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Sunday, October 18, 2020

बेनू (Bennu) – हमारे सौरमंडल के क्षुद्रग्रह में मिले जीवन के संकेत

आधुनिक युग में अन्तरिक्ष के कौतुहल से साक्षात्कार के लिए विश्व की अन्तरिक्ष संस्थाएं लगातार प्रयासरत हैं. इसी क्रम में अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा के ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-Rex) से अद्भुत जानकारी मिली है. यह अन्तरिक्ष यान विगत दो वर्षों से बेनू (Bennu 101955) नामक क्षुद्रग्रह का अध्ययन कर रहा है. पृथ्वी और मंगल के मध्य स्थित क्षुद्रग्रहों की पट्टी के इस क्षुद्रग्रह पर पृथ्वी के प्रारंभिक जीवन के संकेत मिले हैं. ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-Rex) को बेनू के पत्थरों में कार्बनिक पदार्थों की उपस्थिति का पता चला है, जिससे पृथ्वी के निर्माण के समय और उसमें जीवन की शुरुआत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं. 

इस क्षुद्रग्रह की सतह पर मौजूद चट्टानों की विविध संरचना, उसके गुरूत्व और असामान्य तरह के हीरे के आकार से इसके दो क्षुद्रग्रहों के मेल से बनने का सुनिश्चित विचार अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को रहा है. दरअसल बेनू में दो प्रकार के चट्टानों का पता चला है परन्तु वे इतने मजबूत नहीं है की पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने पर बच सकें, इसलिए इस प्रकार के कार्बनिक संरचना युक्त चट्टानों को योजना अनुसार 2023 में सुरक्षित धरती पर लाकर अध्ययन करने से कई खोयी कड़ियाँ जुड़ सकती हैं जिसमें पृथ्वी के साथ हमारे ग्रह से टकराने वाले और पास से गुजरने वाले कई अन्य क्षुद्रग्रहों की जानकारियाँ भी मिल सकेंगी. 


सौरमंडल के निर्माण के समय ग्रह या उपग्रह में परिवर्तित न हो सके इन आकाशीय पिंडों में हमारे ग्रह के निर्माण के शुरुआती संकेत छिपे हुए हैं. शोधकर्ता एमी सिमोन का विचार है कि बेनू क्षुद्रग्रहों की पट्टी से पृथ्वी की ओर आया है. इससे इस बात को बल मिलता है की  पृथ्वी की निर्माण की प्रारंभिक अवस्था में अनेक पदार्थ हमारे ग्रह पर दूर से आए होंगे. कार्बोनेट, कार्बनिक और जलमिश्रित पदार्थों का बेनु पर समग्र उपस्थिति इस विचार की पुष्टि करता है कि क्षुद्रग्रह और धूमकेतु ही हमारे गृह पर जल तथा जीवन को पहुँचाने वाले वाहक हैं. 

वर्ष 2023 में इस बारे में स्थिति और स्पष्ट होगी. ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-Rex) का अभियान जारी है और संभवतः जल्द ही बेनू के सम्पूर्ण मानचित्र तैयार हो सकता है. 

बेनु से मिले संकेत काफी मिलेजुले से हैं जो उसकी संरचना विविधता और अन्य कारकों का कारण हो सकते हैं. ऐसे में शोधकर्ता बेनु के नमूनों का इंतजार कर रहे हैं जिससे उनके अध्ययन को पुष्टि और विस्तृत जानकारी मिल सकेगी.


Tuesday, March 31, 2020

छिद्रयुक्त एस्टेरोइड - रयुगु (Ryugu)




पहले हायाबुसा अभियान की कामयाबी के बाद इसका अगला संस्करण हायाबुसा 2 क्षुद्रग्रह (एस्टेरोइड) रयुगु (Ryugu) के अभियान पर है. इसी वर्ष दिसम्बर में इसकी वापसी प्रस्तावित है. अपने इस अभियान में इसने बारीकी से इस एस्टेरोइड का अध्ययन किया है.  हायाबुसा-2 के द्वारा ली गयी तस्वीरों में साफ़ नजर आता है कि यह क्षुद्रग्रह अत्यधिक छिद्रयुक्त, हल्का और नर्म सा है. शायद ऐसे छिद्रों से भी युक्त जो एक छोर से दूसरे छोर तक जाते हों.      

