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Sunday, March 29, 2026

काँच की बारिश का आतंक HD189733b ग्रह

HD 189733 b सौरमंडल के बाहर खोजा गया एक बाह्यग्रह है जो कि लोमड़ी तारामंडल (Valpecula Constellation) में स्थित है. यह पृथ्वी से लगभग 64.5 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है और अपने तारे का बहुत ही नजदीक से चक्कर लगा रहा है . फ्रांस के खगोलविदों ने अक्टूबर 5, 2005 को इसकी खोज की थी. यह ग्रह हॉट जुपिटर की श्रेणी में आता है जिसकी संरचना लगभग बृहस्पति या जुपिटर ग्रह से मिलती है लेकिन यह तुलनात्मक रूप से अपने सितारे के बेहद करीब है जिससे यह बहुत तेजी से अपने सितारे की परिक्रमा पूर्ण कर लेता है तथा बेहद गर्म होता है. यह अपने सितारे की परिक्रमा केवल 2.2 पृथ्वी दिवस में 152 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से पूरा करता है.

धरती के सबसे नजदीक स्थित यह हॉट जुपिटर दिखने में बहुत ही सुन्दर है. 
अपने  खूबसूरत कोबाल्ट नीले रंग में यह ग्रह किसी स्वर्ग की तरह नजर आता है लेकिन वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार इस ग्रह का तापमान लगभग 1300 डिग्री सल्सियस है और यहाँ 8700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से तेज हवाए चलती हैं. ऐसे भयानक वातावरण की सबसे डरावनी चीज है कि यहाँ तेज हवा के साथ तरल काँचों की बारिश होती है. इस ग्रह पर सिलिकेट प्रचुर मात्रा में है जो अत्यधिक गर्मी के कारण काँच में परिवर्तित हो जाता है और काँच के ये नुकीले कण तेज तूफ़ान के साथ बारिश की बूंदों की तरह बरसते  नहीं बल्कि एक ओर से तूफ़ानी गति से चलते हैं हैं जो एक ही सेकंड में किसी को छोटे-छोटे महीन टुकड़ों में काट सकता है

वर्तमान तक इस भयानक नरक का कोई दूत मतलब उपग्रह नहीं खोजा गया है परन्तु वैज्ञानिकों को यकीन है कि इस गैसीय दानव ग्रह के पास अपने उपग्रह अवश्य होंगे. साथ ही इस ग्रह के बारे में एक और अनोखी खोज हुयी है कि यह ग्रह तेज गर्मी की वजह से वाष्पीकृत हो रहा है, याने धीरे-धीरे इस ग्रह का आकार कम होता जा रहा है. भविष्य ही इसकी असली स्थिति का बेहतर आभास कराएगा.  


Wednesday, May 30, 2018

रोशनी सोखने वाला अनोखा स्याह ग्रह WASP-104b

अन्तरिक्ष आश्चर्यों से भरा पड़ा है और मानव इनको खोजने में प्रयासरत. अक्सर इस प्रयास में ऐसी चीजों का पता चलता रहता है कि खगोल-वैज्ञानिक भी सोच में पड़ जाते है. 
कंप्यूटर द्वारा बनाया सांकेतिक चित्र - अपने सितारे के साथ स्याह ग्रह WASP-104b

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने धरती से 470 प्रकाशवर्ष दूर  बृहस्पति के आकार का एक ग्रह सुदूर सौर-मंडल में खोज निकाला है जिसके बारे में उनका दावा है कि यह स्याह ग्रह अपने सितारे डब्ल्यू ए एस पी - 104 (WASP-104) से आने वाली 97% रौशनी को सोख लेता है याने परावर्तित नहीं करता. जिसके कारण यह ग्रह स्याह याने गहरे काले रंग का दिखाई पड़ता है. उन्होंने इसके किसी कोयले से भी ज्यादा काले रंग के होने की सम्भावना प्रदर्शित की है.


डब्ल्यू ए एस पी - 104बी (WASP-104 B) के रूप में नामकृत इस ग्रह की खोज 2014 में कर ली गयी थी. 2018 में प्रकाशित ब्रिटेन की कील यूनिवर्सिटी (Keele University) के शोधकर्ताओं के द्वारा किये गए विस्तृत अध्ययन के अनुसार इस ग्रह के चारों ओर पोटैशियम और सोडियम का गहरा वातावरण आने वाले प्रकाश का 97% भाग सोख लेता है.  इस खोज के लिए उन्होंने नासा के केप्लर दूरदर्शी (Kepler Telescope) का इस्तेमाल किया गया था. यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोफिजिक्स ग्रुप के प्रमुख टियो मॉक्निक के अनुसार यह ग्रह अभी तक खोजे गए सभी ग्रहों में से सबसे गहरे काले रंग का है क्यूंकि यह अपने तारे से आने वाले लगभग सम्पूर्ण प्रकाश को अवशोषित कर लेता है.  शायद यही कारण है कि इस रहस्यमय और रोचक ग्रह को इतने दिनों तक देखा नहीं गया.

