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Monday, July 8, 2019

नासा की ‘टाइटन’ पर ड्रोन भेजन की भविष्य की योजना

काल्पनिक चित्र - ड्रैगनफ्लाई टाइटन की सतह के ऊपर उड़ता हुआ 

अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने विगत सप्ताह ‘न्यू फ्रंटियर्स’ कार्यक्रम के अंतर्गत शनि ग्रह के सबसे विशाल और दिलचस्प चन्द्रमा टाइटन पर ड्रैगनफ्लाई (Dragonfly) नामक ड्रोन भेजने के प्रस्ताव की जानकारी दी है. यह ड्रोन परमाणु ईंधन से संचालित होगा. नासा टाइटन पर विशेष रूप से ध्यान दे रहा है क्योंकि सौर मंडल के इस अनोखे ग्रह पर जीवन हेतु आवश्यक सभी तत्वों की उपस्थिति की सम्भावना बहुत अधिक है. नासा के ग्रह विभाग की निदेशक (Director) ग्लेज़ के अनुसार यह ड्रोन 2026 में प्रक्षेपित होने की सम्भावना है. लगभग 85 करोड़ डॉलर का यह अभियान नासा के महत्वाकांक्षी ‘जीवन की खोज’ अभियान का अगला चरण है. आशा है कि यह टाइटन के बारे में हमारे ज्ञान का दायरा और विस्तृत करेगा. परन्तु अभी इसके लिए 15 वर्षों का इन्तजार है क्योंकि प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार यह 2034 में ही टाइटन पहुँच पायेगा.

नासा के अनुसार ड्रैगनफ्लाई लगभग 9 वर्ष में 84 करोड़ मील का सफ़र तय कर टाइटन पर पहुंचेगा. इसे टाइटन की सतह पर उतरने में लगभग 2 घंटे का समय लगेगा जिसमें यह धीरे-धीरे नीचे की ओर उतरेगा. टाइटन की सतह पर पहुँचने के पश्चात् आगामी 2.7 वर्षों तक यह 20 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से लगभग 2 मील ऊपर उड़ते हुए टाइटन के बारे में जानकारी एकत्रित करेगा. नासा के प्रस्ताव के अनुसार एक बार की उड़ान अधिकतम 5 मील की होगी और यह टाइटन के प्रति दिन (टाइटन में एक दिन हमारे 16 दिनों के बराबर होता है) इस रफ़्तार से आगे बढ़ते हुए इसके सभी महत्वपूर्ण भू-भागों के बारे में जानकारी एकत्रित करता रहेगा – विशेषकर इसमें बने रेतीले टापुओं के बारे में.

शायद इन्तेजार का फल बेहद शुभ निकले और हमें आश्चर्यों से भरी कोई अनजानी दुनिया का पता चल सके...

Tuesday, April 16, 2019

हायाबुसा 2 - क्षुद्र ग्रह पर पहला अन्तरिक्ष यान

हायाबुसा-2 और क्षुद्र ग्रह रयुगू (Ryugu)
आज से लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व जब सौर परिवार का जन्म हुआ था तब हमारे ग्रहों और कालांतर में उनके अनेकों उपग्रहों का जन्म हुआ था. इसी कड़ी में कुछ गैसीय बादल जो पृथ्वी और मंगल के मध्य थे, वे क्षुद्र पिंडों या एस्टेरोइड में बदल गए (दूसरी मान्यता के अनुसार ये मंगल के उपग्रह के टुकड़े भी हो सकते हैं). इन क्षुद्र ग्रहों के साथ सौर मंडल के निर्माण की कहानी आवश्यक रूप से जुड़ी है और इसी ऐतिहासिक कथा के कुछ रहस्यों को खोलने के उद्देश्य से जापान की अन्तरिक्ष संस्था जाक्सा (JAXA - Japan Aerospace Exploration Agency) ने आज से तकरीबन 5 वर्ष पूर्व हायाबुसा-2 (Hayabusa-2) नामक अन्तरिक्ष यान सबसे पुराने क्षुद्र ग्रहों में से एक माने जाने वाले रयुगू (Ryugu) के लिए अन्तरिक्ष में रवाना किया था. रयुगू धरती से लगभग 18.6 करोड़ मील की दूरी पर स्थित है.

हायाबुसा-2 गत वर्ष 2018 में इस चट्टानी पिंड के नजदीक पहुंचा और सितम्बर 2018 में दो रोबोट इसकी धरातल पर उतारे. कई महीनों तक नजदीक से चित्र और अन्य आंकड़े एकत्रित करते हुए इस वर्ष 2019 की फरवरी में अपनी कसौटी पर खरा उतरते हुए इस यान ने इस क्षुद्र ग्रह की धरातल पर अपने कदम रखे. इसी के साथ ही जापान के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की आशाएं सौरमंडल के अध्ययन को आगे ले जाने की दिशा में और सुदृढ़ हो गयी. 
एस्टेरोइड रयुगू और वह स्थान जहाँ छिद्र किया गया 

ये वैज्ञानिक रयुगू के धूल के अध्ययन से शुरूआती अन्तरिक्ष के बारे में जानने का प्रयास कर रहे हैं. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्हें इसकी धरातलीय संरचना के नमूने चाहिए. उपरी हिस्से के नमूने तो एकत्रित किये जा चुके थे, परन्तु उपरी सतह के नीचे का धरातल कैसा है यह जानना अति-आवश्यक था. इसलिए इस अन्तरिक्ष यान में विशेष तौर पर निर्मित गोली (Bullet) भेजी गयी थी ताकि उसकी धरातलीय संरचना के बारे में बेहतर नमूनों के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त की जा सके. प्रोब ने सफलतापूर्वक विशेष गन से 650 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से टैंटलम धातु से निर्मित गोली से इस क्षुद्र ग्रह को भेदने में सफलता प्राप्त की है. 


