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Sunday, May 13, 2018

गणनाओं की देन – नेपच्यून या वरुण (Neptune) ग्रह

नीलवर्ण ग्रह - नेपच्यून (वरुण) अपनी वलय-प्रणाली के साथ (कंप्यूटर जनित चित्र)
सौरमंडल के प्रारंभिक सभी ग्रहों को हमारे जिज्ञासु और मेधावी पूर्वज प्राचीन काल से ही पहचानते आये हैं. यूरेनस (अरुण) को भी वे देख सके थे भले ही उसे दूर स्थित कोई तारा समझ बैठे थे.  परन्तु अत्यंत दूर स्थित नेपच्यून (यह हमारी पृथ्वी की तुलना में सूर्य से तीस गुना ज्यादा दूर स्थित है) का पता न तो वे नग्न आखों से लगा सके, न उस वक़्त उपलब्ध दूरबीन से. तो आखिर नेपच्यून की खोज कैसे हुयी? 

नेपच्यून वह पहला ग्रह बना जिसके अस्तित्व यानि होने की भविष्यवाणी उसे देखने के पहले ही गणनाओं के माध्यम से कर दी गयी थी. हुआ यूँ कि नए-नए खोजे गए यूरेनस के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानने को उत्सुक खगोल-शास्त्री उसपर नजर गड़ाये बैठे ही रहते थे, और इसी के दौरान पता चला कि यूरेनस अपने परिक्रमा कक्ष में चलते हुए कुछ विचलित हो जाता है याने इसके सामान्य परिक्रमा पथ में परिवर्तन हो जाता है – कुछ यूं समझिये कि चलते-चलते थोड़े समय के लिए रास्ते से थोड़ा हट जाता है. इस विचलन के कारण के बारे में सबसे पहले अलेक्सिस बोवार्ड (Alexis Bouvard) ने किसी दूसरे ग्रह की उपस्थिति की सम्भावना व्यक्त की – जिसका गुरुत्वीय प्रभाव इस गड़बड़ी का कारण हो सकता था. बाद में जोहान गेले (Johann Galle) ने 23 सितम्बर 1846 को शातिशाली दूरबीन से इसकी खोज उसी स्थान पर की जिस स्थान पर ग्रह के होने की सम्भावना वेरियर (Verrier) ने प्रदर्शित की थी. इसके सबसे बड़े चाँद ट्राइटन (Triton) को भी जल्द ही खोज लिया गया था परन्तु बाकी के चंद्रमों की जानकारी बहुत बाद में ही हो पायी जब शक्तिशाली दूरबीनों और अन्तरिक्ष अभियानों ने हमारे खोजों की गति को आगे बढ़ाया. 

नेपच्यून (Neptune) या हमारा वरुण, सौरमंडल के केंद्र सूर्य से दूरी के क्रम में आँठवा तथा अंतिम मुख्य ग्रह है. अपने आकार में यह बाह्य गैसीय दानव ग्रह सौरमंडल में चौथा स्थान रखता है. नेपच्यून का नाम समुद्र के रोमन देवता के सम्मान में रखा गया था. भारतीय अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने भी उसी क्रम में इसका नामकरण जल के देवता ‘वरुण’ के नाम पर किया. 

सूर्य से इसकी दूरी पृथ्वी से सूर्य की दूरी से पूरे तीस गुना ज्यादा है. सूर्य से पृथ्वी के मध्य की दूरी को एक खगोलीय इकाई (Astrological Unit) माना जाता है तो इस दृष्टि से यह सूर्य से 30.1 खगोलीय इकाई (AU) के बराबर है या लगभग 4.50 अरब किलोमीटर.  इतनी दूर स्थित होने के कारण इसे सूर्य की एक परिक्रमा करने में लगभग 164.79 पृथ्वी वर्ष लगते हैं मतलब हमारे औसत जीवन में यह आधा चक्कर भी अपने तारे का नहीं लगा पाता. या यूं कहें कि अगर हम इस ग्रह पर जन्में होते तो अपना पहला जन्मदिवस भी नहीं मना पाते – मतलब न केक, न चॉकलेट, न उपहार – बड़ा दुखद होता. नहीं!!!

अरे हाँ, एक बात और, सूर्य से इतनी दूरी की वजह से यह जगह बेहद ठंडी है इतनी ठंडी की यहाँ बादलों में तापमान (-) 218 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है (जरा सोचिये 0 डिग्री सेल्सियस में तो बर्फ जम जाती है, उससे भी 218 कम). वहीं कोर का तापमान होता है 5100 डिग्री सेल्सियस. अब इस अंतर के बारे में आप कल्पना कीजिये.

