ग्रह की नयी खोजों के साथ यह रहस्यमय ग्रह और उससे भी ज्यादा कौतूहलपूर्ण चंद्रमाओं की यह दुनिया संसार को आश्चर्यचकित करती रहेगी...इस विश्वास के साथ....

Saturday, February 10, 2018

मृत्यु का देवता - यम (pluto) - ग्रह या बौना ग्रह?

प्लूटो और शेरोन
प्लूटो (Pluto - जिसे हिंदी में यम ग्रह के नाम से जाना जाता है), एक समय में हमारे सौरमंडल के नवम ग्रह के रूप में सुशोभित था. परन्तु वर्तमान में इससे मुख्य ग्रह (बाहरी ग्रह – बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून के साथ) का पद छीन लिए जाने के कारण यह अब बौना ग्रह (Dwarf Planet) माना जाता है (इसे ग्रहों की सूची से क्यों बाहर किया गया, इस पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे). इस ग्रह की खोज फरवरी 1930 में लोवेल शोधशाला (Lowell Observatory) में अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबौ (Clyde William Tombaugh) ने की थी. गणनाओं की सत्यता स्थापित होने के बाद March 13, 1930  को एक नए ग्रह की खोज की घोषणा की गयी. काइपर बेल्ट में खोजी गयी यह पहली वस्तु थी. खोज के बाद इस ग्रह के नामकरण के लिए लोवेल शोधशाला को लगभग 1000 नाम प्रस्तावित किये गए. अंततः इंग्लैंड की वैनेशिया बर्नी (Venetia Burney) के द्वारा प्रस्तावित नाम पर सहमति प्रदान की गयी. 

प्लूटो (यम) हमारे सौरमंडल में आकार के आधार पर दूसरा सबसे बड़ा बौना ग्रह है. वैसे आकार में यह हमारे चन्द्रमा से भी काफी छोटा है. आकार में छोटा होने के कारण इसे इसके उपग्रह शेरोन (Charon) के साथ जुड़वाँ ग्रह भी कहा जाता था. सूर्य से दूरी के क्रम में अंतिम स्थान पर विराजमान प्लूटो काइपर बेल्ट (Kuiper Belt) में मौजूद है. इस बेल्ट या घेरे में मौजूद सभी खगोलीय पिंड सौरमंडल के बाहरी घेरे में माने जाते हैं और इनके आकार और द्रव्यमान सौरमंडल की सभी वस्तुओं से काफी कम है और प्लूटो इस काइपर बेल्ट पर सबसे बड़ा खगोलीय पिंड है. इसका व्यास केवल 2376 किलोमीटर ही है.  प्लूटो जमी हुयी नाइट्रोजन की बर्फ, पानी की बर्फ और चट्टानों से बना हुआ है जैसा इस क्षेत्र में स्थित समस्त पिंड बने हुए हैं. 

जहाँ तक रही बात इसकी परिक्रमा की तो वह भी थोड़ी अजीब है. जहाँ बाकी ग्रह अपनी वलयाकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं वहीँ प्लूटो की कक्षा काफी विचलित है. यह नेपच्यून की कक्षा में प्रवेश करता  है और इसका उपसौर (सूर्य से न्यूनतम दूरी) जहाँ 4.43 अरब किलोमीटर तक होती है वहीँ अपसौर (सूर्य से अधिकतम दूरी) 7.31 अरब किलोमीटर तक हो जाती है.  जिसके कारण इसे सूर्य की परिक्रमा में लगभग 247.68 पृथ्वी-वर्ष लग जाता है. 

सूर्य से अत्यधिक दूरी पर स्थित प्लूटो पर बहुत ही क्षीण वायुमंडल है जो मुख्यतः नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनो-ऑक्साइड का मिश्रण है. एक मजेदार बात यह भी है कि सूर्य से जब यह अपसौर की स्थिति में अपनी अधिकतम दूरी पर होता है तो यहाँ और अधिक ठण्ड हो जाती है जिसके कारण नाइट्रोजन जैसी गैसें जम कर इसकी सतह पर गिर जाती हैं और वायुमंडल पतला होते जाता है. उपसौर की स्थिति में इन जमी गैसों का कुछ  भाग वाष्पीकृत हो जाता है और वायुमंडल में आ जाता है, परन्तु यह सतत प्रक्रिया लगातार वायुमंडल को महीन बना रही है. 