यह प्रोब इन नमूनों के लेकर जल्द ही ( दिसम्बर 2020 में) धरती पर वापस आएगा तब जापान और विश्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की बिरादरी इसके बारे में अध्ययन में जुट जायेंगी तब तक विश्व के अपने तरह के इस पहले अभियान की निरंतर सफलता की आशा है. वैसे वैज्ञानिकों को विश्वास है कि इस क्षुद्र ग्रह पर जैविक पदार्थों और पानी की भरपूर मात्रा रही होगी जब 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौर मंडल का निर्माण हुआ था. 

क्षुद्र ग्रह के धरातल में छिद्र करना इस अभियान का पहला बड़ा पड़ाव था. अगले पड़ाव में यह मैस्कॉट (Mascot) आयर मिनेर्वा-II (Minerva-II) लैंडर उतरेगा जो इसकी सतह पर घूमकर अध्ययन करेंगे. 



Tuesday, May 15, 2018

स्पुतनिक-3 - आज से ठीक 60 वर्ष पहले सफल प्रक्षेपण

स्पुतनिक-3 (Sputnik-3)
आज से ठीक 60 वर्ष पहले 15 मई 1958 सोवियत संघ (USSR) ने विश्व के पहले सफल कृत्रिम उपग्रह श्रृंखला स्पुतनिक (Sputnik) के तीसरे उपग्रह (Sputnik-3) का सफल प्रक्षेपण किया था.  इस उपग्रह का मकसद धरती के उपरी वातावरण और नजदीकी अन्तरिक्ष के वातावरण का गहन अध्ययन करना था. स्पुतनिक-3 एक स्वचालित प्रयोगशाला की तरह था जिसमें अन्वेषण के लिए काफी सारे उपकरण भेजे गए थे.

यहाँ एक शानदार बात यह है कि वास्तव में हम जिस स्पुतनिक-3 की बात कर रहे हैं वह मूल स्पुतनिक-3 नहीं था. हुआ यूं कि स्पुतनिक-3 का प्रक्षेपण 20 अप्रैल 1958 के दिन निर्धारित किया गया था, परन्तु कुछ तकनिकी खामियों की वजह से प्रक्षेपण 27 अप्रैल को किया गया. परन्तु प्रक्षेपण के साथ ही दिक्कतों का सिलसिला शुरू हो गया. शुरूआती 1 मिनट तब सब ठीक रहा परन्तु अगले ही क्षण गड़बड़ी शुरू हो गयी . बूस्टर राकेट नष्ट हो गए और लांच व्हीकल गिरना शुरू हो गया. बाद में उपग्रह को क्रेश की जगह से खोज निकाला गया और पुनः प्रयोग के उद्देश्य से प्रयोगशाला लाया गया परन्तु विद्युत् भाग में शोर्ट-सर्किट के कारण यह जलकर अनुपयोगी हो गया.

तब बैक-अप उपग्रह और बूस्टर राकेट से 15 मई की सुबह इसका सफल प्रक्षेपण किया गया. दिक्कतें तब भी आयीं थी परन्तु उपग्रह कक्षा में स्थापित हो गया. 6 अप्रैल 1960 को लगभग 2 वर्ष के पश्चात पृथ्वी के वातावरण में प्रविष्ट होते समय जलकर यह नष्ट हो गया.

Sunday, May 13, 2018

मार्स लैंडर ‘इनसाइट (InSight)’ – मंगल की ओर


इसी माह 5 मई 2018, दिन शनिवार को नासा (NASA) ने अपने बहुप्रतीक्षित नवीनतम मार्स लैंडर –‘इनसाइट (InSight)’ को मंगल ग्रह की ओर प्रक्षेपित किया. अंतरिक्ष यान को एटलस-वी रॉकेट (Atlas-V Rocket) के जरिए कैलिफोर्निया (California) स्थित वंडेनबर्ग वायुसेना अड्डा (Vandenberg Air Force Base) से अंतर्राष्ट्रीय समय शाम चार बजकर 35 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया. 

नासा की समस्त अंतरिक्ष अभियानों और योजनाओं में मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाने का लक्ष्य सर्वप्रमुख है. नासा सहित समस्त मानव जाति का पृथ्वी के बाहर एक और घर (ग्रह) का सपना कब पूरा होगा और होगा भी कि नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा. परन्तु, नासा विश्व के अन्य अन्तरिक्ष संस्थानों और वैज्ञानिकों के साथ इस दिशा में हर संभव प्रयास करने में जुटा हुआ है. 