जापान की अंतरिक्ष अन्वेषण संस्था के वैज्ञानिक ओकादा इसकी तुलना फ्रीज़ में रखी सूख चुकी कॉफ़ी से करते हैं. उनके अनुसार संभवतः हमारे ग्रह भी कुछ ऐसे ही रहे होंगे अपने निर्माण के पहले. यहाँ यह बताना आवश्यक है कि रयुगु एक बेहद प्राचीन क्षुद्रग्रह है जो कि सौर मंडल के निर्माण के पहले से उपस्थित है. इस छुद्रग्रह में कार्बन की प्रचुर उपलब्धता है. हायाबुसा-2 ने एस्टेरोइड से पृथ्वी पर लाने के लिए दो नमूने भी लिए हैं जो सौरमंडल के निर्माण की प्रारंभिक अवस्था और परिस्तिथियों को समझने में हमारी मदद करेंगे. यान ने इसके साथ ही इस बात का भी पता लगाया है कि यह क्षुद्रग्रह किस तरह से गर्मी को सतह पर रोके रखता है. इसकी संरचना कैसी है. 

जैसा हम जानते हैं कि घने चट्टानों वाली संरचनाएं धीरे से गर्मी सोखती है और ज्यादा देर तक गर्म रहती हैं वहीँ छिद्रयुक्त संरचनाएं किसी रेगिस्तान की तरह होती हैं जो जल्दी-जल्दी अपना तापमान खोती जाती हैं. कुछ वैसे ही जैसे रेगिस्तानी क्षेत्र दिन में बेहद गर्म तो रात को काफी ठन्डे हो जाते हैं. रयुगु के साथ भी यही बाद वाली स्थिति आती है. 

इस छिद्रयुक्त की आधी संरचना यानी 50% भाग में छिद्र है. एक अनुमान के अनुसार 70 करोड़ वर्ष पहले किसी बड़े पिंड के टूटने के बाद इसका निर्माण हुआ है और यह भुरभुरा सा है. शायद जिस पिंड से यह बना है वो भी ऐसा ही था हो. वैज्ञानिक इसे ग्रहों के निर्माण से भी जोड़ते हैं और कहते हैं कि सौर मंडल के शुरुआत में ऐसी ही ढीली संरचनाएं बनी होंगी और पुनः तुरंत टूट गयी होंगी. इसका यही मतलब है कि ग्रहों के निर्माण के समय की प्रारंभिक अवस्था बड़ी जोड़-तोड़ वाली रही होगी जहाँ नित नए पिंड बनते रहते थे और टूट कर पुन: निर्माण की प्रक्रिया में जुड़ जाते थे जब तक कि एक परिपक्व और स्थायी संरचना न जाए जिसे हम ग्रह के नाम से जानते हैं.