नेपच्यून या वरुण, की बनावट अपने पड़ोसी ग्रह यूरेनस या अरुण से बहुत मिलती-जुलती है. यूरेनस की तरह ही इसके वातावरण में पानी की बर्फ के अलावा जमी हुयी अमोनिया और मीथेन गैसों की बर्फ प्रचुर मात्रा में है. इसलिए इसे भी यूरेनस की तरह ‘बर्फीला गैस दानव’ कहकर सम्बोधित किया जाता है. इसका वायुमंडल हाइड्रोजन, हीलियम और हाइड्रो-कार्बन से बना है.  नेपच्यून की तस्वीरों में बादल, तूफ़ान और मौसम का बदलाव स्पष्ट तौर पर नजर आता है, इसका एक कारण यह भी है कि इस ग्रह पर चलने वाली तूफ़ान हवाएं सौरमंडल के किसी भी अन्य ग्रह की तुलना में काफी तेज रफ़्तार से चलती हैं.  बृहस्पति पर चलने वाले तूफ़ान से बने ‘ग्रेट रेड स्पॉट’ की तरह ही नेपच्यून पर वायेजर को एक ‘बड़ा गाढ़ा धब्बा’ नजर आया था जब 1989 में वह इस ग्रह के पास से गुजरा था. नील वर्ण से सुशोभित यह ग्रह मीथेन की प्रचुरता के कारण यह रंग धारण करता है (पृथ्वी का नीला रंग जीवन-दायक जल की वजह से होता है, ऐसे ही बता दिया )

एक बात और – ग्रह के पास बहुत ही विरल वलय-प्रणाली पायी गयी है जो मुख्यतः बर्फ से बनी हैं और सिलिकेट या कार्बन के यौगिकों से निर्मित है. यह वलय प्रणाली रक्त-वर्ण आभा से युक्त है. 
नेपच्यून का सबसे बड़ा चाँद - ट्राइटन (Triton)

अंत में बात करते हैं – इसके उपग्रहों की. नेपच्यून बाह्य ग्रहों में या गैसीय दानवों में इस मामले में सबसे गरीब है जिसके पास केवल 14 उपग्रह हैं. यूरेनस (अरुण) के पास लगभग दोगुने 27 उपग्रह हैं. शनि और बृहस्पति से तो कोई मुकाबला ही नहीं है. इसका सबसे बड़ा उपग्रह है ट्राइटन (Triton) – इतना विशाल और भारी की नेपच्यून की कक्षा में स्थित समस्त द्रव्यमान का 99.5% अकेले ट्राइटन पूर्ण करता है. मतलब बाकी मिलाकर केवल 0.5% द्रव्यमान रखते है. अब इसी बारे में एक शानदार बात भी है कि यह बाकी उपग्रहों की तुलना में विपरीत दिशा में घूमता है और शायद नेपच्यून के निर्माण के समय बना उसका उपग्रह न होकर कोई क्षुद्र ग्रह हो जो नेपच्यून के गुरुर्वाकर्षण में फंस गया हो. बेचारा. इसकी खोज ग्रह की खोज के केवल 17 दिन बाद ही विलियम लासेल (William Lassell) के द्वारा की गयी थी. 

दूसरा उपग्रह या चाँद था नेरेइड (Nereid). इसके बाद वायेजर ने इसके 6 और उपग्रह खोज निकाले. अगले सारे उपग्रह इसी शताब्दी में खोजे गए. सबसे नया उपग्रह 2013 में खोजा गया. नेपच्यून के उपग्रहों के नामों की खास बात है कि जहाँ ग्रह का नाम रोमन समुद्र देवता पर रखा गया है – वहीँ उपग्रहों के नाम भी समुद्र के अन्य देवताओं पर रखे गए हैं.

नेपच्यून के पास अभी तक केवल वायेजर -2 ही पहुँच सका है (हैं न वायेजर श्रृंखला अद्भुत- ये आज भी काम कर रहे हैं, आपको पता). भविष्य में इस दिशा में शायद प्रयास हो और इस ग्रह और इसके उपग्रहों के बारे में हम ज्यादा से ज्यादा जान सके क्योंकि धरती के प्रेक्षणों से इतनी दूर स्थिति पिंडों की जानकारी असंभव है. तो बस इन्तजार है समुद्र के देवता के गर्त में छिपे रहस्यों से पर्दा उठने का...