इस दिशा में नासा के लिए सबसे पहली और बड़ी चुनौती है – मंगल ग्रह पर अन्तरिक्ष यात्री भेजना. मंगल पर किसी भी मानव-अभियान के पहले नासा को अभी इस रहस्यमय लाल-ग्रह के बारे में अनेकों जानकारियाँ ज्ञात करना आवश्यक है और इसी उद्देश्य से – खासतौर से वहाँ आने वाले भूकंप और उसके खतरों की पहचान के लिए इस यान की रचना की गयी है. नासा में इनसाइट अभियान के प्रमुख वैज्ञानिक जिम ग्रीन (Jim Green) के अनुसार अन्तरिक्ष अध्ययनों से यह पता चला है कि मंगल पर अनेकों बार भूकंप और भू-स्खलन की प्रक्रिया हुयी है और उल्का पिंडों के टकराने के भी प्रमाण मौजूद हैं. लेकिन मंगल ग्रह की भूकंप सहने की क्षमता और इससे उस ग्रह पर आने वाले परिवर्तनों को जानना अत्यंत आवश्यक है. इसलिए इस लैंडर में सबसे प्रमुख उपकरण सिस्मोमीटर (Seismometer) है जो भूकंप मापने का उपकरण है. लैंडर के मंगल की सतह पर उतरने के बाद एक ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सिस्मोमीटर को स्थापित करेगा. 

इसमें लगा एक अन्य उपकरण ग्रह की सतह में उष्मा के प्रवाह की निगरानी करेगा. इसके लिए मंगल ग्रह की सतह पर 10 से 16 फुट गहरा सुराख किया जाएगा जो कि पूर्व के अभियानों से काफी ज्यादा गहरा होगा. यह रोबोटिक लैंडर, इसके साथ ही रेडियो तरंगों के माध्यम से मंगल ग्रह की आन्तरिक सतह का पता लगाने का भी प्रयास करेगा.

‘इनसाइट’ का पूरा नाम है – इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टीगेशंस, जियोडेसी एंड हीट ट्रांसपोर्ट  (Interior Exploration using Seismic Investigations, Geodesy and Heat Transport).  और इसे लॉकहीड मार्टिन स्पेस सिस्टम्स (Lockheed Martin Space Systems) ने बनाया है. पहले यह मार्च 2018 में प्रक्षेपित होने वाला था.  सम्पूर्ण परियोजना का व्यय 83 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताया जा रहा है. मंगल ग्रह के मौसम और उसमें होने वाली भू-गर्भीय हलचलों की सटीक जानकारी होने पर ही नासा अपने अन्तरिक्ष यानों और अन्तरिक्ष यात्रियों को इस चुनौतीपूर्ण अभियान के लिए तैयार कर पाने में सक्षम हो पायेगा.  यदि सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो मार्स लैंडर –इनसाइट इस वर्ष 26 नवम्बर 2018 को मंगल ग्रह की धरती पर उतरेगा और भविष्य के द्वार खोलने में सहयोग प्रदान करना शुरू कर देगा...

Thursday, December 28, 2017

सूर्य - सौर मंडल का केंद्र

सूर्य (The Sun)
हमारे सूर्य सौरमंडल के केंद्र में स्थित एक पीला बौना या वामन (Yellow Dwarf) तारा है जिसके शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण में बंधकर सौरमंडल के सभी सदस्य यथा ग्रह, क्षुद्र ग्रह, उपग्रह (अपने ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण में बंधकर), धूमकेतु और अन्य अपने परिक्रमा पथ में इसके चहरों ओर परिक्रमा करते हैं. सूर्य, सौरमंडल के विशालतम पिंड है जो समस्त सौरमंडल के कुल द्रव्यमान का  99.86% है. सूर्य का व्यास लगभग 13 लाख 90 हजार किलोमीटर है. यह हमसे लगभग 15 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसका प्रकाश हम तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट लगता है.

सूर्य का प्रकाश, सम्पूर्ण सौरमंडल की उत्पत्ति का आधार है. यह हाइड्रोजन और हीलियम नामक गैसों का विशाल गैसीय गोला है जो परमाणु संलयन की प्रक्रिया के द्वारा अपने केंद्र में उर्जा उत्पन्न करता है. सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हीलियम के साथ ही लोहा, निकल, ऑक्सीजन, सिलिकॉन, सल्फर और कार्बन जैसे तत्वों से हुआ है. जिसमें से प्रारंभिक दो तत्व लगभग 98% उपस्थित हैं. इसका आकार लगभग गोलाकार है जो ध्रुवीय क्षेत्र में थोडा चिपटा हुआ है, लेकिन चट्टानी ग्रहों की तरह इसकी कोई निश्चित सीमा रेखा निर्धारित नहीं है.

यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि समस्त आकाशीय पिंडों की तरह सूर्य भी हमारी आकाशगंगा (The Milky Way) के केंद्र के चारों ओर परिक्रमा करता है. 251 किलोमीटर प्रति सेकंड की अनुमानित गति से इसे एक परिक्रमा करने में लगभग 25 करोड़ वर्ष लगते हैं. सूर्य को शक्तिशाली दूरबीन से देखने पर इसकी सतह पर कई छोटे-बड़े धब्बे दिखाई देते हैं जिन्हें वैज्ञानिक सौर कलंक के नाम से पुकारते हैं. ये धब्बे अपना स्थान लगातार बदलते रहते हैं जिसके अध्ययन से वैज्ञानिकों ने इसके अक्ष पर परिक्रमा अवधि 27 पृथ्वी दिवस के बराबर की गणना की है.

सूर्य का निर्माण अन्य तारों की तरह ही आणविक बादलों से हुआ माना जाता है जो करीब 4.57 अरब वर्ष पहले बना. वर्त्तमान सूर्य अपने जीवन की मध्य अवस्था में पीले वामन तारे के रूप में है. करीब 5.4 अरब वर्ष eके पश्चात इसके लाल दानव तारा बनने का अनुमान है जिस स्थिति में यह इतना बड़ा हो जाएगा कि यह सौरमंडल के समस्त आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल )  की कक्षा को निगल जाएगा. वैसे डरने की कोई बात नहीं है क्योंकि इसके पहले ही यह हमे पृथ्वी को जलाकर शुक्र जितना गर्म बना चूका होगा और यहाँ पर केवल आग का दरिया बहेगा.