Saturday, August 31, 2019

16 साइके (16 Psyche) – क्षुद्रग्रह या सोने से बना खरबों का धातु-भण्डार

अमरीकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा – सुनहरे क्षुद्रग्रह के पीछे है जो धरती पर हर किसी को खरबपति बना सकता है (सैद्धांतिक रूप में) क्योंकि इसमें सोने और लोहे का अकूत भण्डार है जिसमें से केवल लोहे का भण्डार आज की कीमत में 8000000000000000000 डॉलर का है (कितनी है यह राशि आप ही गिनिये), सोने की कीमत की तो गणना ही नहीं.
16 साइके का काल्पनिक चित्रण 
है न अद्भुत सी बात, पर अनजाने अन्तरिक्ष में हर दिन आश्चर्यचकित करने वाली घटनाओं का एक पूरा अबूझ संसार है. ऐसी ही एक दुनिया है हमारे अपने सौरमंडल में – क्षुद्रग्रहों का एक पूरा लेकिन अव्यवस्थित संसार. इसी संसार में 16 साइके (16 Psyche) नामक एक विशाल क्षुद्रग्रह है जिसमें कीमती धातुओं का अतुल्य भण्डार है. लगभग 140 मील यह क्षुद्रग्रह या एस्टेरोइड, मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के मध्य रहकर अपनी कक्षा में सूर्य का चक्कर लगाता रहता है. इस क्षुद्रग्रह पर नासा 2022 में अभियान भेजना चाहता है. परन्तु इसकी वजह केवल ये कीमती धातु नहीं हैं, हालांकि खनन या माइनिंग उद्योग  के लोगों की लालची नजरें वसुधा को नष्ट करने के बाद अब सौरमंडल के इस संसार पर टिक गयी है.
प्रस्तावित अन्तरिक्ष यान का चित्रण 
नासा इस क्षुद्रग्रह के बारे में यह मानता है कि यह किसी ग्रह का कोर हो सकता है जो स्वतंत्र रूप से अन्तरिक्ष में परिक्रमारत है. पृथ्वी के कोर या केंद्र में भी कीमती धातुएं तरल रूप में तैरती रहती हैं परन्तु उन्हें निकाल पाना नामुमकिन है और धरती की स्थिरता के लिए निषिद्ध भी. इसलिए नासा का मुख्य उद्देश्य इस अभियान के पीछे यह जानना है कि क्या यह वास्तव में ही किसी पूर्व ग्रह का बाख गया केंद्र है. अगर ऐसा है तो हमें हमारी पृथ्वी और इसके सदृश्य अन्य ग्रहों के निर्माण की सबसे कठिन कड़ी जानने को मिल सकेगी.
वैसे 16साइके के अलावा UW -158 में प्लैटिनम का लगभग 90000000000 किलोग्राम का भण्डार है. परन्तु इन बेशकीमती नजरानों को इंसान की भूखी नजरों ने नुक्सान पहुँचाना शुरू किया, तो धरती से शुरु हुया तबाही का मंजर अन्तरिक्ष में भी देखने मिल जाएगा. वैसे भी कृत्रिम उपग्रहों के कबाड़ अन्तरिक्ष में प्रदूषण तेजी से उत्पन्न कर रहा है.

Tuesday, April 16, 2019

हायाबुसा 2 - क्षुद्र ग्रह पर पहला अन्तरिक्ष यान

हायाबुसा-2 और क्षुद्र ग्रह रयुगू (Ryugu)
आज से लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व जब सौर परिवार का जन्म हुआ था तब हमारे ग्रहों और कालांतर में उनके अनेकों उपग्रहों का जन्म हुआ था. इसी कड़ी में कुछ गैसीय बादल जो पृथ्वी और मंगल के मध्य थे, वे क्षुद्र पिंडों या एस्टेरोइड में बदल गए (दूसरी मान्यता के अनुसार ये मंगल के उपग्रह के टुकड़े भी हो सकते हैं). इन क्षुद्र ग्रहों के साथ सौर मंडल के निर्माण की कहानी आवश्यक रूप से जुड़ी है और इसी ऐतिहासिक कथा के कुछ रहस्यों को खोलने के उद्देश्य से जापान की अन्तरिक्ष संस्था जाक्सा (JAXA - Japan Aerospace Exploration Agency) ने आज से तकरीबन 5 वर्ष पूर्व हायाबुसा-2 (Hayabusa-2) नामक अन्तरिक्ष यान सबसे पुराने क्षुद्र ग्रहों में से एक माने जाने वाले रयुगू (Ryugu) के लिए अन्तरिक्ष में रवाना किया था. रयुगू धरती से लगभग 18.6 करोड़ मील की दूरी पर स्थित है.

