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Friday, December 11, 2020

बृहस्पति और शनि का अनोखा मिलन - 400 वर्ष बाद

अन्तरिक्ष में घटित अनोखी घटनाओं की श्रृंखला में इस वर्ष 21 दिसम्बर की रात्रि को बृहस्पति और शनि के आभासी मिलन की घटना इन दिनों चर्चा में है. यहाँ हमें यह जानना आवश्यक है की सौरमंडल के ये दोनों विशालकाय गैसीय दानव ग्रह एक-दूसरे से औसतन करीब 40 करोड़ मील या 65 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर हैं और 21 दिसम्बर को 397 वर्ष बाद होने वाली (खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इससे पहले 1623 ईस्वी में यह अद्भुत नजारा दिखा था) इस दुर्लभ घटना में भी ये दूरी लगभग बनी रहेगी. फिर इस चर्चा का क्या अर्थ है कि दोनों दानवी ग्रह पास आयेंगे. 



इस घटना का अर्थ है की आकाश में ये दोनों गृह एक दुसरे से केवल 0.1 अंश के अंतर में दिखेंगे. इनके बीच की वास्तविक दूरी में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होगा परन्तु ये अपनी कक्षाओं में इस स्थिति में होंगे की पृथ्वी से ये लगभग एक सीध में दिखाई देंगे. यह भी अनुमान हैं कि संभवतः ये इतने चमकीले हों कि ये दो अलग ग्रह एक तारे के सदृश्य दिखाई देवें. इसलिए विश्व में अनेक लोग इसे क्रिसमस का विंटर स्टार (शीत ऋतू का सितारा) भी कहकर पुकार रहे हैं. 


इस तरह की खगोलीय घटना को अन्तरिक्ष विज्ञानी 'ग्रहों के संयोजन' के नाम से पुकारते हैं लेकिन शनि और बृहस्पति के इस तरह के करीबी मिलन को वे 'महासंयोजन या ग्रेट कंजंक्शन' कहते हैं. ऐसा इसलिए है कि अन्य पड़ोसी ग्रहों की तुलना में बृहस्पति और शनि का यह मिलन दुर्लभा है और लगभग 400 वर्ष के बाद घटित हो रहा है. वैसे अगला महासंयोजन 60 साल बाद 15 मार्च 2080 को पुनः होगा. यहाँ यह भी जानना आवश्यक है कि प्रत्येक 20 वर्ष में शनि और बृहस्पति एक-दूसरे की कक्षा में पृथ्वी के सापेक्ष बहुत पास आ जाते हैं परन्तु तब भी रात्रि - आकाश में इनकी दूरी बनी रहती है. 

Saturday, August 5, 2017

बृहस्पति का 350 वर्षों से जारी तूफ़ान - द ग्रेट रेड स्पॉट (जूनो की नजर से)


अन्तरिक्ष आश्चर्यों से भरा है और मानव अपनी जिज्ञासा के वशीभूत लगातार इन रहस्यों की खोज में लगा हुआ है. हमारे सौरमंडल के सबसे विशालकाय ग्रह बृहस्पति की तस्वीरों को आपने जब भी देखा होगा - उसमें एक बड़े से लाल धब्बे पर अवश्य आपकी नजर गयी होगी. महाग्रह पर इस विशालकाय धब्बे को वैज्ञानिक 'द ग्रेट रेड स्पॉट' के नाम से पुकारते हैं. यह धब्बा हमारी पृथ्वी से कई गुना बड़ा है और यह और कुछ नहीं बृहस्पति ग्रह पर जारी तूफ़ान है. जहाँ धरती पर कोई तूफ़ान अधिकतम कुछ घंटे या दिनों में शांत हो जाता है, महाग्रह में जारी यह तूफ़ान पिछले 350 वर्षों से जारी है और कब तक जारी रहेगा - कहा नहीं जा सकता.
द ग्रेट रेड स्पॉट (जूनो की नजर से)