सौरमंडल के स्वामी और हमारे पृथ्वी पर जीवनदाता सूर्य के बारे में अध्ययन करने के लिए अनेक अभियान संचालित किये जाते रहे हैं जिनमें सर्वप्रथम पायनियर श्रृंखला (1959-1968) ने सौर वायु और उसके चुम्बकीय क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया. 1970 के दशक में अमेरिका और जर्मनी के संयुक्त सहयोग से हेलिओस 1 व 2 ने सौर वायु और कोरोना के बारे में नए आंकड़े प्रदान किये. 

नासा के स्कायलैब अन्तरिक्ष स्टेशन में एक सौर वेधशाला का मोड्यूल स्थापित किया गया था. इसके अलावा अनेक अभियान जैसे यूलिसिस, जेनेसिस आदि समय-समय पर इस सितारे के विविध अध्ययन हेतु संचालित होते रहे हैं, परन्तु इनमें सबसे महत्वपूर्ण सौर मिशन रहा है सोहो (सोलर एंड हेलिओस्फेरिक ओब्सर्वेटरी). 2 दिसम्बर 1995 को शुरू हुआ यह नासा और यूरोपीय अन्तरिक्ष संस्था का संयुक्त अभियान था. सोहो पृथ्वी और सूर्य के बीच के लोंग्रेगियन बिंदु, जहाँ दोनों पिंडों का गुरुत्वीय बल बराबर होता है, पर स्थापित किया गया था. इसने अनेक तरंगदैर्ध्यों पर सूर्य की विस्तृत तस्वीरे प्रदान की तथा अनेक धूमकेतुओं की खोज और अध्ययन भी किया. इसकी सफलता से उत्साहित होकर सोलर डायनामिक्स ऑब्जर्वेटरी अभियान फरवरी 2010 में शुरू किया गया. 

वर्तमान में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन याने इसरो ने आदित्य उपग्रह का प्रक्षेपण किया है जो सोलर कोरोना की गतिशीलता का अध्ययन करेगा.

आने वाले समय में सूर्य की आंतरिक संरचना और इसके अनसुलझे रहस्यों से और परदे उठेंगे, तब तक के लिए हमारे सूर्य देव को नमन...

Saturday, August 5, 2017

सूर्य के अन्दर तक जाएगा नासा का सोलर प्रोब



यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से शायद एक होगी। नासा अगले साल अंतरिक्ष यान को सूरज पर ले जाने की तैयारी में है। सूरज की यह यात्रा मानव सभ्यता की पहली यात्रा होगी। नासा ने इसे लेकर घोषणा करते हुए कहा है कि 2018 की गर्मियों में इस अंतरिक्ष यान को लॉन्च करने की तैयारी की जा रही है।


सोलर प्रोब प्लस सूरज की सतह में 40 लाख मील अंदर तक यानी बिल्कुल सौर वातावरण तक जाएगा। ऐसी स्थिति में यान को जितनी ज्यादा गर्मी और विकिरण का सामना करना होगा उतना आज तक किसी भी मानव-निर्मित चीज ने नहीं किया होगा। इस प्रॉजेक्ट का उद्देश्य सूरज के बाहरी हिस्से का अध्ययन करना है।

सोलर प्रोब सूरज की सतह के 62 लाख किलोमीटर के दायरे में चक्कर लगाएगा और लगभग 1377 डिग्री सेल्सियस तापमान का सामना करेगा। नासा के मुताबिक अबतक कोई भी यान जितना नजदीक पहुंचा है उससे 7 गुना अधिक नजदीक यह यान जाएगा। पिछली बार 1976 में हिलियस-2 नाम का अंतरिक्ष यान सूरज के पास पहुंचा था। तब इस यान की सूरज से दूरी 430 लाख किलोमीटर थी।

नासा ने एक बयान में कहा कि स्पेसक्राफ्ट सूरज के बाहरी वातावरण का अध्ययन करेगा। इससे मिली जानकारियों से दशकों पुराने उस सवाल का हल मिलेगा कि तारे कैसे काम करते हैं। इस सोलर प्रोब प्लस को सूरज के ताप से बचान के लिए इसमें स्पेशल कार्बन कंपोजिट हीट शिल्ड लगाई गई है। इस हीट शिल्ड की मोटाई 11.43 सेमी है।

बृहस्पति का 350 वर्षों से जारी तूफ़ान - द ग्रेट रेड स्पॉट (जूनो की नजर से)


अन्तरिक्ष आश्चर्यों से भरा है और मानव अपनी जिज्ञासा के वशीभूत लगातार इन रहस्यों की खोज में लगा हुआ है. हमारे सौरमंडल के सबसे विशालकाय ग्रह बृहस्पति की तस्वीरों को आपने जब भी देखा होगा - उसमें एक बड़े से लाल धब्बे पर अवश्य आपकी नजर गयी होगी. महाग्रह पर इस विशालकाय धब्बे को वैज्ञानिक 'द ग्रेट रेड स्पॉट' के नाम से पुकारते हैं. यह धब्बा हमारी पृथ्वी से कई गुना बड़ा है और यह और कुछ नहीं बृहस्पति ग्रह पर जारी तूफ़ान है. जहाँ धरती पर कोई तूफ़ान अधिकतम कुछ घंटे या दिनों में शांत हो जाता है, महाग्रह में जारी यह तूफ़ान पिछले 350 वर्षों से जारी है और कब तक जारी रहेगा - कहा नहीं जा सकता.
द ग्रेट रेड स्पॉट (जूनो की नजर से)