भले ही प्लूटो एक बौना ग्रह है जिसका आकार बहुत ही छोटा है, लेकिन चंद्रमाओं (उपग्रहों) के मामले में यह काफी धनी है. प्लूटो के कुल पाँच उपग्रह ज्ञात हैं – जिसमें सबसे बड़ा है 1978 में खोजा गया शेरोन. खोज के काफी वर्षों तक इसे इसका एकमात्र उपग्रह माना जाता रहा था और वैज्ञानिकों का एक समूह इस प्रणाली को जुड़वाँ-ग्रह भी कहते रहे हैं. 2005 के बाद पता चला कि इसके चार और चाँद हैं - जिनका नाम निक्स (Nix), हाइड्रा (Hydra), स्टिक्स (Styx) और कर्बेरोस (Kerberos) रखा गया. 

वायेजर (Voyager) के बाद न्यू होराइजन्स (New Horizons) सौरमंडल
न्यू होराइजन्स (New Horizons)
के इस क्षेत्र तक जाने वाला अन्तरिक्ष यान बना और यह 14 जुलाई 2015 को इस ग्रह से केवल 12500 किलोमीटर की दूरी से गुजरा. इस यान से प्रेषित आंकड़े प्लूटो के बारे में हमारी समझ को और विकसित करेंगे. मृत्यु के देवता ‘यम’ के अँधेरे में न जाने कितने छुपे सवालों के जवाब शायद हमें तब मिल पाएं. 


प्लूटो से ग्रह का दर्जा क्यों छीन लिया गया –
अपने खोज के समय से ही इसे सौर-मंडल के मुख्य ग्रहों में सूर्य से दूरी के क्रम में नौंवा (अंतिम) ग्रह माना गया था. लेकिन समय के साथ अनेक अन्तरिक्ष अभियानों और पृथ्वी केन्द्रित खोजों ने इस ग्रह और सौरमंडल के बारे में नयी जानकारियाँ प्रदान की – 

सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को प्लूटो का परिक्रमा पथ विचलित करता रहा.
जहाँ बाकी सभी आठ ग्रहों के परिक्रमा पथ एक समतल में थे वहीँ प्लूटो का परिक्रमा पथ कोण के रूप में था (चित्र से यह स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जायेगी). सभी ग्रहों के परिक्रमा पथ से इतर इस अनोखे परिक्रमा पथ की वजह से भी जिसमें यह नेपच्यून की कक्षा में प्रवेश कर जाता है; और अपने अत्यधिक छोटे आकार के कारण (यह हमारे चाँद से भी छोटा है) कई वैज्ञानिकों को यह लगने लगा कि यह ग्रह ना होकर नेपच्यून का कोई भागा हुआ उपग्रह है. हालांकि यह सम्भावना जल्द ही ख़ारिज कर दी गयी क्योंकि कभी भी यह दोनों ज्यादा नजदीक नहीं आते और प्लूटो का ग्रह का दर्जा बचा रह गया. 