महाग्रह का यह तूफ़ान या रेड स्पॉट शुरू से ही वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल का विषय रहा है पर दुर्भाग्यवश कोई भी अन्तरिक्ष अभियान इस धब्बे के पास तक नहीं पहुँच पाया था. परन्तु इस वर्ष नासा का जूनो अन्तरिक्ष यान इस तूफ़ान से केवल साढ़े तीन हजार किलोमीटर ऊपर की दूरी तक पहुँचने में न केवल सफल हुआ है बल्कि इसने इस तूफ़ान की दुर्लभ तसवीरें और आंकड़े भी भेजे हैं जिनका अध्ययन जारी है. जल्द ही अन्तरिक्ष वैज्ञानिक बिरादरी को उम्मीद है कि हमारे सौर मंडल के इस कौतुहल के बारे में नवीनतम जानकारी प्राप्त होगी.

गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में ग्रहीय वातावरण विशेषज्ञ एमी साइमन ने नासा की प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "अगर आप सौरमंडल के बाहर के किसी ग्रह से परावर्तित होती रोशनी को देखेंगे, तो आप यह भी नहीं बता सकते कि वह किस वस्तु से बनी है... सो, ज़्यादा से ज़्यादा अलग-अलग मामलों पर नज़र डालने से हम इस लायक हो सकते हैं कि मिली जानकारी को अन्य सौरमंडलों के ग्रहों के बारे में सीखने के लिए इस्तेमाल कर सकें..."

Saturday, March 21, 2015

गैनीमेड (Ganymede) - बृहस्पति के उपग्रह पर समुद्र की खोज!

हबल के द्वारा दोनों ध्रुवों पर देखे गए Auroras
गैनीमेड (Ganymede) ना केवल बृहस्पति (Jupiter) ग्रह का, बल्कि सम्पूर्ण ब्रम्हांड का सबसे बड़ा उपग्रह (चन्द्रमा) है. अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा (NASA) को इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि बृहस्पति के इस सबसे बड़े उपग्रह पर एक भूमिगत समुद्र है. इसके कारण वहां जीवन के लिए उपयुक्त माहौल होने की उम्मीद जगी है. नासा के वैज्ञानिकों का दावा है कि इस समंदर में शायद धरती से भी ज्यादा पानी है. सौरमंडल के अन्दर और बाहर जीवन की तलाश में जुटे वैज्ञानिकों के लिए यह खबर जहां नयी उम्मीद पैदा करती है वहीँ इस बात पर भी जोर देती है कि जल्द ही इस पिंड पर विस्तृत शोध किया जाए.
 
वैज्ञानिकों के बताया है कि हबल स्पेस टेलिस्कोप से इस उपग्रह पर ऑरोरा (Aurora) (उषा) दिखाई दिए हैं. इस ऑरोरा से सतह के नीचे पानी होने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं. पूर्व में वर्ष 1995 में गैलिलियो (Galileo) स्पेस क्राफ्ट को गैनीमेड पर संभावित चुम्बकीय क्षेत्र के संकेत भी मिले थे, जिनकी इन औरोरों में आने वाले बदलावों से पुष्टि होती है. चूँकि गैलिलियो का फ्लाई-बाय बहुत ही कम समय के लिए था इसलिए उसके द्वारा इस उपग्रह का विस्तृत अध्ययन संभव नहीं हो सका था.

नासा ने इस ऑरोरा का वर्णन करते हुए इन्हें ऐसे जगमगाते, गर्म इलेक्ट्रीफाईड गैसों के फीते जैसा बताया है, जो चन्द्रमा के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर दिख सकते हैं. चूँकि ऑरोरा का नियंत्रण या तो स्वयं उपग्रह या फिर ग्रह के चुम्बकीय क्षेत्र से होता है इसलिए इनमें दिखने वाले बदलावों से उस जगह के बारे में बहुत कुछ समझा जा सकता है. गैनीमेड के समुद्र के तापमान और उसकी गहराई के बारे में अभी पता नहीं चल सका है, परन्तु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह धरती के समुद्रों से कम से कम दस गुना गहरा होगा और लगभग 150 किलोमीटर मोटी बर्फीली सतह के नीचे दबा होगा.