महाग्रह का यह तूफ़ान या रेड स्पॉट शुरू से ही वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल का विषय रहा है पर दुर्भाग्यवश कोई भी अन्तरिक्ष अभियान इस धब्बे के पास तक नहीं पहुँच पाया था. परन्तु इस वर्ष नासा का जूनो अन्तरिक्ष यान इस तूफ़ान से केवल साढ़े तीन हजार किलोमीटर ऊपर की दूरी तक पहुँचने में न केवल सफल हुआ है बल्कि इसने इस तूफ़ान की दुर्लभ तसवीरें और आंकड़े भी भेजे हैं जिनका अध्ययन जारी है. जल्द ही अन्तरिक्ष वैज्ञानिक बिरादरी को उम्मीद है कि हमारे सौर मंडल के इस कौतुहल के बारे में नवीनतम जानकारी प्राप्त होगी.

गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में ग्रहीय वातावरण विशेषज्ञ एमी साइमन ने नासा की प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "अगर आप सौरमंडल के बाहर के किसी ग्रह से परावर्तित होती रोशनी को देखेंगे, तो आप यह भी नहीं बता सकते कि वह किस वस्तु से बनी है... सो, ज़्यादा से ज़्यादा अलग-अलग मामलों पर नज़र डालने से हम इस लायक हो सकते हैं कि मिली जानकारी को अन्य सौरमंडलों के ग्रहों के बारे में सीखने के लिए इस्तेमाल कर सकें..."

Friday, December 30, 2016

चीन - चाँद के सुदूर क्षेत्र में जाने वाला पहला देश!

विगत वर्षों में चीन ने अपने अन्तरिक्ष अनुसन्धान कार्य में तेजी लायी है और चाँद पर जाने वाले चुनिन्दा देशों की कतार में खड़ा हो चूका है. परन्तु विगत दिनों चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अन्तरिक्ष योजना के अंतर्गत घोषणा की है कि वह चाँद के धरती से नजर ना आने वाले सुदूर या अँधेरे क्षेत्र (धरती से हम चाँद का केवल एक हिस्सा देख पाते हैं, दुसरे भाग की तस्वीर हमें अन्तरिक्ष में भेजे विभिन्न अभियानों से ही प्राप्त हुयी है)  में जाने का इच्छुक है और उसने 2018 के लिए प्रस्तावित इस अभियान की व्यापक तैयारियां भी प्रारंभ कर दी है. 

चाँद पर वैसे तो दर्जनों अभियानों के तहत विभिन्न अन्तरिक्ष यान (मानव रहित और मानवीय ) भेजे जा चुके हैं, परन्तु अगर चीन अपने अभियान में सफल हुआ तो वह ऐसा करने वाले विश्व का प्रथम देश बन जाएगा क्यूंकि अभी तक किसी भी अभियान में चाँद के सुदूर क्षेत्र में अन्तरिक्ष यान नहीं उतारा गया है. 

इस प्रस्तावित लूनर प्रोब का नाम चैंग-इ- 4 (Chang'e-4) रखा गया है. चीन अन्तरिक्ष में यान भेजने और उन्हें पुनः वापस लाने की तकनीक पर काम कर रहा है. इस अभियान के तहत चीन चन्द्रमा की धरातलीय संरचाने का अध्ययन करेगा और उसके धरातल से नमूने एकत्रित करेगा ताकि चन्द्रमा के बनने की प्रक्रिया के बारे में और विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सके. 

Sunday, October 16, 2016

स्पुतनिक २ - पहली बार जीवित प्राणी अन्तरिक्ष में

स्पुतनिक –  1 (Sputnik-1) के सफल प्रक्षेपण के साथ अन्तरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में प्रथम कदम बढाने के बाद उत्साहित सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने केवल 32 दिनों के अन्दर स्पुतनिक अभियान का दूसरा उपग्रह सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर विश्व को पुनः आश्चर्य में डाल दिया. इतने कम समय के भीतर दूसरा अभियान वैसे ही कम आश्चर्य की बात नहीं थी, पर इस अभियान की जो सबसे हैरत में डालने वाली बात थी इस अभियान में जीवित पशु को अन्तरिक्ष भेजना – दुसरे शब्दों में कहें तो मानव को अन्तरिक्ष भेजने की चुनौती का सामना करने की दिशा में पहला कदम . इस उपग्रह में लाइका (Laika) नामक कुतिया को अन्तरिक्ष भेजा गया और वह पहली ऐसी जीवित प्राणी बनी जो अन्तरिक्ष में पहुची, ये अलग बात है कि दुर्भाग्यवश वह अन्तरिक्ष में ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी. 

स्पुतनिक-2 (Sputnik-2), नामक विश्व का दूसरा कृत्रिम उपग्रह 3 नवम्बर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया. सोवियत संघ का यह उपग्रह लगभग 4 मीटर ऊँचा था जिसका उपरी आकर एक कोने की तरह का था. इस बार जीवित प्राणी के साथ इस उपग्रह में बहुत से नए यन्त्र लगाए गए थे ताकि यान के अनेक पहलुओं पर नजर रखी जा सके और उसे कण्ट्रोल किया जा सके.