परन्तु धीरे-धीरे वैज्ञानिकों को लगातार नेपच्यून के परे काइपर बेल्ट (Kuiper Belt) में लगातार अनेक खगोलीय पिंड मिलने लगे जो प्लूटो के सदृश्य थे. इसका आकार बहुत ही छोटा था। इस से पहले सब से छोटा ग्रह बुध (Mercury) था। प्लूटो बुध से आधे से भी छोटा था। आगे अन्वेषणों में पता चला कि वहां तो एक पूरा घेरा बना हुआ है जिसमें अनगिनत खगोलीय पिंड परिक्रमारत हैं. वैज्ञानिकों ने इस घेरे का नाम काइपर बेल्ट रखा और लगातार वहाँ से ह्यूमिया (Haumea) और मेकमेक (Makemake) जैसे पिंड मिलने लगे. एरिस (Eris) के मिलने के बाद वैज्ञानिकों के सामने एक नयी चुनौती आ पड़ी कि क्या ऐसे पाए जाने वाले सभी पिंडों को ग्रह कहा जाए जो प्लूटो के जैसे लगते हैं. ऐसा होना अव्यवहारिक था क्योंकि समय के साथ अगणित पिंडों की खोज भविष्य में अवश्यभावी थी. अतः वैज्ञानिकों के संघ ने अनेक विचार-मंथन के बाद 13 सितम्बर 2006 को ‘बौने ग्रहों’ की एक नयी श्रेणी स्थापित की और प्लूटो के साथ ह्यूमिया (Haumea), मेकमेक (Makemake), एरिस (Eris) और सेरेस (Ceres) को इनमें स्थान दिया गया. 

ऐसा करने के पीछे वैज्ञानिकों ने अपने तर्क रखे थे. किसी पिंड को ग्रह का दर्जा दिए जाने के लिए तीन शर्तें पूरी करनी आवश्यक मानी गयीं –
1.    वह सूर्य की परिक्रमा करता हो.
2.    उसके पास पर्याप्त द्रव्यमान हो जिससे वह लगभग गोलाकार आकृति प्राप्त कर सके.
3.    उसने अपने परिक्रमा पथ के अंतर्गत अपने गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के आस-पास के क्षेत्र को साफ़ कर दिया हो – या यूं कहें कि उसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में उसके उपग्रहों के अलावा और कोई पिंड न रह सके. जो भी पिंड हो वह प्लूटो के गुरुत्वीय प्रभाव में बंधा रहे. प्लूटो यह नहीं कर पाया क्योंकि उसके आस-पास अनेकों काइपर बेल्ट पिंड हैं जो उसके गुरुत्वीय प्रभावों से विचलित नहीं होते. बस यही एक कारण था कि इसे मुख्य ग्रह का ताज छोड़ना पड़ा और नियमानुसार तीसरी शर्तें पूरी न करने पर ‘बौने ग्रह’ के नए पद से संतुष्ट होना पड़ा. 


आशा है ये जानकारी आपको पसंद आई होगी, जल्द ही सौरमंडल के विशालतम ग्रह - बृहस्पति पर लेख के साथ ...

Monday, January 29, 2018

ज्वालामुखियों से भरा नर्क या सौन्दर्य की देवी - शुक्र (Venus)

जवालामुखी की धरती - शुक्र ग्रह
प्राचीन भारतीय सभ्यता में ‘भोर का तारा (The Morning Star)’ और ‘सांध्य-तारा (The Evening Star)’ के नाम से पहचाने जाने वाला शुक्र ग्रह (Planet Venus), सूर्य से दूरी के क्रम में दूसरे स्थान पर है. पृथ्वी से देखने पर आकाश में चन्द्रमा के बाद सबसे चमकीले इस आकाशीय पिंड का नामकरण  पाश्चात्य सभ्यताओं में प्रेम और सौन्दर्य की रोमन देवी वीनस (Venus) के ऊपर किया गया है. 
शुक्र (Venus) ग्रह की गति में एक दिलचस्प बात है – जहाँ लगभग सभी ग्रहों की घूर्णन काल (Rotation Period) यानि अपने अक्ष (Axis) पर एक चक्कर लगाने में लगने वाला समय, परिक्रमण काल (Period of Revolution - सूर्य का चक्कर लगाने में लगने वाला समय) से कम ही होती है, वही शुक्र के साथ यह बिलकुल उलट है. अपने अक्ष पर धूमने के नाम पर सौन्दर्य की यह देवी बहुत धीमी है.  जहाँ इसे सूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे 224.7 पृथ्वी दिवस लगते हैं वहीं अपने अक्ष पर इसे एक चक्कर लगाने में पूरे 243 पृथ्वी-दिवस लग जाते हैं. एक और बात शुक्र बाकी ग्रहों की तुलना में उलटी दिशा (दक्षिणावर्त) घूमता है. शुक्र की कक्षा भी अनोखी है लगभग पूर्ण वृत्ताकार. यह 10,80,00,000 किलोमीटर की औसत दूरी पर सूर्य की परिक्रमा करता है. 

