Sunday, March 29, 2026

काँच की बारिश का आतंक HD189733b ग्रह

HD 189733 b सौरमंडल के बाहर खोजा गया एक बाह्यग्रह है जो कि लोमड़ी तारामंडल (Valpecula Constellation) में स्थित है. यह पृथ्वी से लगभग 64.5 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है और अपने तारे का बहुत ही नजदीक से चक्कर लगा रहा है . फ्रांस के खगोलविदों ने अक्टूबर 5, 2005 को इसकी खोज की थी. यह ग्रह हॉट जुपिटर की श्रेणी में आता है जिसकी संरचना लगभग बृहस्पति या जुपिटर ग्रह से मिलती है लेकिन यह तुलनात्मक रूप से अपने सितारे के बेहद करीब है जिससे यह बहुत तेजी से अपने सितारे की परिक्रमा पूर्ण कर लेता है तथा बेहद गर्म होता है. यह अपने सितारे की परिक्रमा केवल 2.2 पृथ्वी दिवस में 152 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से पूरा करता है.

धरती के सबसे नजदीक स्थित यह हॉट जुपिटर दिखने में बहुत ही सुन्दर है. 
अपने  खूबसूरत कोबाल्ट नीले रंग में यह ग्रह किसी स्वर्ग की तरह नजर आता है लेकिन वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार इस ग्रह का तापमान लगभग 1300 डिग्री सल्सियस है और यहाँ 8700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से तेज हवाए चलती हैं. ऐसे भयानक वातावरण की सबसे डरावनी चीज है कि यहाँ तेज हवा के साथ तरल काँचों की बारिश होती है. इस ग्रह पर सिलिकेट प्रचुर मात्रा में है जो अत्यधिक गर्मी के कारण काँच में परिवर्तित हो जाता है और काँच के ये नुकीले कण तेज तूफ़ान के साथ बारिश की बूंदों की तरह बरसते  नहीं बल्कि एक ओर से तूफ़ानी गति से चलते हैं हैं जो एक ही सेकंड में किसी को छोटे-छोटे महीन टुकड़ों में काट सकता है

वर्तमान तक इस भयानक नरक का कोई दूत मतलब उपग्रह नहीं खोजा गया है परन्तु वैज्ञानिकों को यकीन है कि इस गैसीय दानव ग्रह के पास अपने उपग्रह अवश्य होंगे. साथ ही इस ग्रह के बारे में एक और अनोखी खोज हुयी है कि यह ग्रह तेज गर्मी की वजह से वाष्पीकृत हो रहा है, याने धीरे-धीरे इस ग्रह का आकार कम होता जा रहा है. भविष्य ही इसकी असली स्थिति का बेहतर आभास कराएगा.  


Saturday, February 20, 2021

सतीश धवन उपग्रह (SD SAT) - पहला भारतीय निजी उपग्रह

अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में चेन्नई में स्थित स्पेसकिड्ज इंडिया (SpaceKidz India) नामक कंपनी बहुत जल्द भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र के महान व्यक्तित्व सतीश धवन के नाम पर आधारित एक नैनो (बहुत ही छोटा) उपग्रह सतीश धवन सैट या SD SAT अन्तरिक्ष में भेजने वाली है. इस उपग्रह का वजन मात्र 3.5 किलोग्राम है.


इस अभियान की सबसे ख़ास बात है की इसमें एक विशेष चिप लगायी गयी है जिसमें 25 हजार भारतीय लोगों के नाम संग्रहित हैं. विदेशों में विशेषकर नासा के अभियानों में यह परंपरा सी रही है. इसके अलावा इस उपग्रह के साथ श्रीमदभागवतगीता की एक छोटी प्रति, प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी जी का नाम और चित्र तथा उनके द्वारा कोरोना काल में प्रसिद्द किये गए 'मिशन आत्मनिर्भर' शब्द को शीर्ष पैनल पर स्थापित किया गया है. 




पूर्ण रूप से भारत में निर्मित यह निजी उपग्रह छात्रों में अन्तरिक्ष के प्रति रुचि बढ़ाने के उद्देश्य से भेजा जा रहा है. जिन लोगों के नाम अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे उन्हें बोर्डिंग पास भी दिया जाएगा. इस उपग्रह का प्रक्षेपण भारतीय अन्तरिक्ष संस्थान इसरो अपने विश्वसनीय ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान 'पीएसएलवी सी-51' से करेगा. इसके साथ दो अन्य निजी उपग्रहों भी रवाना होंगे. 