इस यान में रेडियो ट्रांसमीटर, तापमान नियंत्रण करने के लिए प्रणाली, एक टेलीमेट्री प्रणाली, प्रोगाम इकाई जैसे कई यूनिट थे. लाइका के लिए एक अलग से केबिन बनाया गया था. इस उपग्रह से हरेक चक्कर में कुल 15 मिनट के लिए डाटा धरती में स्थित कण्ट्रोल रूम तक ट्रान्सफर किया जाता था. साथ ही इसमें सूर्य के विकिरण और कॉस्मिक किरणों के अध्ययन के लिए दो फोटोमीटर लगाए गए थे.

मजे की बात यह है कि संसार का पहला उपग्रह प्रक्षेपित कर पूरी दुनिया को स्तंभित कर देने वाले यह दोनों  अभियान (स्पुतनिक-1 और स्पुतनिक-2) सोवियत संघ के मुख्य उपग्रह प्लान का हिस्सा नहीं थे. मुख्य प्लान बाद में स्पुतनिक-3 के रूप में दुनिया के सामने आया. वास्तव में सोवियत संघ के मुख्य प्लान की सफलता में कुछ संदेह था क्यूंकि मुख्य उपग्रह का आकर बहुत बड़ा था. इसलिए इस बड़े पैमाने की योजना के बदले कोरोलेव (स्पुतनिक सीरीज के निर्माता) ने दो छोटे उपग्रह का प्रस्ताव रखा. एक बात और भी है कि स्पुतनिक सीरीज के इन दोनों उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की एक वजह अमेरिका से पहले अन्तरिक्ष क्षेत्र में बाजी मारने की भी थी, जिसमे वे पूर्ण रूप से सफल भी रहे.

इस अभियान की सबसे महत्पूर्ण सफलता किसी जीवित प्राणी को अन्तरिक्ष में सुरक्षित ले जाने की थी जिसमें यह मिशन सफल भी रहा. उस समय सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने लाइका के दस दिनों पर जीवित रहने की आशा की थी. कक्षा में उपग्रह के स्थापित होने के पश्चात् के प्रथम दो चक्कर तक लाइका पूर्णतः सुरक्षित थी परन्तु तीसरे चक्कर के पश्चात केबिन का तापमान बढ़ने लगा और कुछ ही घंटों में उच्च तापमान की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी. यह जानकारी सोवियत युग के बाद पता चली, उस समय यह बताया गया था कि वह लगभग एक सप्ताह तक जीवित थी.

स्पुतनिक-2 की एक प्रमुख खोज और रही थी – उसने धरती के रेडिएशन (विकिरण) बेल्ट का पता लगा लिया था और उससे होकर गुजरा भी. परन्तु वह कोई महत्वपूर्ण जानकारी न दे सकता क्यूंकि वह रुसी ट्रैकिंग स्टेशन से काफी दूर था. अन्यथा अन्तरिक्ष की दुनिया की एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज सोवियत संघ के नाम होती. यहाँ पर अमेरिका के पहले उपग्रह एक्स्प्लोरर–1 (Explorer-1) ने बाजी मार ली और इस बेल्ट का नाम वान-एलन बेल्ट (Van-Allen Radiation Belt) रखा गया.

अपनी यात्रा पूर्ण कर स्पुतनिक-2, 14अप्रैल 1958 को धरती पर वापस लौटा. सोवियत संघ के इन दोनों सफल अभियानों ने जहाँ सोवियत संघ के स्वप्न को मजबूती प्रदान की वहीं अमेरिका की नींद भी उड़ सी गयी. इन दोनों देशों के बीच लगी इस होड़ से अल्प समय में ही अनगिनत अन्तरिक्ष अभियान का एक लम्बा सिलसिला चल पड़ा और अन्तरिक्ष के प्रति दीवानगी बढती ही चली गयी.

Wednesday, April 15, 2015

न्यू होराइजन्स स्पेसक्राफ्ट - प्लूटो की ओर

न्यू होराइजन्स स्पेसक्राफ्ट
नासा (NASA) ने हाल ही में न्यू होराइजन्स स्पेसक्राफ्ट (New Horizons Spacecraft) से प्लूटो की खिंची गयी पहली रंगीन तस्वीर जारी की है. ऊपर के चित्र को देखने पर कुछ ख़ास नहीं नजर आता है परन्तु नासा के अनुसार ये इस साल के सबसे महत्वपूर्ण अन्तरिक्ष अन्वेषणों में से एक की झलक है. चित्र में प्लूटो केवल दो छोटे बिन्दुओं के रूप में नजर आ रहा है.  

न्यू होराइजन्स स्पेसक्राफ्ट इस वर्ष जुलाई में इस क्षुद्र ग्रह (अब प्लूटो मुख्य ग्रहों में शामिल नहीं है) के पास से गुजरेगा. इस चित्र में प्लूटो केवल दो छोटे बिन्दुओं के रूप में नजर आ रहा है और नासा इसे ही लक्षित करेगा. जब यह वाकई में प्लूटो के पास पहुचेगा तो ऐसा पहली बार होगा कि हमें इस क्षुद्र ग्रह की इतने करीब से ली गयी तसवीरें नजर आएँगी क्योंकि अब तक इस क्षुद्र ग्रह के बारे में जो भी जानकारियाँ हैं वो केवल दूरस्थ निरीक्षणों के आधार पर प्राप्त हुए हैं. यह अन्तरिक्ष यान इस ग्रह के बारे में और अधिक जानकारियाँ जुटाने का प्रयास भी करेगा. नासा के वैज्ञानिक इस मुलाक़ात के लिए रोमांचित हैं क्योंकि उन्हें विश्वास है कि यह अन्वेषण आश्चर्यजनक नवीन खोजों से सबको रोमांचित करेगा. प्लूटो के साथ यह इसके अब तक ज्ञात पाँच चंद्रमाओं के बारे में भी अध्ययन करेगा और बहुत संभव है कि हमें इसके और चंद्रमाओं का पता चल सके. इस कार्य हेतु इसमें कुल सात वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए हैं. 