Saturday, March 21, 2015

गैनीमेड (Ganymede) - बृहस्पति के उपग्रह पर समुद्र की खोज!

हबल के द्वारा दोनों ध्रुवों पर देखे गए Auroras
गैनीमेड (Ganymede) ना केवल बृहस्पति (Jupiter) ग्रह का, बल्कि सम्पूर्ण ब्रम्हांड का सबसे बड़ा उपग्रह (चन्द्रमा) है. अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा (NASA) को इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि बृहस्पति के इस सबसे बड़े उपग्रह पर एक भूमिगत समुद्र है. इसके कारण वहां जीवन के लिए उपयुक्त माहौल होने की उम्मीद जगी है. नासा के वैज्ञानिकों का दावा है कि इस समंदर में शायद धरती से भी ज्यादा पानी है. सौरमंडल के अन्दर और बाहर जीवन की तलाश में जुटे वैज्ञानिकों के लिए यह खबर जहां नयी उम्मीद पैदा करती है वहीँ इस बात पर भी जोर देती है कि जल्द ही इस पिंड पर विस्तृत शोध किया जाए.
 
वैज्ञानिकों के बताया है कि हबल स्पेस टेलिस्कोप से इस उपग्रह पर ऑरोरा (Aurora) (उषा) दिखाई दिए हैं. इस ऑरोरा से सतह के नीचे पानी होने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं. पूर्व में वर्ष 1995 में गैलिलियो (Galileo) स्पेस क्राफ्ट को गैनीमेड पर संभावित चुम्बकीय क्षेत्र के संकेत भी मिले थे, जिनकी इन औरोरों में आने वाले बदलावों से पुष्टि होती है. चूँकि गैलिलियो का फ्लाई-बाय बहुत ही कम समय के लिए था इसलिए उसके द्वारा इस उपग्रह का विस्तृत अध्ययन संभव नहीं हो सका था.

नासा ने इस ऑरोरा का वर्णन करते हुए इन्हें ऐसे जगमगाते, गर्म इलेक्ट्रीफाईड गैसों के फीते जैसा बताया है, जो चन्द्रमा के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर दिख सकते हैं. चूँकि ऑरोरा का नियंत्रण या तो स्वयं उपग्रह या फिर ग्रह के चुम्बकीय क्षेत्र से होता है इसलिए इनमें दिखने वाले बदलावों से उस जगह के बारे में बहुत कुछ समझा जा सकता है. गैनीमेड के समुद्र के तापमान और उसकी गहराई के बारे में अभी पता नहीं चल सका है, परन्तु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह धरती के समुद्रों से कम से कम दस गुना गहरा होगा और लगभग 150 किलोमीटर मोटी बर्फीली सतह के नीचे दबा होगा.

बृहस्पति के साथ इसके तीनों बड़े उपग्रहों के अध्ययन हेतु यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) एक अभियान आयोजित करना चाहती है. 2022 में प्रस्तावित इस अभियान के अंतर्गत यान आठ साल तक महाग्रह और उसके तीनों उपग्रहों का अध्ययन कर आंकड़े जुटाएगा, तब शायद समुद्र के इस रहस्य से और पर्दा उठ सके. इस अभियान में नासा भी अपनी भागीदारी दे रहा है, वह ऐसे राडार का निर्माण कर रहा है जो इन चंद्रमाओं के बर्फीली सतह के नीचे की संरचना भांप सके और समुद्र होने के इस अनुमान को सिद्ध कर सके. 

Tuesday, June 24, 2014

जानुस (Janus) - शनि का उपग्रह (Saturn's Satelite)

जानुस (Janus) - शनि का उपग्रह (Saturn's Satelite)
जानुस शनि ग्रह का छठवां ज्ञात चन्द्रमा है. इसकी कक्षा शनि से लगभग 15 लाख 1 हजार 472 किलोमीटर दूर स्थित है और इसका व्यास है 178 किलोमीटर.