अभी तक खोजे गए समस्त ग्रहों में से केवल दो ही ग्रह ऐसे हैं जो इस ग्रह से ज्यादा अन्धकार युक्त या काले हैं - TrES-2b और WASP-12b. इस ग्रह का आकार लगभग बृहस्पति के समान है. जहाँ इसका द्रव्यमान बृहस्पति से 1.272 गुना ज्यादा है वहीँ इसकी त्रिज्या केवल 1.137 गुनी ज्यादा. बृहस्पति की तरह ही यह ग्रह भी मुख्यतः गैसों का बना माना जा रहा है.


WASP-104b, WASP-104 नामक सितारे की परिक्रमा करता है. यह लगभग 3 अरब साल पुराना सितारा है जो सिंह राशि में विद्यमान है. इस ग्रह की अपनी धुरी पर परिक्रमा अवधि 1.8 दिन है और यह अपने सितारे से केवल 42 लाख किलोमीटर (4184294 KM) दूर स्थित है. इतने पास होने पर यह अपने सितारे से प्रचुर मात्रा में प्रकाश प्राप्त करता है लेकिन फिर भी रहता अन्धकार युक्त है. है न अनोखा! यही तो है अनंत-अद्भुत-अनजानी सी अन्तरिक्ष की रहस्यमय दुनिया ....

Sunday, April 2, 2017

प्लेनेट X - हमारे सौरमंडल में छुपी अनदेखी -अनजानी दुनिया


नासा की पारिकल्पना में प्लेनेट X

आप में से कई लोगों ने बुध, शुक्र, मंगल और बृहस्पति को चमकते हुए आसमान में जरुर देखा होगा. ये तो हम सभी जानते हैं कि ग्रहों की अपनी रौशनी नहीं होती और वे अपने सितारे के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और इसी वजह से उन्हें देखा जा सकता है; पर क्या हो अगर किसी स्याह ग्रह को अपने सितारे से इतनी कम रौशनी मिल पाए की वो उसे ठीक से परावर्तित न कर सके तो - तब तो उस काले ग्रह को देखना संभव ही नहीं. आश्चर्य की बात है न - और कुछ हद तक असंभव भी लगता है. 

पर हमारे कुछ वैज्ञानिकों को इस बात पर पूरा यकीं है कि ऐसा कोई ग्रह है और वो भी और कहीं नहीं हमारे अपने सौर मंडल में. उनका मानना है कि हमारे सौर मंडल के सुदूर किनारे पर कोई बड़ा सा ग्रह चुपचाप छिपकर बैठा है. इस दुनिया के बारे में उनका मानना है कि यह हमारी धरती से तीन गुना अधिक विशाल और दस गुना भारी है जो कि अगर वाकई में हो, तो निर्विवाद रूप से हमारे सौर परिवार का नौंवा ग्रह बन सकता है.  


तो जब यह दीखता ही नहीं तो वैज्ञानिकों ने इसका पता लगाया कैसे? वैज्ञानिकों ने बौने ग्रहों और दुसरे पिंडों के पथ का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि कोई बड़ी सी चीज़ इनके परिक्रमा पथ को प्रभावित कर रही है और यह हो न हो कोई ग्रह ही है. 

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के ग्रेग लौलीन कहते हैं - "अगर हमारे सौर परिवार में कोई और ग्रह है तो फिर वह यही है, और अगर हम सहीं हुए तो यह परिणाम वाकई आश्चर्यचकित कर देने वाला होगा."

प्राचीन काल के बाद से अब तक हमारे सौर परिवार में केवल दो ही असली ग्रह ढूंढें जा सके है, प्रारंभ के सभी ग्रह प्राचीन काल से ही ज्ञात रहे हैं, तो अगर ये सच है तो हमें तीसरा नया ग्रह मिल जाएगा. वैज्ञानिकों को इसके होने पर इसलिए भी यकीं हैं क्योंकि अभी भी सौर मंडल का काफी भाग खोजा जाना बचा है और इसके आखिरी छोर के बारे में तो अभी हमें नगण्य ही मालूम है.  