बृहस्पति के साथ इसके तीनों बड़े उपग्रहों के अध्ययन हेतु यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) एक अभियान आयोजित करना चाहती है. 2022 में प्रस्तावित इस अभियान के अंतर्गत यान आठ साल तक महाग्रह और उसके तीनों उपग्रहों का अध्ययन कर आंकड़े जुटाएगा, तब शायद समुद्र के इस रहस्य से और पर्दा उठ सके. इस अभियान में नासा भी अपनी भागीदारी दे रहा है, वह ऐसे राडार का निर्माण कर रहा है जो इन चंद्रमाओं के बर्फीली सतह के नीचे की संरचना भांप सके और समुद्र होने के इस अनुमान को सिद्ध कर सके. 

Wednesday, August 28, 2013

एमाल्थिया (Amalthea) - बृहस्पति का तीसरा आतंरिक उपग्रह

एमाल्थिया - गैलिलियो स्पेस क्राफ्ट द्वारा चित्र
एमाल्थिया दूरी के हिसाब से बृहस्पति का तीसरा उपग्रह है. इसकी खोज 9 सितम्बर 1892 को एडवर्ड एमर्सन बर्नार्ड के द्वारा  रेफ्रेक्टर टेलिस्कोप से लिक वेधशाला में की गयी थी. यह वो आखिरी उपग्रह था जिसे सीधे तौर पर निरिक्षण के माध्यम से खोजा गया था. इसके पश्चात खोजे गए समस्त उपग्रह विभिन्न अंतरिक्ष प्रोब या यानों से प्राप्त चित्रों के माध्यम से खोजे गए हैं. साथ ही यह गैलिलियो के द्वारा खोजे गए चारों बड़े उपग्रहों के बाद खोजा गया बृहस्पति का पहला उपग्रह था. इसका नाम ग्रीक पौराणिक गाथाओं की परी एमाल्थिया के नाम पर किया गया जिसने देवताओं के राजा ज़ीउस (रोमन में जुपिटर) की शिशु अवस्था में देखभाल की थी.  इसे जुपिटर V के नाम से भी जाना जाता है. वैसे इसे इसका नाम आधिकारिक रूप से 1975 में ही मिल पाया परन्तु दशकों पूर्व से इसे इसी नाम से जाना जाता रहा था.

एमाल्थिया बहुत पास से अपने ग्रह की परिक्रमा करती है तथा एमाल्थिया गोसमेर वलय के बाहरी किनारे पर स्थित है, जो कि इसकी धरातल से मुक्त धूल-कणों से बनी है. एमाल्थिया बृहस्पति के आतंरिक चारों उपग्रहों में सबसे बड़ा है. इसकी आकृति अनियमित है तथा यह लाल रंग लिए हुए है. इसके बारे में ऐसा माना जाता है कि शायद यह सूक्ष्म रंध्र से निष्काषित पानी के बर्फ और अन्य अज्ञात पदार्थों से बना है. इसकी धरातलीय संरचना में बड़े बड़े कक्रेटर और पर्वत दृष्टिगत होते हैं.

एमाल्थिया के सबसे पहले चित्र 1979 और 1980 में क्रमशः वायेजर 1 और वायेजर 2 द्वारा लिए गए थे. बाद में 1990 के दशक में गैलिलियो ने इसके विस्तृत चित्र लिए थे जिससे इस उपग्रह के बारे में काफी जानकारियाँ प्राप्त हुयी.
एमाल्थिया बृहस्पति कि परिक्रमा 181,000 किलोमीटर की दूरी से करती है. इसका परिक्रमा पथ थोडा झुका हुआ है. सामान्यतः आतंरिक उपग्रहों में इस तरह का झुकाव नहीं होता है शायद इसका कारण आयो हो सकता है जो बृहस्पति का उपग्रह है.