इस उपग्रह का नामकरण जानुस के नाम पर हुआ है जिसके ऊपर जनवरी माह का नाम भी पड़ा है. मिथकों के अनुसार जानुस द्वार का देवता है जिसके सामने और पीछे दोनों ओर चेहरे हैं. जानुस की खोज का प्रथम श्रेय ओडोइन डाल्फस को दिया जाता है जिन्होंने इसकी खोज 1966 में की थी. उस समय लेकिन उन्हें यह तय नहीं था की ये जानुस है या एपिमैथ्युस (शनि का एक और उपग्रह). वर्ष 1977 में फाउंटेन और लार्शन ने यह साबित किया कि एपिमैथ्युस और जानुस दो अलग-अलग उपग्रह हैं. बाद में वायेजर ने भी इस बात को सिद्ध कर दिया की ये दोनों सह्कक्षीय अर्थात एक ही कक्षा में परिक्रमा करने वाले दो अलग-अलग उपग्रह हैं.
दोनों चंद्रमाओं की कक्षा की त्रिज्या में लगभग 50 किलोमीटर का ही अंतर है जो कि उनके व्यास से भी कम है. दोनों की कक्षीय गति भी लगभग समान है और दोनों में से जो निचे होता है, वह थोड़ी अधिक गति से धीरे-धीरे दूसरे से आगे बढ़ जाता है. जैसे ही दोनों चन्द्रमा एक दुसरे के पास आते  हैं, दोनों में संवेग का आदान-प्रदान होता है जिससे ऊपर वाला चन्द्रमा नीचे की कक्षा में और नीचे वाला चन्द्रमा ऊपर की कक्षा में आ जाता है. इस तरह दोनों अपनी जगह की हर चार वर्ष में एक बार अदला-बदली कर लेते हैं.

जानुस पर क्रेटरों की भरमार है जिससे कुछ क्रेटर 30 किलोमीटर के व्यास से भी बड़े हैं. क्रेटर के अतिरिक्त इसकी सतह पर छोटी पर्वत श्रेणिया तथा घाटियाँ भी हैं. इसकी सतह प्रामेथ्युस से पुरानी लेकिन पेन्डोरा से नई है.

Wednesday, September 11, 2013

आर्य भट्ट की चुनौती - मोहन सुन्दर राजन

भारत का पहला कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट १९७५ में सोवियत संघ के प्रक्षेपण केंद्र से रवाना हुआ और भारत का नाम अंतरिक्ष के क्षेत्र में इस एक उपलब्धि के साथ सुमार हो गया. परन्तु इस महत्वाकांक्षी परियोजना के मार्ग में अनेको चुनौतियां थी. 

उस समय की स्थिति पर प्रकाश डालती ये दुर्लभ पुस्तक प्रिय राजेश कुमार भाई ने प्रेषित की है. डाउनलोड करें और भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान के रोचक इतिहास से परिचय बढायें.

उपग्रह उवाच NCERT (मनीष चंद उत्तम - गीता कुमारी )

राजेश भाई ने आज एक बिलकुल अलग ही पुस्तक का लिंक मुझे भेजा है. जहां पूर्व किताबें अंतरिक्ष के रहस्यों और प्राकृतिक पिंडों पर आधारित थी वहीँ यह पुस्तक कृत्रिम उपग्रहों के बारे में विस्तृत जानकारी से ओतप्रोत है. कृत्रिम उपग्रहों का निर्माण, सिद्धांत, प्रमुख कृत्रिम उपग्रह, उनके प्रकार और उपयोग पर प्रकाश डालती यह पुस्तक निःसंदेह एक बेहद ज्ञान वर्धक और शानदार किताब है. 

Monday, August 26, 2013

एड्रास्टिया (Adrastia) - बृहस्पति का आतंरिक चंद्रमा

गैलिलियो स्पेस क्राफ्ट से लिया गया एड्रास्टिया का चित्र
एड्रास्टिया बृहस्पति (जुपिटर) के ज्ञात समस्त चंद्रमाओं में दूरी के अनुसार दुसरे क्रम पर स्थित है, यह गैलिलियन चंद्रमाओं के पहले स्थित चार आतंरिक चंद्रमाओं में से सबसे छोटा है . इसे  जुपिटर के नाम से भी जाना जाता है.