हायाबुसा-2 गत वर्ष 2018 में इस चट्टानी पिंड के नजदीक पहुंचा और सितम्बर 2018 में दो रोबोट इसकी धरातल पर उतारे. कई महीनों तक नजदीक से चित्र और अन्य आंकड़े एकत्रित करते हुए इस वर्ष 2019 की फरवरी में अपनी कसौटी पर खरा उतरते हुए इस यान ने इस क्षुद्र ग्रह की धरातल पर अपने कदम रखे. इसी के साथ ही जापान के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की आशाएं सौरमंडल के अध्ययन को आगे ले जाने की दिशा में और सुदृढ़ हो गयी. 
एस्टेरोइड रयुगू और वह स्थान जहाँ छिद्र किया गया 

ये वैज्ञानिक रयुगू के धूल के अध्ययन से शुरूआती अन्तरिक्ष के बारे में जानने का प्रयास कर रहे हैं. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्हें इसकी धरातलीय संरचना के नमूने चाहिए. उपरी हिस्से के नमूने तो एकत्रित किये जा चुके थे, परन्तु उपरी सतह के नीचे का धरातल कैसा है यह जानना अति-आवश्यक था. इसलिए इस अन्तरिक्ष यान में विशेष तौर पर निर्मित गोली (Bullet) भेजी गयी थी ताकि उसकी धरातलीय संरचना के बारे में बेहतर नमूनों के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त की जा सके. प्रोब ने सफलतापूर्वक विशेष गन से 650 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से टैंटलम धातु से निर्मित गोली से इस क्षुद्र ग्रह को भेदने में सफलता प्राप्त की है. 


यह प्रोब इन नमूनों के लेकर जल्द ही ( दिसम्बर 2020 में) धरती पर वापस आएगा तब जापान और विश्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की बिरादरी इसके बारे में अध्ययन में जुट जायेंगी तब तक विश्व के अपने तरह के इस पहले अभियान की निरंतर सफलता की आशा है. वैसे वैज्ञानिकों को विश्वास है कि इस क्षुद्र ग्रह पर जैविक पदार्थों और पानी की भरपूर मात्रा रही होगी जब 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौर मंडल का निर्माण हुआ था. 

क्षुद्र ग्रह के धरातल में छिद्र करना इस अभियान का पहला बड़ा पड़ाव था. अगले पड़ाव में यह मैस्कॉट (Mascot) आयर मिनेर्वा-II (Minerva-II) लैंडर उतरेगा जो इसकी सतह पर घूमकर अध्ययन करेंगे. 



Sunday, July 1, 2018

हेरा अभियान – बाइनरी क्षुद्रग्रह पर पहला अभियान (प्रस्तावित)

मानव सदा से जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है, और हर अलग सी लगने वाली चीजों के बारे में वह अधिक-से-अधिक जानना चाहता है. परन्तु जिस प्रकृति ने मानव को रचा है, वह उसकी जिज्ञासा को अनवरत जारी रखने सदा प्रयत्नशील रहती है. मानव कितनी भी खोज क्यों न कर ले, प्रकृति फिर उसके सामने कोई नया कौतुहल रख ही देती और मानव अपनी प्रवृत्ति के अनुसार एक नयी खोज में फिर जुट जाता है. 

डीडीमॉस क्षुद्रग्रह प्रणाली - बड़ा पिंड डीडीमेन और उसका चाँद डीडीमून
 कुछ ऐसा ही होने वाला है इस बार भी – यूरोपीय अन्तरिक्ष संस्थान (ESA – European Space Agency) जल्द ही जुड़वाँ या द्वय-क्षुद्रग्रहों (Binary Asteroids System) पर मानव इतिहास का पहला अभियान भेजने वाला है. यह अभियान एक वैज्ञानिक अध्ययन के साथ ही धरती को क्षुद्रग्रहों के टकराव से बचाने के महत्वाकांक्षी योजना में अपना प्रबल योगदान भी प्रदान करेगा. 