एमाल्थिया का लाल रंग संभवतः आयो से निकली वाली सल्फर के कारण या किसी अज्ञात पदार्थ के कारण माना जाता है. कहीं कहीं हरे रंग की चकती नजर आती है परन्तु कारण अज्ञात ही है. बाकी आतंरिक चंद्रमाओं की तुलना में इसकी सतह ज्यादा चमकीली है परन्तु आकृति की तरह यह चमक भी अनियमित है. 

साथ ही यह बृहस्पति की एक परिक्रमा अपने ग्रह के एक दिन से भी कम समय में कर लेता है. ऐसा करने वाला एकमात्र दूसरा उपग्रह अद्रास्टिया है. इसका परिक्रमा पथ जुपिटर के मुख्य वलय के अन्दर स्थित है इसलिए इसे वलयों के पदार्श के प्रमुख स्त्रोत के रूप में भी देखा जाता है जो कि शायद उल्कापिंडों के टकराव के कारण इससे अलग हुए हों.

यह  ग्रह बृहस्पति से ज्वारीय रूप से बंधा हुआ है और इसके आकार में विषमता भी है.आकार में विषमता लिए इस  उपग्रह का आकार 250 × 146 × 128 है. इसकी धरातली क्रेटर यानी गड्ढों से भरी हुयी है और यह लाल रंग का नजर आता है. जैसा की पूर्व में कहा गया है इसके गोलार्ध अत्यधिक विषमता लिए हुए हैं इसका कारण संभवतः इसके गोलार्ध पर टकराव की तीव्रता और संख्या है जिसके कारण शायद इसके आतंरिक भाग से काफी सामग्री  इसके उभार वाले हिस्से पर निकल आई है.  पैन (Pan) नामक क्रेटर इस उपग्रह का सबसे बड़ा क्रेटर है जो की 100 किलोमीटर लम्बा तथा 8 किलोमीटर गहरा है जो की इसी नाम के ग्रीक देवता पर रखा गया है.  एक दूसरा बड़ा क्रेटर गेया (Gaea)जो कि ग्रीक देवी के नाम पर रखा गया है , लगभग 80 कि.मी. लम्बा तथा पैन से दोगुना गहरा है. यहाँ दो बड़े पर्वत भी मैं – मोन्स लायक्टस और मोन्स आइडा.  एमाल्थिया के बारे में एक विशेष बात यह भी है कि यह सूर्य से प्राप्त ऊर्जा  से कहीं ज्यादा ऊर्जा विकरित करती है

Monday, August 26, 2013

एड्रास्टिया (Adrastia) - बृहस्पति का आतंरिक चंद्रमा

गैलिलियो स्पेस क्राफ्ट से लिया गया एड्रास्टिया का चित्र
एड्रास्टिया बृहस्पति (जुपिटर) के ज्ञात समस्त चंद्रमाओं में दूरी के अनुसार दुसरे क्रम पर स्थित है, यह गैलिलियन चंद्रमाओं के पहले स्थित चार आतंरिक चंद्रमाओं में से सबसे छोटा है . इसे  जुपिटर के नाम से भी जाना जाता है.