वैसे इसकी दूरी के बारे में वैगानिकों की गणना बेहद दिलचस्प है. उनके अनुसार इसकी अत्यधिक दूरी की वजह से शायद इसको सूर्य की परिक्रमा करने में हजारों साल लगेंगे. अपनी सूर्य से नजदीकी में भी यह सूर्य-पृथ्वी की नजदीकी दूरी से कम से कम 2००-३०० गुणा ज्यादा दूर होगा ही. 


इसके सौर-क्षेत्र के अंतिम छोर पर होने के बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि यह रहस्यमय ग्रह बृहस्पति और शनि के गुरुत्वाकर्षण की वजह से अपने सुदूर स्थान पर सौपहुँच गया होगा. और यही सबसे विकट स्थिति है. इतनी दूर पर उस ग्रह को सूर्य प्रकाश का बेहद कम भाग मिलता होगा, इसलिए उससे परावर्तित होने वाला सौर प्रकाश इतना कम होगा की बड़े-बड़े दूरबीनों से भी उसे देखा जाना लगभग असंभव ही होगा.   
   
एक दूसरा कारण यह भी है कि आसपास के क्षेत्र में कई सारे पिंड हैं जो तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक चमकदार हैं. उदाहरण के लिए प्लूटो ही इस ग्रह से लगभग दस हजार गुना ज्यादा चमकीला माना जा रहा है. इसलिए ऐसी स्थिति में इसे खोजने का एकमात्र तरीका आस-पास के पिंडों की परिक्रमा पथ की गणना करना ही है. माइकल ब्राउन और कोंस्टेंटीन बेटिजिन के रिसर्च पेपर के अनुसार सुदूर क्षेत्र में कुछ तो ऐसा है जो वहां के पिंडों की गति में बाधा डाल रहा है. इन दोनों अन्वेषकों ने इस ग्रह की संभावना के बारे में पता लगाया जब वे इस क्षेत्र के पास के चट्टानीय पिंडों को देख रहे थे. उन्होंने पाया की ये चट्टान परिक्रमा करते नजर आ रहे थे जो यूँहीं संभव नहीं है. इससे वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सौर मंडल का कोई विशालकाय नौंवा ग्रह (प्लूटो अब ग्रह नहीं रहा है तो वर्तमान में सौरमंडल में केवल आठ ग्रह हैं) घने अँधेरे में अदृश्य सा बैठा हुआ है. 

वैसे इस रहस्यमय ग्रह के होने की सम्भावना सौ साल से भी अधिक से व्यक्त की जा रही है. और प्लूटो की खोज इसी ग्रह को खोजने की पहल के दौरान हुयी थी. इसका नाम वैज्ञानिकों ने प्लेनेट - एक्स (Planet X) रखा हुआ है. तो देखते हैं क्या वाकई बृहस्पति से भी बड़ा कोई ग्रह हमारे सौर परिवार में हैं, जिससे अभी तक हम अनजान है. अन्तरिक्ष में कुछ भी संभव है...इसलिए आशा कायम रखिये.

Saturday, April 1, 2017

गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b


गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b (NASA की कल्पना में)
आज से कुछ वर्ष पूर्व सन २००३ में हवाई में अन्तरिक्ष वज्ञानिकों ने हमारी दुनिया से लगभग 57 प्रकाश वर्ष दूर एक नए ग्रह की खोज की है जिसका रंग गहरा गुलाबी है. अनोखे रंग के साथ अद्भुत बात यह भी है कि यह ग्रह आकार में हमारे महाग्रह बृहस्पति के बराबर का है, परन्तु द्रव्यमान में तो उससे भी कई-कई गुना ज्यादा. इस खोज की एक रोचक बात और भी है और वह ये, कि इसकी खोज सीधे टेलिस्कोप से हुयी है न कि इसके तारे की स्थिति के अनुसार गणना करके. इस ग्रह का नाम वैज्ञानिकों ने GJ 504b रखा है. 

वैसे सच कहा जाए तो भले ही बृहस्पति हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है परन्तु सौर-मंडल के बाहर उसके इतने बड़े ग्रहों का मिलना बहुत ही सामान्य सी बात है. यूं कहा जाए कि हमारे वैज्ञानिकों ने सुदूर सितारों के परिवारों में ऐसे अनेक ग्रह ढूंढ निकाले हैं. इस ग्रह की जो सबसे अनोखी बात है कि यह अपने सितारे से लगभग 4.०५ बिलियन मील दूर स्थित है या यह कहें कि अगर हमारे सौरमंडल को मॉडल मानकर तुलना करें तो यह सूर्य और नेपच्यून की दूरी से भी दूर होगा.  