इस सुदूर क्षुद्र ग्रह के पश्चात् न्यू होराइजन्स सौर मंडल में और आगे बढकर नए क्षुद्र ग्रहों और प्लूटो के चारों ओर स्थित चट्टानों का भी अध्ययन जारी रखेगा.

Thursday, March 26, 2015

शुक्र के वायुमंडल में रहस्यमय गर्म परत की खोज (मार्च 2015)

वैज्ञानिकों नें 26 मार्च 2015 को शुक्र के वातावरण में एक रहस्यमय गर्म परत की खोज की है, जिसके उच्च तापमान का कारण अभी तक अज्ञात है. 

शोधकर्ताओं के अनुसार जब वे वीनस एक्सप्रेस प्रोब द्वारा संग्रहित ग्रह के अँधेरे भाग (Night Side) के उपरी वायुमंडल के तापमान मैप का अध्ययन कर रहे थे, तब यह बात उन्हें पता चली. 
Venus Express Probe (वीनस एक्सप्रेस प्रोब)

मास्को इंस्टिट्यूट ऑफ़ फिजिक्स एंड टेक्नोलॉजी और स्पेस रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑफ़ द रसियन अकादमी ऑफ़ साइंसेज के डेनिस बेल्येव के अनुसार – “हम ग्रह की 90 से 140 किलोमीटर ऊँचाई पर तापमान को जांच रहे थे. ग्रह के अँधेरे भाग का तापमान ऊँचाई के साथ घटता जाता है परन्तु हमें 90 से 100 किलोमीटर के वर्ग में तापमान अनुमान से 20 से 40 डिग्री तक ज्यादा मिला. इसका कारण अभी तक हमें अज्ञात है, परन्तु इसी जगह पर ग्रह का ओजोन पर्त है. संभव है इसमें कोई सम्बन्ध 
हो.” 

डेनिस बेल्येव और अन्य वैज्ञानिक वीनस एक्सप्रेस प्रोब द्वारा जून 2006 से फरवरी 2013 के मध्य भेजे गए आंकड़ों का अध्ययन कर रहे थे. यह प्रोब यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) के द्वारा सन 2005 में रूसी राकेट सोयुज़-एफ जी की सहायता से लांच किया गया था. ये आंकड़े इस प्रोब में लगे SPICAV (Spectroscopy for the Investigation of the Characteristics of the Atmosphere of Venus) यन्त्र द्वारा एकत्रित किये गए थे – जिसमे एक इन्फ्रारेड और एक अल्ट्रा वायलेट स्पेक्ट्रोमीटर लगे हुए थे.

Saturday, December 6, 2014

ओरियन स्पेस कैप्सूल का सफल परीक्षण

ओरियन का परीक्षण लांच
ओरियन स्पेस कैप्सूल, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के द्वारा यूरोपियन सर्विस मोड्यूल के साथ मिलकर विकसित किया गया अत्याधुनिक अन्तरिक्ष यान है, जिसका 5 दिसम्बर 2014, दिन  शुक्रवार को सफलतापूर्वक पहली टेस्ट फ्लाइट पूरा किया गया। यह नासा के मंगल अभियान के लिए बहुत महत्वपूर्ण परियोजना है, जिसकी मदद से मनुष्यों का  मंगल ग्रह पर जाना संभव हो सकेगा। ओरियन नामक यह कैप्सूल फ्लोरिडा स्थित केप कानावेरल से डेल्टा 4 रॉकेट के जरिए पृथ्वी से रवाना हुआ। हालांकि शुक्रवार को बिना किसी अंतरिक्ष यात्री के ही ‘ओरियन’ ने उड़ान भरी। इस मिशन को नाम ‘एक्सप्लोरेशन फ्लाइट टेस्ट 1’ (ईएफटी-1) का नाम दिया गया है। इस परीक्षण उड़ान के दौरान नासा के वैज्ञानिक यान के उष्मारोधी कवच, पैराशूट और अन्य प्रणालियों की जांच की गयी है , ताकि भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस की सैर कराने के बाद उन्हें धरती पर सुरक्षित वापस लाया जा सके।




इससे पहले गुरुवार को नासा व उसके सहयोगियों ने लॉन्चिंग के अपने पहले प्रयास को रद्द करने का फैसला किया था। डेल्टा-4 रॉकेट को केप केनेवरल स्थित एयरफोर्स स्टेशन से 5 दिसम्बर 2014 को भारतीय समयानुसार 12 बजकर पांच मिनट पर लॉन्च किया गया। नासा के प्रशासनिक अधिकारी चार्ली बोल्डेन ने कहा, "लगभग 40 सालों के अथक प्रयास के बाद अमेरिका ने एक ऐसा यान भेजा है, जो मनुष्यों को पृथ्वी की करीबी कक्षा से बहुत दूर अंतरिक्ष में ले जाएगा।" अपने सफल परिक्षण में चार घंटे 24 मिनट की उड़ान के बाद 11 फुट ऊंचा यह अंतरिक्ष यान प्रशांत महासागर में गिरा. नासा के अनुसार इसने अभी तक अन्तरिक्ष में मानवों को ले जाने हेतु विगत 40 वर्षों में निर्मित किसी भी मोड्यूल की तुलना में सबसे लम्बी दूरी तय की है, और 2020 तक मंगल पर मानवों को ले जाने की आशा व्यक्त की है.