एड्रास्टिया को 1979 में वायेजर 2 प्रोब द्वारा लिए गए चित्रों के मध्य से खोजा गया था. यह खोज डेविड सी. जेविट और जी. एडवर्ड डेनियलसन द्वारा की गयी थी और इसे S/1979 J 1 का नाम दिया गया था. यह किसी अंतरिक्ष यान द्वारा लिए गए चित्रों में से खोजा जाने वाला सबसे पहला उपग्रह था. इसकी खोज के पश्चात् वायेजर 1 द्वारा पूर्व में लिए गए चित्रों का अध्ययन किया गया था और थेबे और मेटीस की खोज हुयी थी. इसका आधिकारिक नाम ग्रीक देवता ज़ीउस (ग्रीक देवता जो रोमन देवता जुपिटर के समान है) की सौतेली माँ एड्रास्टिया के नाम पर रखा गया. चित्र में यह चन्द्रमा केवल एक बिंदु के रूप में दिखाई देता था जिससे इसके बहुत छोटे आकार का पता चला था परन्तु कोई भी विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी थी जब तक गैलिलियो अंतरिक्ष यान ने अपने अभियान के अनुसार वर्ष 1998 में एड्रास्टिया की सतह के विस्तृत चित्र भेजे परन्तु चित्रों के बेहद धुंधले होने के कारण हमें इसके बारे में केवल थोडा ही और समझने का अवसर प्राप्त हुआ.

मेटीस की तरह ही एड्रास्टिया अपने ग्रह बृहस्पति से ज्वारीय रूप से बंधा हुआ है. साथ ही यह बृहस्पति की एक परिक्रमा अपने ग्रह के एक दिन से भी कम समय में कर लेता है. ऐसा करने वाला एकमात्र दूसरा उपग्रह मेटीस है. ज्वारीय बंध के कारण इसका केवल एक ही भाग हमेशा बृहस्पति की ओर रहता है. इसका परिक्रमा पथ जुपिटर के मुख्य वलय के अन्दर अपने ग्रह से केवल 129000 किलोमीटर की दूरी स्थित है इसलिए जुपिटर की ज्वारीय बल इसके कक्ष को धीरे धीरे कम करता जा रहा है और एक दिन यह अपने ग्रह से टकरा जाएगा.

इसे वलयों के पदार्थों के प्रमुख स्त्रोत के रूप में भी देखा जाता है जो कि शायद उल्कापिंडों के टकराव के कारण इससे अलग हुए हों. ऐसा माना जाता है कि शायद वलय के अधिकाँश पदार्थ इसी से प्राप्त हुए होंगे क्योंकि इसके पास के वलय घने हैं. 


आकार में अत्यधिक विषमता लिया यह उपग्रह बहुत छोटा केवल 20x16x14 किलोमीटर के आकार का है जो कि इसे बृहस्पति के आतंरिक चंद्रमाओं में सबसे छोटा बनाती है . इसकी संरचना के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि यह मुख्य रूप से पानी की बर्फ से बना है.

Sunday, August 25, 2013

मेटीस (Metis) - बृहस्पति का सबसे आतंरिक उपग्रह

गैलिलियो स्पेस क्राफ्ट द्वारा लिया गया मेटीस का चित्र
मेटीस बृहस्पति (जुपिटर) के ज्ञात समस्त चंद्रमाओं में सबसे अन्दर की ओर स्थित है अर्थात यह अपने ग्रह के सबसे पास स्थित चन्द्रमा है जो बृहस्पति से महज 128000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

मेटीस की खोज स्टीफन सीनोट के द्वारा वायेजर 1 द्वारा लिए गए चित्रों के अध्ययन से 1979 में की गयी थी. 1983 में आधिकारिक रूप से इसे मेटीस का नाम दिया गया जो देवताओं के गुरु ज़ीउस (ग्रीक देवता जो रोमन देवता जुपिटर के समान है) की प्रथम पत्नी थी. वायेजर द्वारा लिए गए चित्र में यह चन्द्रमा केवल एक बिंदु के रूप में दिखाई देता था जिससे इसके बहुत छोटे आकार का पता चला था परन्तु कोई भी विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी थी जब तक गैलिलियो अंतरिक्ष यान ने अपने अभियान के अनुसार वर्ष 1998 में मेटीस की सतह के विस्तृत चित्र भेजे और हमें मेटीस की संरचना को समझने का अवसर प्राप्त हुआ.