इस अभियान का नाम ग्रीक देवी हेरा (Hera) को समर्पित है जो विवाह की देवी मानी जाती है. हेरा दोहरे-क्षुद्रग्रहों (Binary Asteroids) यानि क्षुद्र-ग्रहों के एक ऐसे जोड़े के लिए उड़ान भरेगा जो एक-दूसरे का चक्कर लगाते हैं. इस जोड़े का नाम है 65803-डीडीमॉस (65803-Didymos) जो कि धरती के नजदीक स्थित क्षुद्रग्रहों का जोड़ा है. इस जोड़े में 780 मीटर व्यास के बड़े पिंड डीडीमेन (Didymain) का चक्कर 160 मीटर का पिंड लगा रहा है मानो जैसे वह इसका चाँद हो. इस नन्हे चाँद को वैज्ञानिक डीडीमून (Didymoon) कहते हैं. यही चन्द्रमा इस हेरा अभियान का मुख्य केंद्र बिंदु भी है. हेरा अन्तरिक्ष यान हाई-रेसोल्यूशन कैमरे, लेज़र और रेडियो तरंगों के माध्यम से इसकी पूरी सतह का नक्शा तैयार , उपरी परत के अन्दर तक झांकते हुए. ये आज तक का सबसे छोटा क्षुद्रग्रह है जिसका अध्ययन करने का प्रयास किया जाएगा. वैसे मंगल और बृहस्पति के बीच व्याप्त असंख्य क्षुद्रग्रहों में ऐसे जोड़ों की संख्या लगभग 15% अनुमानित है. 

हेरा प्रोजेक्ट के प्रबंधक इयान कार्नेली (Ian Carnelli)के अनुसार इन क्षुद्रग्रहों के काफी छोटे आकार के कारण उत्पन्न अत्यंत सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में दिशा-निर्देशन और मार्गदर्शन प्रणाली के साथ प्रयोग काफी चुनौतीपूर्ण रहेगा. परन्तु सफलता की उन्हें पूर्ण आशा भी है. 

ये अध्ययन तो ठीक है, परन्तु मैंने लिखा है कि यह अभियान क्षुद्रग्रहों से धरती की रक्षा के महत्वाकांक्षी अभियान का भी हिस्सा है तो कैसे!!! ये होगा नासा (NASA) की मदद से. हेरा के इस प्रणाली तक पहुँचने की पूर्ण ही नासा का एक महत्वपूर्ण अभियान जिसे डार्ट (DART) का नाम दिया गया है, इस चाँद जैसे छोटे क्षुद्रग्रह से अक्टूबर 2022 में टकराएगा. इस टक्कर का उद्देश्य डीडीमॉस की परिक्रमा करते इस डीडीमून के परिक्रमा पथ में परिवर्तन करना है. अगर ऐसा हुआ तो यह हमारे सौर-मंडल का पहला पिंड बन जाएगा जिसके परिक्रमा पता को मानवीय प्रयासों से बदला गया होगा. अगर यह कामयाब हुआ तो भविष्य में धरती से टकराने वाले उल्का और क्षुद्रग्रहों के परिक्रमा पथ में परिवर्तन करके धरती को बचाया जा सकेगा. 

इस ऐतिहासिक टक्कर के बाद डीडीमून में हुए परिवर्तनों के बारे में जानकारी देगा यह हेरा अभियान. नासा ने टक्कर की योजना जरूर बनायी है परन्तु इस टक्कर के बाद के प्रभावों का अध्ययन केवल धरातलीय अन्वेषण से किया जाना प्रस्तावित है . इस घटना के बाद की जो महत्वपूर्ण जानकारियाँ गायब रहेंगी उसे हेरा अभियान (Hera Mission) पूर्ण करेगा. जिससे यह पता चल पायेगा की इसकी कक्षा और संरचना में किस तरह का परिवर्तन हुआ है.

हेरा से प्राप्त विस्तृत आंकड़े इस ऐतिहासिक टक्कर के रामंचक घटनाक्रम को समझने में हमारी मदद करेगा ताकि भविष्य में ऐसे अवांछित क्षुद्रग्रहों के पृथ्वी से टकराव को रोका जा सके और पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सके. 