शुक्र चट्टानी ग्रह है जिसका आकार और बाह्य-संरचना हमारी पृथ्वी के तरह नजर आती है. पृथ्वी के समान आकार और संरचना की वजह से इसे कभी-कभी पृथ्वी की ‘बहन’ भी कहा जाता है. परन्तु जहाँ पृथ्वी जीवन के अनुकूल वातावरण से समृद्ध है वहीँ शुक्र में सल्फ्यूरिक अम्ल की बारिश होती रहती है. सल्फ्यूरिक अम्ल का यह अपारदर्शी बादल शुक्र के धरातल को सबकी नजरों से बचाकर रखे हुए है. जहाँ बुध ग्रह में वायुमंडल नगण्य है, ठीक अगले ग्रह याने शुक्र में यह सभी आतंरिक ग्रहों में सबसे सघन है और मुख्यतः कार्बन डाईऑक्साइड से बना है. वैसे यहाँ हवा भी बड़े ही धीमे गति से चलती है. 

शुक्र के अध्ययन में एक दिलचस्प बात सामने आई है कि यहाँ अरबों साल पहले पानी हो सकता था लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड की प्रचुरता से लगातार होते ग्रीन-हाउस प्रभाव की वजह से वह वाष्पीकृत होते चले गए होंगे और आज शुक्र की धरती ज्वालामुखियों की धरती है जहाँ सौरमंडल के किसी भी ग्रह की तुलना में सबसे अधिक सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं. इसकी भूमि ज्वालामुखी से निकले लावा और चट्टानों के सूखे टुकड़ों से भरी पड़ी एक मृत धरती है, जिसमें अगली हलचल किसी ज्वालामुखी की सक्रियता से ही होती है. बेसाल्ट से बनी इस धरातलीय संरचना का 65% हिस्सा इन्हीं ज्वालामुखी के लावा से बना हुआ है. शुक्र के ज्वालामुखी शील्ड प्रकार के ज्वालामुखियों के अंतर्गत आते हैं जिसमें विष्फोट नहीं होता बल्कि लावा द्रव्य बाहर निकलते रहता है. सीफ मोंस (Sif Mons), गुला मोंस (Gula Mons), सफास मोंस (Safas Mons) आदि ऐसे ही ज्वालामुखी हैं. वैसे शुक्र में एक लाख से भी अधिक ज्वालामुखी होने की सम्भावना हैं. 

जैसा बुध के समय भी इस बात का उल्लेख हुआ था कि आंतरिक ग्रहों के उपग्रह नगण्य हैं. चार आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल) के मिलाकर कुल केवल तीन प्राकृतिक उपग्रह या चाँद हैं. सम्पूर्ण सौरमंडल में केवल  बुध और शुक्र ही ऐसे ग्रह हैं जिनका कोई उपग्रह नहीं है. इसका कारण इसकी सूर्य से नजदीकी है जिसके कारण कोई भी पिंड इनकी कक्षा में आने के पहले ही सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में फंसकर उससे टकरा जाता है और नष्ट हो जाता है. 
शुक्र पारगमन (Transit of Venus)

एक बात और शुक्र की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष थोड़ी झुकी हुई है; इसलिए, जब यह ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुजरता है तो यह सूर्य के एक हिस्से के ऊपर नजर आता है, इसे शुक्र पारगमन (Transit of Venus) कहते हैं. 
मेरिनर-2 (Mariner-2) USA