मेटीस, अपने ग्रह बृहस्पति से ज्वारीय रूप से बंधा हुआ है और इसके आकार में विषमता भी है. साथ ही यह बृहस्पति की एक परिक्रमा अपने ग्रह के एक दिन से भी कम समय में कर लेता है. ऐसा करने वाला एकमात्र दूसरा उपग्रह अद्रास्टिया है. इसका परिक्रमा पथ जुपिटर के मुख्य वलय के अन्दर स्थित है इसलिए इसे वलयों के पदार्श के प्रमुख स्त्रोत के रूप में भी देखा जाता है जो कि शायद उल्कापिंडों के टकराव के कारण इससे अलग हुए हों.

आकार में अत्यधिक विषमता लिया यह उपग्रह बहुत छोटा केवल 40 किलोमीटर की व्यास का है और यह  बृहस्पति का दूसरा सबसे छोटा उपग्रह है. इसकी संरचना के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि यह मुख्य रूप से पानी की बर्फ से बना है. इसकी धरातली क्रेटर यानी गड्ढों से भरी हुयी है और यह लाल रंग का नजर आता है. जैसा की पूर्व में कहा गया है इसके गोलार्ध अत्यधिक विषमता लिए हुए हैं इसका कारण संभवतः इसके गोलार्ध पर टकराव की तीव्रता और संख्या है जिसके कारण शायद इसके आतंरिक भाग से काफी सामग्री  इसके उभार वाले हिस्से पर निकल आई है.

मेटीस, बृहस्पति के आतंरिक चार चंद्रमाओं में से एक है और केवल 128000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इसके कारण जुपिटर की ज्वारीय बल इसके कक्ष को धीरे धीरे कम करता जा रहा है साथ ही बेहद नजदीक होने के कारण यहाँ से जुपिटर का केवल 31 % भाग ही मेटीस से नजर आता है जो कि किसी भी चन्द्रमा की तुलना में सबसे कम है. यहाँ से बृहस्पति केवल एक अर्धवृत्त के रूप में नजर आता है .

Friday, August 9, 2013

आयो (Io)

गैलिलियो यान द्वारा भेजी जानकारी के आधार पर आयो का चित्र
आयो, बृहस्पति के गलिलियन चंद्रमाओं में से एक है. क्रम के आधार पर यह बृहस्पति का पांचवा तथा आकर में  तीसरा बड़ा उपग्रह है. १६१० में गलीलियो के द्वारा खोजे गए हमारे चन्द्रमा से भी बड़े इस उपग्रह का नाम ज्यूस की अविवाहित प्रेमिका आयो के नाम पर रखा गया था.


अधिकतर चंद्रमाओं के विपरीत आयो की सतह काफी सक्रीय है. इसकी संरचना किसी चट्टानी ग्रह की तरह की है. वायेजर यान ने जब इस उपग्रह की तसवीरें भेजी तो अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए ये एक आश्चर्य की तरह था – क्योंकि अनुमान के विपरीत आयो पर उल्का पिंडो से बने क्रेटरों की संख्या काफी कम थी. वहीँ वायेजर को यहाँ पर सैकड़ों सक्रीय ज्वालामुखी भी मिले जिनकी राख सैकड़ों किलोमीटर ऊपर तक उठती थी. वोएजर १ और २ के द्वारा ली गयी तस्वीरों में इन ज्वालामुखियों की स्थिति में काफी अंतर है जो यह दर्शाती है की आयो की सतह नित – परिवर्तनशील है.
सक्रिय ज्वालामुखीय लावा

वैज्ञानिकों का मानना है की आयो की यह सक्रियता आयो, गेनीमेड, युरोपा और बृहस्पति के मध्य गुरुत्वीय खिचाव के कारण है. एक बेहद रोचक बात यह है की आयो बृहस्पति की चुम्बकीय रेखाओं के काटता है जिसके कारण यहाँ कई ट्रिलियन वाट तक की विद्युत् उर्जा उत्पन्न होती है जो कि अंततः आयो की सतह को क्षरित करती है.