हेरा अन्तरिक्ष यान - डीडीमून की संरचना का अध्ययन करता हुआ
अभी तक ऐसे क्षुद्रग्रहों के द्रव्यमान की गणना के लिए उसके गुरुत्वीयबल को आधार बनाया जाता रहा है, लेकिन डीडीमून जैसे छोटे पिंड के लिए यह तरीका सहीं नहीं है क्योंकि इसका गुरुत्व, बड़े पिंड जिसे वैज्ञानिक डीडीमेन कहते हैं, के गुरुत्व की तुलना में नगण्य है जिसके कारण इसके गुरुत्व का प्रभाव बहुत कम हो जाता है. हेरा अभियान इसके बदले डीडीमेन के बड़े भू-लक्षणों जैसे बड़े पहाड़ या क्रेटर पर होने वाले डीडीमून के प्रभाव के आधार पर 90 % शुद्धता के साथ डीडीमून के द्रव्यमान की गणना करेगा. इस प्रक्रिया से सबसे महत्वपूर्ण  है -  डार्ट से हुए टक्कर से निर्मित क्रेटर का अध्ययन. इस कार्य के लिए इसके पास फ्रेमिंग camera, लेज़र राडार, स्पेक्ट्रल इमागेर जैसे आधुनिक उपकरण होंगे. 

वैसे पूर्व में बजट के कारण यूरोप की सरकारों ने इस अभियान से इनकार कर दिया था, परन्तु वैज्ञानिक जगत के विरोध के बाद पुनः प्रस्तावित यह अभियान अपने वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होगा, इसी उम्मीद के साथ. 

अगर सब ठीक हुआ, तो धरती को बाहरी क्षुद्रग्रहों या विशाल उल्का-पिंडो से कम-से-कम खतरा होगा; परन्तु सबसे बड़ा खतरा धरती को तो हम इंसानों से ही है... है न!!!

Saturday, August 5, 2017

इस वर्ष अक्टूबर में निकट से गुजरेगा रहस्यमय क्षुद्र ग्रह

(वैश्विक निगरानी नेटवर्क की क्षमता जांचेगी नासा)


पृथ्वी पर जीवन करोड़ों वर्ष पहले आया था परन्तु हर चीज की तरह यह भी हमेशा नहीं रहेगा. असीमित अन्तरिक्ष में घुमते अनगिनत पिंड गाहे-बगाहे हमारे धरती के समीप आ जाते हैं. पुच्छल तारे (धूमकेतु) और क्षुद्र ग्रहों के रूप में पृथ्वी पर खतरा बना ही रहता है. अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था नासा और विश्व के अन्य सभी अन्तरिक्ष संस्थान अपनी वेधशालाओं से इन संभावित खतरों पर नजर रखे रहती हैं.

इस वर्ष भी अर्थात 2017 में भी 10 मीटर से 30 मीटर के आकार का एक क्षुद्र ग्रह पृथ्वी के नजदीक से गुजरेगा. यह 12 अक्टूबर को पृथ्वी के करीब से गुजरेगा और वैज्ञानिक इस बात से सुनिश्चित है कि यह पृथ्वी की सतह से 6,800 किमी से अधिक निकट नहीं आएगा. यह क्षुद्रग्रह 2012 से दूरदर्शी के रेंज से बाहर चल रहा है.

इसे ध्यान में रखते हुए नासा अपने वेधशालाओं के नेटवर्क को परखने के लिए इस क्षुद्रग्रह की मदद लेने की योजना बना चूका है. यह नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय पहलू के उपयोग के लिए मिलकर निगरानी के अभियान का एक बेहतरीन मौका है. यह परिक्षण पृथ्वी के पास से गुजरने वाली हरेक संभावित खतरे पर नजर रखने और आपात स्थिति में उससे निपटने की तैयारी करने में मददगार साबित होगा.

वैसे यह एक सामूहिक प्रयास है, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा वेधशालाएं, विश्वविद्यालय और दुनिया भर की प्रयोगशालाएं शामिल हैं, जिसमें सामूहिक रूप से पृथ्वी के पास वस्तु पर निगरानी की क्षमताओं व सीमाओं को जानने और उन्हें और सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया जाएगा.