सौन्दर्य की देवी के नाम पर पड़े इस ग्रह की ओर शुरू से वैज्ञानिकों की बेहद दिलचस्पी रही और अनगिनत अन्तरिक्ष अभियान इस ग्रह के अध्ययन के लिए भेजे गए. शुरुआत हुयी सोवियत संघ (USSR) द्वारा 12 फरवरी 1961 को वेनेरा-1 (Venera-1) के साथ, परन्तु प्रक्षेपण के सातवे दिन यान ने संपर्क खो दिया. अगले साल 22 जुलाई 1962 को संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने मेरिनर (Mariner-1) नामक यान शुक्र की ओर भेजा परन्तु शायद इस देवी तक पहुँचना इतना आसान नहीं था और विफल प्रक्षेपण के साथ यह अभियान भी असफल हो गया. परन्तु कुछ ही दिनों बाद मेरिनर मिशन का दूसरा अन्तरिक्ष यान मेरिनर-2 (Mariner-2)शुक्र की धरती से 34,883 किमी उपर से गुजरा और दुनिया का पहला सफलतम अन्तर्ग्रहीय अन्तरिक्ष मिशन बन गया। इसने शुक्र के तापमान की 425 डिग्री होने की पुष्टि की और जीवन की संभावनाओं की तलाश को पहला बड़ा सदमा लगा. 

आने वाले समय में वेनेरा (Venera), मेरिनर (Mariner), कॉसमॉस (Cosmos), वेगा (Vega), स्पुतनिक (Sputnik) जैसे अनेक अभियानों ने इस ग्रह के बारे में हमारी समझ को और विकसित किया. हर अन्वेषण इस सौन्दर्य की देवी के उस चेहरे को सामने लाता गया जो सौन्दर्य की परिभाषा के पूर्णतः विपरीत है; और पता चला कि सुन्दर समझा जाने वाला यह ग्रह अन्दर से पूरी तरह ज्वालामुखियों से तप्त एक नरक है जिसमें आकाश भी तेज़ाब बरसाते हैं.

Sunday, April 2, 2017

प्लेनेट X - हमारे सौरमंडल में छुपी अनदेखी -अनजानी दुनिया


नासा की पारिकल्पना में प्लेनेट X

आप में से कई लोगों ने बुध, शुक्र, मंगल और बृहस्पति को चमकते हुए आसमान में जरुर देखा होगा. ये तो हम सभी जानते हैं कि ग्रहों की अपनी रौशनी नहीं होती और वे अपने सितारे के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और इसी वजह से उन्हें देखा जा सकता है; पर क्या हो अगर किसी स्याह ग्रह को अपने सितारे से इतनी कम रौशनी मिल पाए की वो उसे ठीक से परावर्तित न कर सके तो - तब तो उस काले ग्रह को देखना संभव ही नहीं. आश्चर्य की बात है न - और कुछ हद तक असंभव भी लगता है. 

पर हमारे कुछ वैज्ञानिकों को इस बात पर पूरा यकीं है कि ऐसा कोई ग्रह है और वो भी और कहीं नहीं हमारे अपने सौर मंडल में. उनका मानना है कि हमारे सौर मंडल के सुदूर किनारे पर कोई बड़ा सा ग्रह चुपचाप छिपकर बैठा है. इस दुनिया के बारे में उनका मानना है कि यह हमारी धरती से तीन गुना अधिक विशाल और दस गुना भारी है जो कि अगर वाकई में हो, तो निर्विवाद रूप से हमारे सौर परिवार का नौंवा ग्रह बन सकता है.  


तो जब यह दीखता ही नहीं तो वैज्ञानिकों ने इसका पता लगाया कैसे? वैज्ञानिकों ने बौने ग्रहों और दुसरे पिंडों के पथ का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि कोई बड़ी सी चीज़ इनके परिक्रमा पथ को प्रभावित कर रही है और यह हो न हो कोई ग्रह ही है. 

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के ग्रेग लौलीन कहते हैं - "अगर हमारे सौर परिवार में कोई और ग्रह है तो फिर वह यही है, और अगर हम सहीं हुए तो यह परिणाम वाकई आश्चर्यचकित कर देने वाला होगा."