आयो की सतह विभिन्नताओ से भरी हुयी है. जहाँ एक ओर ज्वालामुखी हैं तो दूसरी ओर सामान्य पर्वत भी यहाँ मौजूद हैं. पिघली हुयी गंधक की झीले और नदियाँ इस उपग्रह को वैज्ञानिकों के लिए रोचक बनती हैं. आयो का अपना चुम्बकीय क्षेत्र है और सल्फर डाई ऑक्साइड से बना वातावरण भी. चारों गलिलियन चंद्रमाओं में से केवल आयो में पानी नहीं है जो शायद उसकी बृहस्पति की निकटता और ऊष्मा के कारण वाष्पित हो चूका है. 

Thursday, August 8, 2013

बृहस्पति (Jupiter)

बृहस्पति ग्रह
बृहस्पति या ज्यूपिटर क्रम के हिसाब से सौरमंडल का पांचवा परन्तु सबसे बड़ा ग्रह  है. इस ग्रह  की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की इस एक ग्रह  का द्रव्यमान, सौर मंडल के बाकी सभी ग्रहों के द्रव्यामन के योग का भी दुगुना है. शायद इसी लिए इस ग्रह का नाम ज्यूपिटर रखा गया है क्योंकि रोमन मिथकों में जुपिटर देवताओं के राजा थे. हिंदी मिथक के आधार पर भी इस ग्रह  का नाम बृहस्पति रखा गया है जो की देवताओं के गुरु माने जाते हैं.

बृहस्पति के सबसे पहला निरिक्षण गैलिलियो ने दूरबीन से किया था साथ ही उस समय संभव अपनी दूरबीन से उन्होंने इसके चार प्रमुख चंद्रमाओं – आयो, युरोपा, गेनिमेड और कैलिस्टो की भी खोज कर ली थी. गलीलियो के द्वारा खोजे जाने के कारण उनके सम्मानस्वरूप इन चंद्रमाओं को गलिलियाँ चन्द्रमा भी कहते हैं.
बृहस्पति के लिए प्रथम अभियान पायनियर १० के साथ प्रारंभ हुआ. पायनियर की अगली कड़ी पायनियर ११ के बाद वायेजर श्रंखला के दोनों यान इस ग्रह  का अध्ययन करते हुए गुजरे. गैलिलियो अभियान के अंतर्गत गैलिलियो यान पूरे आठ वर्षों तक इसकी परिक्रमा करता रहा और जरूरी आंकड़े भेजता रहा.

बृहस्पति को कुछ वैज्ञानिक असफल सितारा भी कहते हैं क्योंकि इसकी आतंरिक संरचना सूर्य की तरह की ही है जिसमे हाइड्रोजन और हीलियम प्रचुर मात्रा में उपस्थित हैं, परन्तु इसमें नाभिकीय संविलियन के लायक उर्जा नहीं है अन्यथा बृहस्पति स्वयं एक सितारा होता.

बृहस्पति का चुम्बकीय क्षेत्र अन्यंत शक्तिशाली है जो ६५ करोड़ किलोमीटर तक फैला हुआ है. यह चुम्बकीय क्षेत्र शनि ग्रह  की कक्षा तक फैला हुआ है, इसके सभी उपग्रह इसी क्षेत्र के अन्दर स्थित हैं.

वोएजर १ से बृहस्पति में भी शनि जैसे वलयों का पता चला है जो चट्टानों के धुल कणों से बने हैं.
बृहस्पति, उपग्रहों के मामले में भी सबसे बड़ा परिवार रखता है, अभी तक इसके ६३ उपग्रह आधिकारिक रूप से ज्ञात किये जा चुके हैं.