स्पेसकिड्ज इंडिया की संस्थापक और सीईओ डॉ श्रीमति केसन को इस नैनो सैटेलाइट को लेकर काफी उत्‍साह है. यह अंतरिक्ष में तैनात होने वाला कंपनी का पहला उपग्रह होगा. 

Sunday, January 31, 2021

पाँच ग्रहों वाले तारे (HD 108236) की दुर्लभ खोज - सेंटौरस तारासमूह में

असीम और अनंत ब्रम्हाण्ड में खरबों या शायद उससे भी ज्यादा तारे होंगे. अपने आकार, ऊर्जा, परिक्रमा और जीवन की अवस्थाओं में विभिन्नता के साथ ये सभी तारे अपनी आकाशगंगाओं को प्रदीप्त कर रहे हैं. इन तारों में से बहुत से तारे अपनी विशेषताओं में हमारे सूर्य की तरह हैं, जो हमारे खगोलविदों को आकर्षित करते हैं. ग्रहों से परिपूर्ण ये तारक-ग्रह प्रणाली हमें ऐसी जानकारी देने की उम्मीद जगाते हैं जिससे वैज्ञानिकों को ग्रहों के निर्माण के बारे में बेहतर तौर पर पता चल सकता है. 

HD 108236 तारा और उसका परिवार 
ठीक ऐसे ही एक तारा और उसका परिवार वैज्ञानिकों ने हमसे 211 प्रकाशवर्ष दूर खोज निकाला है. HD 108236 नामक यह नक्षत्र सेंटौरस (Centaurus) तारासमूह में स्थित है. इसे अलग-अलग नामों जैसे TOI-1233, TIC 260647166, और HIP 60689 से भी जाना जाता है. हमारे सूर्य से मिलते इस तारे के परिवार में पांच ग्रह हैं जो इसका चक्कर लगा रहे हैं. प्राप्त आकंड़ों की गणना के मुताबिक यह सूर्य से 12 प्रतिशत छोटा है और उसका भार भी 13 प्रतिशत कम है.

2020 में नासा के ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) की मदद से  इस तारे के चार बड़े ग्रहों की खोज हुई थी. इसका सबसे आंतरिक ग्रह HD 108236b एक गर्म सुपर अर्थ की श्रेणी में आता है. इसका व्यास हमारी पृथ्वी का 1.6 गुना है. यह ग्रह अपने तारे का केवल 3.9 दिन में ही एक चक्कर लगा लेता है जिसकी वजह से यह अपनी सौर प्रणाली का सबसे गर्म ग्रह है. इसका तापमान 826 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.

नासा का ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) उपग्रह 


इसके अलावा शेष तीन बड़े ग्रह बाह्य ग्रह हैं जिनके नाम क्रमशः HD 108236c, HD 108236d HD और 108236e  हैं. ये तीनों ही नेप्च्यून के जैसे गैसीय दानव ग्रह हैं. ये ग्रह क्रमशः अपने तारे के 6. 2 दिन, 14.2 दिन और 19.6 दिन में एक चक्कर लगाते हैं. की अगुआई में यह शोध जर्नल एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में प्रकाशित होने  जा रहा है.

बाद में किये गए अध्ययन में इस प्रणाली में एक और ग्रह का पता चला जिसका भर प्रथ्वी के भार का दोगुना है.HD 108236f नाम का यह ग्रह तारे का एक चक्कर 29.5 दिनों में लगा लेता है. इस पांचवे ग्रह की खोज के साथ या ऐसा तीसरा सौर परिवार हो गया है जिसमें पांच या अधिक ग्रह हैं.

ऑस्ट्रियन एकेडमी और साइंसेस के स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ एंड्रिया बोनफेंटी, जो इस शोध दल के प्रमुख हैं उनके अनुसार, “टेस के मापन से पता चला कि अंदर वाला ग्रह त्रिज्या के गैप में आता है. जबकि तीन बड़े बाहरी ग्रह गैसीय आवरणों वाले ग्रहों की तरह हैं इससे इस सिस्टम का अध्ययन वायुमंडलीय विकास के शोध के लिहाज से बहुत उपयोगी हो सकता है.”