प्राचीन काल के बाद से अब तक हमारे सौर परिवार में केवल दो ही असली ग्रह ढूंढें जा सके है, प्रारंभ के सभी ग्रह प्राचीन काल से ही ज्ञात रहे हैं, तो अगर ये सच है तो हमें तीसरा नया ग्रह मिल जाएगा. वैज्ञानिकों को इसके होने पर इसलिए भी यकीं हैं क्योंकि अभी भी सौर मंडल का काफी भाग खोजा जाना बचा है और इसके आखिरी छोर के बारे में तो अभी हमें नगण्य ही मालूम है.  

वैसे इसकी दूरी के बारे में वैगानिकों की गणना बेहद दिलचस्प है. उनके अनुसार इसकी अत्यधिक दूरी की वजह से शायद इसको सूर्य की परिक्रमा करने में हजारों साल लगेंगे. अपनी सूर्य से नजदीकी में भी यह सूर्य-पृथ्वी की नजदीकी दूरी से कम से कम 2००-३०० गुणा ज्यादा दूर होगा ही. 


इसके सौर-क्षेत्र के अंतिम छोर पर होने के बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि यह रहस्यमय ग्रह बृहस्पति और शनि के गुरुत्वाकर्षण की वजह से अपने सुदूर स्थान पर सौपहुँच गया होगा. और यही सबसे विकट स्थिति है. इतनी दूर पर उस ग्रह को सूर्य प्रकाश का बेहद कम भाग मिलता होगा, इसलिए उससे परावर्तित होने वाला सौर प्रकाश इतना कम होगा की बड़े-बड़े दूरबीनों से भी उसे देखा जाना लगभग असंभव ही होगा.   
   
एक दूसरा कारण यह भी है कि आसपास के क्षेत्र में कई सारे पिंड हैं जो तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक चमकदार हैं. उदाहरण के लिए प्लूटो ही इस ग्रह से लगभग दस हजार गुना ज्यादा चमकीला माना जा रहा है. इसलिए ऐसी स्थिति में इसे खोजने का एकमात्र तरीका आस-पास के पिंडों की परिक्रमा पथ की गणना करना ही है. माइकल ब्राउन और कोंस्टेंटीन बेटिजिन के रिसर्च पेपर के अनुसार सुदूर क्षेत्र में कुछ तो ऐसा है जो वहां के पिंडों की गति में बाधा डाल रहा है. इन दोनों अन्वेषकों ने इस ग्रह की संभावना के बारे में पता लगाया जब वे इस क्षेत्र के पास के चट्टानीय पिंडों को देख रहे थे. उन्होंने पाया की ये चट्टान परिक्रमा करते नजर आ रहे थे जो यूँहीं संभव नहीं है. इससे वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सौर मंडल का कोई विशालकाय नौंवा ग्रह (प्लूटो अब ग्रह नहीं रहा है तो वर्तमान में सौरमंडल में केवल आठ ग्रह हैं) घने अँधेरे में अदृश्य सा बैठा हुआ है. 

वैसे इस रहस्यमय ग्रह के होने की सम्भावना सौ साल से भी अधिक से व्यक्त की जा रही है. और प्लूटो की खोज इसी ग्रह को खोजने की पहल के दौरान हुयी थी. इसका नाम वैज्ञानिकों ने प्लेनेट - एक्स (Planet X) रखा हुआ है. तो देखते हैं क्या वाकई बृहस्पति से भी बड़ा कोई ग्रह हमारे सौर परिवार में हैं, जिससे अभी तक हम अनजान है. अन्तरिक्ष में कुछ भी संभव है...इसलिए आशा कायम रखिये.

Saturday, April 1, 2017

गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b


गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b (NASA की कल्पना में)
आज से कुछ वर्ष पूर्व सन २००३ में हवाई में अन्तरिक्ष वज्ञानिकों ने हमारी दुनिया से लगभग 57 प्रकाश वर्ष दूर एक नए ग्रह की खोज की है जिसका रंग गहरा गुलाबी है. अनोखे रंग के साथ अद्भुत बात यह भी है कि यह ग्रह आकार में हमारे महाग्रह बृहस्पति के बराबर का है, परन्तु द्रव्यमान में तो उससे भी कई-कई गुना ज्यादा. इस खोज की एक रोचक बात और भी है और वह ये, कि इसकी खोज सीधे टेलिस्कोप से हुयी है न कि इसके तारे की स्थिति के अनुसार गणना करके. इस ग्रह का नाम वैज्ञानिकों ने GJ 504b रखा है. 