एड्रास्टिया को 1979 में वायेजर 2 प्रोब द्वारा लिए गए चित्रों के मध्य से खोजा गया था. यह खोज डेविड सी. जेविट और जी. एडवर्ड डेनियलसन द्वारा की गयी थी और इसे S/1979 J 1 का नाम दिया गया था. यह किसी अंतरिक्ष यान द्वारा लिए गए चित्रों में से खोजा जाने वाला सबसे पहला उपग्रह था. इसकी खोज के पश्चात् वायेजर 1 द्वारा पूर्व में लिए गए चित्रों का अध्ययन किया गया था और थेबे और मेटीस की खोज हुयी थी. इसका आधिकारिक नाम ग्रीक देवता ज़ीउस (ग्रीक देवता जो रोमन देवता जुपिटर के समान है) की सौतेली माँ एड्रास्टिया के नाम पर रखा गया. चित्र में यह चन्द्रमा केवल एक बिंदु के रूप में दिखाई देता था जिससे इसके बहुत छोटे आकार का पता चला था परन्तु कोई भी विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी थी जब तक गैलिलियो अंतरिक्ष यान ने अपने अभियान के अनुसार वर्ष 1998 में एड्रास्टिया की सतह के विस्तृत चित्र भेजे परन्तु चित्रों के बेहद धुंधले होने के कारण हमें इसके बारे में केवल थोडा ही और समझने का अवसर प्राप्त हुआ.

मेटीस की तरह ही एड्रास्टिया अपने ग्रह बृहस्पति से ज्वारीय रूप से बंधा हुआ है. साथ ही यह बृहस्पति की एक परिक्रमा अपने ग्रह के एक दिन से भी कम समय में कर लेता है. ऐसा करने वाला एकमात्र दूसरा उपग्रह मेटीस है. ज्वारीय बंध के कारण इसका केवल एक ही भाग हमेशा बृहस्पति की ओर रहता है. इसका परिक्रमा पथ जुपिटर के मुख्य वलय के अन्दर अपने ग्रह से केवल 129000 किलोमीटर की दूरी स्थित है इसलिए जुपिटर की ज्वारीय बल इसके कक्ष को धीरे धीरे कम करता जा रहा है और एक दिन यह अपने ग्रह से टकरा जाएगा.

इसे वलयों के पदार्थों के प्रमुख स्त्रोत के रूप में भी देखा जाता है जो कि शायद उल्कापिंडों के टकराव के कारण इससे अलग हुए हों. ऐसा माना जाता है कि शायद वलय के अधिकाँश पदार्थ इसी से प्राप्त हुए होंगे क्योंकि इसके पास के वलय घने हैं. 


आकार में अत्यधिक विषमता लिया यह उपग्रह बहुत छोटा केवल 20x16x14 किलोमीटर के आकार का है जो कि इसे बृहस्पति के आतंरिक चंद्रमाओं में सबसे छोटा बनाती है . इसकी संरचना के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि यह मुख्य रूप से पानी की बर्फ से बना है.

Sunday, August 25, 2013

मेटीस (Metis) - बृहस्पति का सबसे आतंरिक उपग्रह

गैलिलियो स्पेस क्राफ्ट द्वारा लिया गया मेटीस का चित्र
मेटीस बृहस्पति (जुपिटर) के ज्ञात समस्त चंद्रमाओं में सबसे अन्दर की ओर स्थित है अर्थात यह अपने ग्रह के सबसे पास स्थित चन्द्रमा है जो बृहस्पति से महज 128000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

मेटीस की खोज स्टीफन सीनोट के द्वारा वायेजर 1 द्वारा लिए गए चित्रों के अध्ययन से 1979 में की गयी थी. 1983 में आधिकारिक रूप से इसे मेटीस का नाम दिया गया जो देवताओं के गुरु ज़ीउस (ग्रीक देवता जो रोमन देवता जुपिटर के समान है) की प्रथम पत्नी थी. वायेजर द्वारा लिए गए चित्र में यह चन्द्रमा केवल एक बिंदु के रूप में दिखाई देता था जिससे इसके बहुत छोटे आकार का पता चला था परन्तु कोई भी विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी थी जब तक गैलिलियो अंतरिक्ष यान ने अपने अभियान के अनुसार वर्ष 1998 में मेटीस की सतह के विस्तृत चित्र भेजे और हमें मेटीस की संरचना को समझने का अवसर प्राप्त हुआ.

मेटीस, अपने ग्रह बृहस्पति से ज्वारीय रूप से बंधा हुआ है और इसके आकार में विषमता भी है. साथ ही यह बृहस्पति की एक परिक्रमा अपने ग्रह के एक दिन से भी कम समय में कर लेता है. ऐसा करने वाला एकमात्र दूसरा उपग्रह अद्रास्टिया है. इसका परिक्रमा पथ जुपिटर के मुख्य वलय के अन्दर स्थित है इसलिए इसे वलयों के पदार्श के प्रमुख स्त्रोत के रूप में भी देखा जाता है जो कि शायद उल्कापिंडों के टकराव के कारण इससे अलग हुए हों.