Tuesday, January 26, 2021

भारतीय उपग्रह एस्ट्रोसैट (Astrosat) ने खोजा दुर्लभ तारों का समूह

 


गत वर्ष सितम्बर में भारत ने अन्तरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में लम्बी छलांग लगाते हुये अपना पहला बहु-तरंगदैधर्य अंतरिक्ष उपग्रह (Multi-Wavelength Space Satellite) स्थापित किया था. इस उपग्रह का नाम एस्ट्रोसैट (Astrosat) रखा गया है. इस एस्ट्रोसैट की सहायता से हमारे खगोलविदों ने हमारी आकाशगंगा में गोलाकार तारासमूह की खोज की है. इस वृहद् तारापुंज को वैज्ञानिक जगत में ‘ब्रह्माण्ड के डायनासोर’ की उपाधि दी गयी है.

 

अन्तरिक्ष विभाग की जानकारी के अनुसार इस तारा समूह में बड़ी संख्या में ऐसे तारे हैं जो गर्म पराबैंगनी विकिरण के साथ चमकते हैं. ऐसे तारे ब्रम्हाण्ड में बहुत कम ही देखे गए हैं. इस गोलाकार तारापुंज में ऐसे करीब 34 पराबैंगनी चमकीले तारे खोजे गए हैं.  वैज्ञानिकों के दल ने इन तारों के सतह के तापमान, चमक जैसे गुणों का पता लगाया. इन तारों का केंद्र पूरी तरह से खुला हुआ है और इसके कारण ही ये बहुत गर्म बन गए हैं. ये तारे सूर्य जैसे तारों के अंतिम अवस्था में हैं.

ऐसे तारपुंज खगोलविदों के लिए विशेष प्रयोगशाला मानी जाती हैं क्योंकि ऐसे पुंजों में जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के तारे एक साथ अध्ययन हेतु उपलब्ध होते हैं. जहाँ कुछ तारे अभी अपने शैशवकाल में हैं तो कुछ अंतिम अवस्था में.

एस्ट्रोसैट से प्राप्त आंकड़ों और चित्रों को भारत के विज्ञान और तकनीकी विभाग के इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के खगोलविदों ने गहरा अध्ययन किया और गर्म पराबैंगनी चमकीले तारों को तुलनात्मक रूप से ठंडे लाल दानव तारों और अन्य अवस्थाओं के तारों से अलग किया. शोधकर्ता दल के वैज्ञानिक श्री सुब्रमण्यम के अनुसार पराबैंगनी चमकीले तारों में से एक हमारे सूर्य से 3000 गुना ज्यादा चमकीला है तथा उसकी सतह का तापमान एक लाख केल्विन है.

अध्ययन में पाया गया कि प्राप्त गर्म पराबैंगनी विकिरण वाले तारों में ज्यादातर तारों में बाहरी परत नहीं के बराबर होती है और वे जीवन की अंतिम प्रमुख उपगामी दैत्याकार अवस्था या एसिम्प्टोटिक जायंट अवस्था से नहीं गुजरते बल्कि सीधे ही सफेद बौने तारे बन जाते हैं.

Sunday, December 13, 2020

आर्टेमिस I (Artemis I ) - चाँद पर प्रथम महिला अन्तरिक्ष यात्री (2024)

रात्रि-आकाश को अपनी सुन्दरता से सुशोभित करने वाला हमारा चाँद

Artemis Mission Logo
विगत कुछ वर्षों से अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का प्रिय बना हुआ है और लगातार चन्द्र-अभियानों का एक रोचक सिलसिला चल पड़ा है, परन्तु चाँद पर मानव भेजने का अभियान दशकों से रुका हुआ है. परन्तु जल्द ही अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा वर्ष 2024 के लिए प्रस्तावित ओरियन क्रू यान में दो मानवों को चाँद पर उतारने की तैयारी में लगा हुआ है. इस अभियान का नाम आर्टेमिस (Artemis) – I रखा गया है. 

इस अभियान का नामकरण भी दिलचस्प है. नासा का अपोलो अभियान चन्द्रमा के अन्वेषण को समर्पित था और चाँद की धरती पर पहला कदम भी रखने वाले नील आर्मस्ट्रोंग और उनके साथी एडविन ‘बज़’ एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस भी अपोलो-11 में गए थे. इसलिए दशकों बाद शुरू इस अभियान का नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं में वर्णित अपोलो की जुड़वाँ बहन आर्टेमिस (Artemis) के नाम पर ही रखा गया है.  