वैसे सच कहा जाए तो भले ही बृहस्पति हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है परन्तु सौर-मंडल के बाहर उसके इतने बड़े ग्रहों का मिलना बहुत ही सामान्य सी बात है. यूं कहा जाए कि हमारे वैज्ञानिकों ने सुदूर सितारों के परिवारों में ऐसे अनेक ग्रह ढूंढ निकाले हैं. इस ग्रह की जो सबसे अनोखी बात है कि यह अपने सितारे से लगभग 4.०५ बिलियन मील दूर स्थित है या यह कहें कि अगर हमारे सौरमंडल को मॉडल मानकर तुलना करें तो यह सूर्य और नेपच्यून की दूरी से भी दूर होगा.  

यहाँ से हमारे मेधावी अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए एक समस्या की शुरुआत होती है. ग्रहों की रचना याने उनके अपने आकार लेने के सम्बन्ध में अभी जो प्रचलित थ्योरी है उसे केन्द्रित या मूल अभिवृद्धि सिद्धांत (Core accretion theory) कहा जाता है. सामायतः बृहस्पति जैसे विशालकाय गैसीय ग्रह की रचना इस सिद्धांत से जानी जाती है. इसके अनुसार जब एक सितारा अपना रूप लेता है तब यह विशालकाय टुकड़ों के क्षेत्र से घिरा होता है.  किसी समय कोई धूमकेतु या क्षुद्र ग्रह इस क्षेत्र से आ टकराता है और विखंडित होकर कहीं अधिक विशालकाय संरचना का निर्माण करता है. यह प्रक्रिया चलती रहती है यानि यह टुकड़ों का क्षेत्र किसी और पिंड से टकराता रहता और और बढ़ता चला जाता है. जैसे जैसे यह संरचना और विशालकाय होती चली जाती है, इसका गुरुत्व क्षेत्र भी बढ़ता चला जाता है और यह उसे मलबे से गैसों और धूलकणों को केंद्र की ओर खीचने लगती है, और धीरे-धीरे गैसीय महाग्रह अपना रूप प्राप्त करता है. 

लेकिन GJ504b अपने सितारे से बहुत अधिक दूरी पर है - इस दूरी पर यह मलबा विशालकाय और घना न होकर छितरा हुआ होता है, जिससे विशालकाय ग्रह के निर्माण की संभावना इस सिद्धांत में संभव नहीं है. किन यह गुलाबी ग्रह अपनी दूरी और विशालता से इस सिद्धांत को चुनौती दे रहा है और वैज्ञानिक ग्रहों के निर्माण के बारे में पुनः सोचने विवश हो उठे हैं. 

देखिये, अन्तरिक्ष के गर्भ में दबे नए रहस्य हमारे ज्ञान को और कितनी चुनौतियां देते हैं...हमारे समर्पित और महान वैज्ञानिकों को श्रद्देय नमन के साथ ... अन्तरिक्ष का यह छोटा सा ज्ञान कोष जारी रहेगा...

Tuesday, December 2, 2014

Mariner 10 (मेरिनर १०) - बुध की ओर पहला अन्तरिक्ष यान

मेरिनर 10 -श्रृंखला का अंतिम और बुध के
अध्ययन हेतु पहला अन्तरिक्ष यान
मेरिनर १० नासा द्वारा ३ नवम्बर १९७३ को प्रक्षेपित अमेरिकी रोबोटिक स्पेस प्रोब था जिसे बुध और शुक्र ग्रह के नजदीक से उड़ान भरने के उद्देश्य से भेजा गया था जिसे मेरिनर ९ अभियान के लगभग २ वर्ष के पश्चात् भेजा गया था. यह मेरिनर अभियान की अंतिम कड़ी था क्योंकि मेरिनर ११ और मेरिनर १२ को वायेजर अभियान के अंतर्गत वायेजर १ तथा वायेजर २ के रूप में बदला गया था.