Wednesday, December 23, 2015

अपोफिस (Apophis) - 2029/2036 में टकराव की आशंका के साथ पृथ्वी की ओर बढ़ रहा एक क्षुद्रग्रह

एशिया और उत्तरी अफ्रीका के लोगों को 13 अप्रैल 2029 की सुबह एक बेहद दिलचस्प नजारा देखने का सु-अवसर प्राप्त हो सकता है, जब एक एस्टेरोइड 99942 अपोफिस (Apophis) धरती से बेहद पास से केवल 20000 मील की दूरी से गुजरेगा. वैसे तो धरती के पास से अनेक एस्टेरोइड गुजरते रहे हैं और अनगिनत धरती के वायुमंडल में प्रवेश भी करते हैं. कई नष्ट हो जाते हैं तो कुछ नगण्य धरातल तक पहुचकर धरती को नुकसान भी पहुँचा चुके हैं, परन्तु 1000 फीट से भी अधिक व्यास वाले इस  एस्टेरोइड जितने बड़े एस्टेरोइड के धरती के इतने करीब से गुजरने की घटना लगभग डेढ़ हजार वर्षों में केवल एक बार ही होती है. 

यही कारण है कि वैज्ञानिक जगत इस नजदीकी मिलन का बड़ी बेसब्री से इन्तेजार कर रहे हैं क्योंकि यह क्षुद्र ग्रहों के अध्ययन के लिए अब तक का सबसे बेहतरीन अवसर प्रदान करेगी. परन्तु इस उत्साह में एक भय और आशंका भी शामिल है - वैज्ञानिकों के एक वर्ग के अनुसार इस नजदीकी मुलाक़ात में यह क्षुद्र गृह हमारी धरती को टकराकर उसे बहुत घातक नुक्सान पहुंचा सकता है, इस बात की सम्भावना चालीस में से एक की है, और अन्तरिक्ष पिंडों के मनचले स्वाभाव और अनिश्चितता को देखते हुए यह भय होना लाजिमी भी है. संभवतः इसलिए अपोफिस का नामकरण प्राचीन मिस्र के अन्धकार और अव्यवस्था के देवता पर रखा गया है. वैसे वैज्ञानिकों द्वारा पूर्व में इसका नामकरण 2004 MN4 किया गया था. वैसे एक अन्य अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि सूर्य परिक्रमा के पश्चात् २०३६ में यह पृथ्वी के परिक्रमा पथ से गुजरेगा तब एक नगण्य ही सहीं परन्तु इसकी धरती से टक्कर होने की आशंका रहेगी. 


इस घटना को नंगी आखों से देखा जा सकेगा, जैसे नासा के नियर अर्थ ऑब्जेक्ट प्रोग्राम के प्रबंधक डॉन येओमंस कहते हैं – “यह यकीनी तौर पर आकाश में दिखने वाली सबसे चमकीली वस्तु नहीं होगी, परन्तु यह आसानी से नंगी आखों से दिखाई देगी.”

वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा इन्तेजार इसकी आतंरिक संरचना को जानने के लिए है, क्योंकि इतने नजदीक से किसी क्षुद्रग्रह का गुजरना आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से बहुत सारे नए रहस्य उजागर कर सकता है. परन्तु यह भी सच है कि धरती के आधुनिकतम उपकरण भी पृथ्वी पर रहकर बहुत सी बातें पता नहीं कर सकते इसलिए इस क्षुद्र गृह के परिक्रमा पथ पर एक प्रोब स्थापित करने पर विचार किया जा सकता है, वैसे वर्तमान तक ऐसा कोई अभियान प्रस्तावित नहीं है. यहाँ एक बात यह भी है कि अगर यह वाकई पृथ्वी से टकरा सकता है तो इस बात की पुख्ता जानकारी और बचाव अभियान के लिए अभी से प्रयत्न करना होगा, परन्तु यह भी संभव है कि इस टकराव की आशंका गलत ही साबित हो. इसलिए बेहतर यही होगा कि ये फैसला भविष्य पर छोड़कर इसके आगमन का इन्तेजार शुभकामनाओं के साथ किया जाए.