आर्टेमिस अन्तरिक्ष यान - चन्द्रमा के पास अपनी कक्षा में 
प्रथम आर्टेमिस अभियान के लिए नासा ने 18 अंतरिक्ष यात्रियों की सूची तैयार की है जिसमें नौ पुरुष और नौ महिलाएं हैं. भारत में इसकी विशेष चर्चा इसलिए भी है क्योंकि इन पुरुषों में से एक भारतीय मूल के राजा जॉन वुर्पूतूर चारी या राजा चारी भी शामिल हैं. राजा चारी भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं जो वायुसेना में कर्नल हैं. 43 वर्ष के राजाचारी अमेरिका के एयर फोर्स एकेडमी, MIT  और यूएस नेवल टेस्ट पायलट स्कूल से ग्रेजुएट हैं. वैसे इस सूची में से केवल एक पुरुष और एक महिला को ही चुना जाएगा. आर्टिमिस मिशन के बाद इस दशक के अंत में मानव की अंतरिक्ष में लंबे समय तक उपस्थिति के लिए अभियान चलाए जाएंगे. नासा की योजना तो मंगल पर इंसान भेजने की भी जो अन्तरिक्ष अन्वेषण को बदल कर रख देगी. 

आर्टेमिस अभियान के लिए चयनित 24 अन्तरिक्ष यात्री (इनमें से  केवल 1 पुरुष और 1 महिला ही जायेंगे)
आर्टेमिस अभियान की एक खास बात यह भी है कि पहली बार कोई महिला चाँद की धरती पर कदम रखेगी. महिलाओं ने अपनी शक्ति अन्तरिक्ष के क्षेत्र में शिद्दत से दर्ज कराई हैं परन्तु यह सफलता इतिहास में स्वर्णिम अध्याय होगा. 


Friday, December 11, 2020

बृहस्पति और शनि का अनोखा मिलन - 400 वर्ष बाद

अन्तरिक्ष में घटित अनोखी घटनाओं की श्रृंखला में इस वर्ष 21 दिसम्बर की रात्रि को बृहस्पति और शनि के आभासी मिलन की घटना इन दिनों चर्चा में है. यहाँ हमें यह जानना आवश्यक है की सौरमंडल के ये दोनों विशालकाय गैसीय दानव ग्रह एक-दूसरे से औसतन करीब 40 करोड़ मील या 65 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर हैं और 21 दिसम्बर को 397 वर्ष बाद होने वाली (खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इससे पहले 1623 ईस्वी में यह अद्भुत नजारा दिखा था) इस दुर्लभ घटना में भी ये दूरी लगभग बनी रहेगी. फिर इस चर्चा का क्या अर्थ है कि दोनों दानवी ग्रह पास आयेंगे. 



इस घटना का अर्थ है की आकाश में ये दोनों गृह एक दुसरे से केवल 0.1 अंश के अंतर में दिखेंगे. इनके बीच की वास्तविक दूरी में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होगा परन्तु ये अपनी कक्षाओं में इस स्थिति में होंगे की पृथ्वी से ये लगभग एक सीध में दिखाई देंगे. यह भी अनुमान हैं कि संभवतः ये इतने चमकीले हों कि ये दो अलग ग्रह एक तारे के सदृश्य दिखाई देवें. इसलिए विश्व में अनेक लोग इसे क्रिसमस का विंटर स्टार (शीत ऋतू का सितारा) भी कहकर पुकार रहे हैं. 


इस तरह की खगोलीय घटना को अन्तरिक्ष विज्ञानी 'ग्रहों के संयोजन' के नाम से पुकारते हैं लेकिन शनि और बृहस्पति के इस तरह के करीबी मिलन को वे 'महासंयोजन या ग्रेट कंजंक्शन' कहते हैं. ऐसा इसलिए है कि अन्य पड़ोसी ग्रहों की तुलना में बृहस्पति और शनि का यह मिलन दुर्लभा है और लगभग 400 वर्ष के बाद घटित हो रहा है. वैसे अगला महासंयोजन 60 साल बाद 15 मार्च 2080 को पुनः होगा. यहाँ यह भी जानना आवश्यक है कि प्रत्येक 20 वर्ष में शनि और बृहस्पति एक-दूसरे की कक्षा में पृथ्वी के सापेक्ष बहुत पास आ जाते हैं परन्तु तब भी रात्रि - आकाश में इनकी दूरी बनी रहती है. 