इस अभियान का उद्देश्य बुध और शुक्र के पर्यावरण, वातावरण, घरातल और उसकी संरचना का अध्ययन था. दोनों ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के अध्ययन के अभियान हेतु अनुभव प्राप्त करना भी इस अभियान का द्वितीयक उद्देश्य था.


मेरिनर १० पहला अंतरिक्ष यान था जिसमें ग्रहों के आतंरिक गुरुत्वाकर्षण के द्वारा पथ परिवर्तन की तकनीक का उपयोग किया गया था. शुक्र ग्रह के गुरुत्वाकर्षण का प्रयोग कर इसके पथ को परिवर्तित कर इसे बुध की कक्षा में भेजा गया. साथ ही यह ऐसा पहला अन्तरिक्ष यान भी था जिसके सौर पैनल और ऐन्टेना में सूर्य की विकिरण के दबाव का प्रयोग किया गया था. इसका निर्माण बोइंग ने किया था. यान में कुल १० विभिन्न उपकरण विभिन्न उद्देश्यों के लिए लगाये गए थे.


मेरिनर अभियान - शुक्र और बुध की यात्रा
मेरिनर १० को कैनॉपस नामक मार्गदर्शक सितारे को आधार मानकर अपनी यात्रा पथ तय रखनी थी परन्तु स्टार ट्रैकर में यान की सतह से उखड़े पेंट की एक परत बैठ गयी और इसका फोकस जाता रहा. प्रक्षेपण पथ को बाद में सुधार तो लिया गया परन्तु यह समस्या पूरे अभियान में बनी रही. जनवरी १९७४ में मेरिनर १० ने कोहौटेक धूमकेतु का अल्ट्रा वोइलेट निरिक्षण किया और शुक्र की और बढ़ चला. ५ फरवरी १९७४ को शुक्र ग्रह से जब यह अपने सबसे नजदीकी दूरी पर था इसने अपने अल्ट्रा-वोइलेट फ़िल्टर से  शुक्र ग्रह का अध्ययन किया जिससे पता चला की शुक्र के बादल दृश्य प्रकाश में विशेषता रहित या भद्दे से नजर आते हैं. इसके पहले भी धरती इसका अवलोकन किया जा चूका था परन्तु मेरिनर द्वारा भेजे गए विस्तृत जानकारी ने शोधकर्ताओं को आश्चर्य में डाल दिया.

अपनी यात्रा में मेरिनर कुल तीन बार बुध के नजदीक से गुजरा और उससे सम्बंधित विस्तृत जानकारी भेजी. अपने तीसरे चरण में तो यह बुध से केवल ३२७ किलोमीटर ही दूर रह गया था और बुध के उत्तरी ध्रुव के ठीक ऊपर से होकर निकला था. मरिनेर द्वारा बुध की लगभग ४०-४५% भाग का मानचित्र तैयार किया गया. चूँकि बुध का केवल एक भाग ही सदैव सूर्य की ओर रहता है इसलिए अन्धकार से भरे भाग का अध्ययन संभव ना हो सका. मेरिनर के द्वारा भेजे गए तस्वीरों से पता चला की बुध, हमारे चन्द्रमा जैसी संरचना लिए हुए है. साथ ही मेरिनर ने बताया कि बुध का पर्यावरण बहुत पतला है जो मुख्य रूप से हीलियम का बना हुआ है. दिन और रात के तापमान में विस्तृत अंतर है जो रात में −183 °C (−297 °F) से लेकर दिन में 187 °C (369 °F)तक हो जाता है.

तीसरे चरण के पश्चात् जब यह पुनः सूर्य की परिक्रमा में था
मेरिनर १० के  सम्मान में १९७५ में जारी डाक-टिकट
तब इसके पथ परिवर्तन हेतु आवश्यक उर्जा समाप्त हो गयी और यह सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में बंधकर रह गया. ऐसा माना जाता है कि यह शायद आज भी सूर्य की परिक्रमा कर रहा है.