आकार में अत्यधिक विषमता लिया यह उपग्रह बहुत छोटा केवल 40 किलोमीटर की व्यास का है और यह  बृहस्पति का दूसरा सबसे छोटा उपग्रह है. इसकी संरचना के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि यह मुख्य रूप से पानी की बर्फ से बना है. इसकी धरातली क्रेटर यानी गड्ढों से भरी हुयी है और यह लाल रंग का नजर आता है. जैसा की पूर्व में कहा गया है इसके गोलार्ध अत्यधिक विषमता लिए हुए हैं इसका कारण संभवतः इसके गोलार्ध पर टकराव की तीव्रता और संख्या है जिसके कारण शायद इसके आतंरिक भाग से काफी सामग्री  इसके उभार वाले हिस्से पर निकल आई है.

मेटीस, बृहस्पति के आतंरिक चार चंद्रमाओं में से एक है और केवल 128000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इसके कारण जुपिटर की ज्वारीय बल इसके कक्ष को धीरे धीरे कम करता जा रहा है साथ ही बेहद नजदीक होने के कारण यहाँ से जुपिटर का केवल 31 % भाग ही मेटीस से नजर आता है जो कि किसी भी चन्द्रमा की तुलना में सबसे कम है. यहाँ से बृहस्पति केवल एक अर्धवृत्त के रूप में नजर आता है .

Friday, August 9, 2013

आयो (Io)

गैलिलियो यान द्वारा भेजी जानकारी के आधार पर आयो का चित्र
आयो, बृहस्पति के गलिलियन चंद्रमाओं में से एक है. क्रम के आधार पर यह बृहस्पति का पांचवा तथा आकर में  तीसरा बड़ा उपग्रह है. १६१० में गलीलियो के द्वारा खोजे गए हमारे चन्द्रमा से भी बड़े इस उपग्रह का नाम ज्यूस की अविवाहित प्रेमिका आयो के नाम पर रखा गया था.


अधिकतर चंद्रमाओं के विपरीत आयो की सतह काफी सक्रीय है. इसकी संरचना किसी चट्टानी ग्रह की तरह की है. वायेजर यान ने जब इस उपग्रह की तसवीरें भेजी तो अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए ये एक आश्चर्य की तरह था – क्योंकि अनुमान के विपरीत आयो पर उल्का पिंडो से बने क्रेटरों की संख्या काफी कम थी. वहीँ वायेजर को यहाँ पर सैकड़ों सक्रीय ज्वालामुखी भी मिले जिनकी राख सैकड़ों किलोमीटर ऊपर तक उठती थी. वोएजर १ और २ के द्वारा ली गयी तस्वीरों में इन ज्वालामुखियों की स्थिति में काफी अंतर है जो यह दर्शाती है की आयो की सतह नित – परिवर्तनशील है.
सक्रिय ज्वालामुखीय लावा

वैज्ञानिकों का मानना है की आयो की यह सक्रियता आयो, गेनीमेड, युरोपा और बृहस्पति के मध्य गुरुत्वीय खिचाव के कारण है. एक बेहद रोचक बात यह है की आयो बृहस्पति की चुम्बकीय रेखाओं के काटता है जिसके कारण यहाँ कई ट्रिलियन वाट तक की विद्युत् उर्जा उत्पन्न होती है जो कि अंततः आयो की सतह को क्षरित करती है.

आयो की सतह विभिन्नताओ से भरी हुयी है. जहाँ एक ओर ज्वालामुखी हैं तो दूसरी ओर सामान्य पर्वत भी यहाँ मौजूद हैं. पिघली हुयी गंधक की झीले और नदियाँ इस उपग्रह को वैज्ञानिकों के लिए रोचक बनती हैं. आयो का अपना चुम्बकीय क्षेत्र है और सल्फर डाई ऑक्साइड से बना वातावरण भी. चारों गलिलियन चंद्रमाओं में से केवल आयो में पानी नहीं है जो शायद उसकी बृहस्पति की निकटता और ऊष्मा के कारण वाष्पित हो चूका है. 