यहाँ से हमारे मेधावी अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए एक समस्या की शुरुआत होती है. ग्रहों की रचना याने उनके अपने आकार लेने के सम्बन्ध में अभी जो प्रचलित थ्योरी है उसे केन्द्रित या मूल अभिवृद्धि सिद्धांत (Core accretion theory) कहा जाता है. सामायतः बृहस्पति जैसे विशालकाय गैसीय ग्रह की रचना इस सिद्धांत से जानी जाती है. इसके अनुसार जब एक सितारा अपना रूप लेता है तब यह विशालकाय टुकड़ों के क्षेत्र से घिरा होता है.  किसी समय कोई धूमकेतु या क्षुद्र ग्रह इस क्षेत्र से आ टकराता है और विखंडित होकर कहीं अधिक विशालकाय संरचना का निर्माण करता है. यह प्रक्रिया चलती रहती है यानि यह टुकड़ों का क्षेत्र किसी और पिंड से टकराता रहता और और बढ़ता चला जाता है. जैसे जैसे यह संरचना और विशालकाय होती चली जाती है, इसका गुरुत्व क्षेत्र भी बढ़ता चला जाता है और यह उसे मलबे से गैसों और धूलकणों को केंद्र की ओर खीचने लगती है, और धीरे-धीरे गैसीय महाग्रह अपना रूप प्राप्त करता है. 

लेकिन GJ504b अपने सितारे से बहुत अधिक दूरी पर है - इस दूरी पर यह मलबा विशालकाय और घना न होकर छितरा हुआ होता है, जिससे विशालकाय ग्रह के निर्माण की संभावना इस सिद्धांत में संभव नहीं है. किन यह गुलाबी ग्रह अपनी दूरी और विशालता से इस सिद्धांत को चुनौती दे रहा है और वैज्ञानिक ग्रहों के निर्माण के बारे में पुनः सोचने विवश हो उठे हैं. 

देखिये, अन्तरिक्ष के गर्भ में दबे नए रहस्य हमारे ज्ञान को और कितनी चुनौतियां देते हैं...हमारे समर्पित और महान वैज्ञानिकों को श्रद्देय नमन के साथ ... अन्तरिक्ष का यह छोटा सा ज्ञान कोष जारी रहेगा...

Friday, March 31, 2017

वाष्पीकृत होता ग्रह CoRoT-2b

अन्तरिक्ष की दुनिया अद्भुत चीजों से भरी पड़ी है. लगातार विस्तृत होते अन्तरिक्ष में नित-नए चमत्कार होते रहते हैं. मानव अपने सीमित संसाधनों से इस असीमित दुनिया को जानने का प्रयत्न लगातार कर रहा है और जितना ही नया जानता है उतना और जानने को उत्सुक हो उठता है. रोचकता का इस क्षेत्र में अंत ही नहीं है.

एक ऐसा ही अद्भुत नजारा अन्तरिक्ष में है - अक्विला नक्षत्र समूह में स्थित ग्रह कोरोट-2b (CoRoT-2b). इस ग्रह पर गैसों का डेरा है जो लगातार घूर्णन गति में हैं - कुछ कुछ अपने बृहस्पति जैसा. पर जो बात इसे अलग बनती है वह है इसकी अपने सितारे से नजदीकी. इस ग्रह के बिलकुल नजदीक में इसका विशाल तप्त सूर्य अपना भयंकर मुंह खोले खड़ा है जिससे वह खतरनाक एक्स-रे विकिरण छोड़ रहा है. यह विकिरण हमारे सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्राप्त विकिरण से लाखों गुना ज्यादा है जिससे यह ग्रह लगातार अपने विनाश को ओर बढ़ रहा है . और तो और अन्धकार से भरे विशाल निशानों से भरा यह सितारा अपने गुरुत्वाकर्षण से इस ग्रह को नष्ट होने की कगार तक अपने समीप ले आया है.

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सितारे के इस अन्याधिक एक्स-किरण विकिरण की वजह से यह ग्रह वाष्पीकृत हो रहा है. यह विकिरण तीव्र गति से पवन भी उत्पन्न करता है जिससे ग्रह से कण अलग होकर अन्तरिक्ष में पहुँच रहे हैं. हर एक सेकंड में यह तीव्र पवन इस ग्रह के सतह से 4५ लाख टन कण उड़ा ले जा रहा है, मानों जैसे धूमकेतु के कोर या केन्द्रक से जैसे कण सूर्य की तेज ऊष्मा से वाष्पीकृत होते रहते हैं. किसी ग्रह पर ऐसे नज़ारे वाला दृश्य संभवतः पहली बार ज्ञात हुआ है.

वाकई, अन्तरिक्ष की दुनिया अनोखी और रोचकता से परिपूर्ण है.