Tuesday, December 2, 2014

Mariner 10 (मेरिनर १०) - बुध की ओर पहला अन्तरिक्ष यान

मेरिनर 10 -श्रृंखला का अंतिम और बुध के
अध्ययन हेतु पहला अन्तरिक्ष यान
मेरिनर १० नासा द्वारा ३ नवम्बर १९७३ को प्रक्षेपित अमेरिकी रोबोटिक स्पेस प्रोब था जिसे बुध और शुक्र ग्रह के नजदीक से उड़ान भरने के उद्देश्य से भेजा गया था जिसे मेरिनर ९ अभियान के लगभग २ वर्ष के पश्चात् भेजा गया था. यह मेरिनर अभियान की अंतिम कड़ी था क्योंकि मेरिनर ११ और मेरिनर १२ को वायेजर अभियान के अंतर्गत वायेजर १ तथा वायेजर २ के रूप में बदला गया था.

इस अभियान का उद्देश्य बुध और शुक्र के पर्यावरण, वातावरण, घरातल और उसकी संरचना का अध्ययन था. दोनों ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के अध्ययन के अभियान हेतु अनुभव प्राप्त करना भी इस अभियान का द्वितीयक उद्देश्य था.


मेरिनर १० पहला अंतरिक्ष यान था जिसमें ग्रहों के आतंरिक गुरुत्वाकर्षण के द्वारा पथ परिवर्तन की तकनीक का उपयोग किया गया था. शुक्र ग्रह के गुरुत्वाकर्षण का प्रयोग कर इसके पथ को परिवर्तित कर इसे बुध की कक्षा में भेजा गया. साथ ही यह ऐसा पहला अन्तरिक्ष यान भी था जिसके सौर पैनल और ऐन्टेना में सूर्य की विकिरण के दबाव का प्रयोग किया गया था. इसका निर्माण बोइंग ने किया था. यान में कुल १० विभिन्न उपकरण विभिन्न उद्देश्यों के लिए लगाये गए थे.


मेरिनर अभियान - शुक्र और बुध की यात्रा
मेरिनर १० को कैनॉपस नामक मार्गदर्शक सितारे को आधार मानकर अपनी यात्रा पथ तय रखनी थी परन्तु स्टार ट्रैकर में यान की सतह से उखड़े पेंट की एक परत बैठ गयी और इसका फोकस जाता रहा. प्रक्षेपण पथ को बाद में सुधार तो लिया गया परन्तु यह समस्या पूरे अभियान में बनी रही. जनवरी १९७४ में मेरिनर १० ने कोहौटेक धूमकेतु का अल्ट्रा वोइलेट निरिक्षण किया और शुक्र की और बढ़ चला. ५ फरवरी १९७४ को शुक्र ग्रह से जब यह अपने सबसे नजदीकी दूरी पर था इसने अपने अल्ट्रा-वोइलेट फ़िल्टर से  शुक्र ग्रह का अध्ययन किया जिससे पता चला की शुक्र के बादल दृश्य प्रकाश में विशेषता रहित या भद्दे से नजर आते हैं. इसके पहले भी धरती इसका अवलोकन किया जा चूका था परन्तु मेरिनर द्वारा भेजे गए विस्तृत जानकारी ने शोधकर्ताओं को आश्चर्य में डाल दिया.

अपनी यात्रा में मेरिनर कुल तीन बार बुध के नजदीक से गुजरा और उससे सम्बंधित विस्तृत जानकारी भेजी. अपने तीसरे चरण में तो यह बुध से केवल ३२७ किलोमीटर ही दूर रह गया था और बुध के उत्तरी ध्रुव के ठीक ऊपर से होकर निकला था. मरिनेर द्वारा बुध की लगभग ४०-४५% भाग का मानचित्र तैयार किया गया. चूँकि बुध का केवल एक भाग ही सदैव सूर्य की ओर रहता है इसलिए अन्धकार से भरे भाग का अध्ययन संभव ना हो सका. मेरिनर के द्वारा भेजे गए तस्वीरों से पता चला की बुध, हमारे चन्द्रमा जैसी संरचना लिए हुए है. साथ ही मेरिनर ने बताया कि बुध का पर्यावरण बहुत पतला है जो मुख्य रूप से हीलियम का बना हुआ है. दिन और रात के तापमान में विस्तृत अंतर है जो रात में −183 °C (−297 °F) से लेकर दिन में 187 °C (369 °F)तक हो जाता है.

तीसरे चरण के पश्चात् जब यह पुनः सूर्य की परिक्रमा में था
मेरिनर १० के  सम्मान में १९७५ में जारी डाक-टिकट
तब इसके पथ परिवर्तन हेतु आवश्यक उर्जा समाप्त हो गयी और यह सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में बंधकर रह गया. ऐसा माना जाता है कि यह शायद आज भी सूर्य की परिक्रमा कर रहा है.