Thursday, August 8, 2013

डीमोस (Deimos)

डीमोस (Deimos)
डीमोस (Deimos) मंगल का बाह्य छोटा उपग्रह और सबसे पहले खोजे जाने वाला उपग्रह है; साथ ही यह सौर मंडल के सबसे छोटे उपग्रहों में से एक है जिसका व्यास केवल १२.६ किलोमीटर है, ऐसा माना जाता है की फोबोस की तरह ये चन्द्रमा भी कोई क्षुद्र ग्रह था जो मंगल के प्रभाव में आकर इसका उपग्रह बन गया. 

इसका नामकरण भय के देवता डीमोस के ऊपर किया गया है. ग्रीक मिथकों के अनुसार यह एरेस (मंगल) और अफ्रोदेते (शुक्र) का पुत्र माना जाता है. इस उपग्रह की खोज हॉल ने  अगस्त १८७७ में की थी. वाइकिंग १ ने सर्वप्रथम डीमोस की स्पष्ट तसवीरें १९७७ में  पृथ्वी पर भेजी जिससे इस छोटे उपग्रह के बारे में जानकारियाँ प्राप्त हो सकीं.  

फोबोस की तरह डीमोस  भी चट्टान और बर्फ से बना है और इसका घनव काफी कम है. इसकी सतह पर क्रेटरों की भरमार है.


फोबोस (Phobos)

फोबोस (Phobos)
फोबोस (Phobos) मंगल का आतंरिक और सबसे बड़ा उपग्रह है ; साथ ही यह सौर मंडल में अपने ग्रह से सबसे नजदीक स्थित उपग्रह है जो मंगल से केवल ६००० किलोमीटर की दूरी पर अपने ग्रह की परिक्रमा करता है.

इसका नामकरण भय के देवता फोबोस के ऊपर किया गया है. ग्रीक मिथकों के अनुसार फोबोस एरेस और अफ्रोदेते (शुक्र) का पुत्र माना जाता है. इस उपग्रह की खोज हॉल ने १९ अगस्त १८७७ में की थी. मेरिनेर ९ ने सर्वप्रथम फोबोस की स्पष्ट तसवीरें पृथ्वी पर भेजी जिससे इस छोटे उपग्रह के बारे में जानकारियाँ प्राप्त हो सकीं.  फोबोस चट्टान और बर्फ से बना है और इसका घनव काफी कम है. इसकी सतह पर क्रेटरों की भरमार है. 
मंगल के उपग्रहों की परिक्रमा पथ

फोबोस मंगल के आकाश में पश्चिम दिशा में उगता है और तेजी से गति करता हुआ पूर्व में जाकर अस्त हो जाता है. कम दूरी होने के कारण यह तेजी से मंगल की परिक्रमा करता है और एक दिन में दो बार उदित हो जाता है. 

गणनाएं कहती हैं की फोबोस की कक्षा धीरे-धीरे कम हो रही है और शायद कुछ करोड़ वर्षों में यह या तो मंगल से टकराकर नष्ट हो जाएगा या शायद एक धुंधले वाले के रूप में उसके चारों और स्थापित हो जाएगा. माना तो ये भी जाता है कि शायद मंगल के दोनों चन्द्रमा क्षुद्र गृह थे जो मंगल के प्रभाव में आकर इसके उपग्रह बन गए हैं.

Monday, August 5, 2013

हायका ( Hi'iaka) – हौमिया का प्रथम और सबसे बड़ा उपग्रह

हायका – हौमिया का प्रथम और सबसे बड़ा उपग्रह 

हायका, बौने ग्रह हौमियाके दो चंद्रमाओं में सबसे बड़ा है.
हायका (नीचे) अपने गृह के साथ (काल्पनिक चित्र )
हायाका,
हौमिया का प्रथम खोजा गया उपग्रह था, इसका नाम हौमिया की बेटी हायका के ऊपर रखा गया. आधिकारिक नामकरण के पहले इसका नाम इसके खोजी दल द्वारा रुडोल्फ रखा गया था. 

इसका व्यास लगभग ३५० किलोमीटर है जो इसे केवल चार बड़े एस्टेरोइड को छोड़ कर बाकी सभी से बड़ा बनता है, परन्तु इसे ग्रह की संज्ञा नहीं दी जा सकती. 
हायका की धरातलीय संरचना अपने ग्रह जैसी ही है इसलिए ऐसा माना जाता है कि यह अपने ग्रह हौमिया का ही एक टुकड़ा है जो कालांतर में उससे अलग होकर चक्कर काटने लगा.