Sunday, October 18, 2020

बेनू (Bennu) – हमारे सौरमंडल के क्षुद्रग्रह में मिले जीवन के संकेत

आधुनिक युग में अन्तरिक्ष के कौतुहल से साक्षात्कार के लिए विश्व की अन्तरिक्ष संस्थाएं लगातार प्रयासरत हैं. इसी क्रम में अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा के ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-Rex) से अद्भुत जानकारी मिली है. यह अन्तरिक्ष यान विगत दो वर्षों से बेनू (Bennu 101955) नामक क्षुद्रग्रह का अध्ययन कर रहा है. पृथ्वी और मंगल के मध्य स्थित क्षुद्रग्रहों की पट्टी के इस क्षुद्रग्रह पर पृथ्वी के प्रारंभिक जीवन के संकेत मिले हैं. ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-Rex) को बेनू के पत्थरों में कार्बनिक पदार्थों की उपस्थिति का पता चला है, जिससे पृथ्वी के निर्माण के समय और उसमें जीवन की शुरुआत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं. 

इस क्षुद्रग्रह की सतह पर मौजूद चट्टानों की विविध संरचना, उसके गुरूत्व और असामान्य तरह के हीरे के आकार से इसके दो क्षुद्रग्रहों के मेल से बनने का सुनिश्चित विचार अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को रहा है. दरअसल बेनू में दो प्रकार के चट्टानों का पता चला है परन्तु वे इतने मजबूत नहीं है की पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने पर बच सकें, इसलिए इस प्रकार के कार्बनिक संरचना युक्त चट्टानों को योजना अनुसार 2023 में सुरक्षित धरती पर लाकर अध्ययन करने से कई खोयी कड़ियाँ जुड़ सकती हैं जिसमें पृथ्वी के साथ हमारे ग्रह से टकराने वाले और पास से गुजरने वाले कई अन्य क्षुद्रग्रहों की जानकारियाँ भी मिल सकेंगी. 


सौरमंडल के निर्माण के समय ग्रह या उपग्रह में परिवर्तित न हो सके इन आकाशीय पिंडों में हमारे ग्रह के निर्माण के शुरुआती संकेत छिपे हुए हैं. शोधकर्ता एमी सिमोन का विचार है कि बेनू क्षुद्रग्रहों की पट्टी से पृथ्वी की ओर आया है. इससे इस बात को बल मिलता है की  पृथ्वी की निर्माण की प्रारंभिक अवस्था में अनेक पदार्थ हमारे ग्रह पर दूर से आए होंगे. कार्बोनेट, कार्बनिक और जलमिश्रित पदार्थों का बेनु पर समग्र उपस्थिति इस विचार की पुष्टि करता है कि क्षुद्रग्रह और धूमकेतु ही हमारे गृह पर जल तथा जीवन को पहुँचाने वाले वाहक हैं. 

वर्ष 2023 में इस बारे में स्थिति और स्पष्ट होगी. ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-Rex) का अभियान जारी है और संभवतः जल्द ही बेनू के सम्पूर्ण मानचित्र तैयार हो सकता है. 

बेनु से मिले संकेत काफी मिलेजुले से हैं जो उसकी संरचना विविधता और अन्य कारकों का कारण हो सकते हैं. ऐसे में शोधकर्ता बेनु के नमूनों का इंतजार कर रहे हैं जिससे उनके अध्ययन को पुष्टि और विस्तृत जानकारी मिल सकेगी.


Sunday, September 20, 2020

वेलेन्तिना तेरेश्कोवा - प्रथम महिला अन्तरिक्ष यात्री


सर्वप्रथम, इस ब्लॉग / फेसबुक पेज पर मेरी लम्बी निष्क्रियता के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. 


आज हम बात करेंगे उस महान नारी के बारे में, जिन्हें अन्तरिक्ष में सबसे पहले जाने का श्रेय जाता हैं - वेलेन्तिना तेरेश्कोवा. वैसे तो अन्तरिक्ष में सर्वप्रथम मानव होने का सौभाग्य यूरी गागरिन को मिला जिन्होंने अन्तरिक्ष यान ‘वोस्तोक’ में धरती की परिक्रमा पूरी की थी पर 16 जून 1963 को जब वोस्तोक-6 में बैठकर वेलेन्तिना तेरेश्कोवा ने धरती की एक नहीं बल्कि 48 परिक्रमायें पूरी की तो यह दिन इतिहास में विलक्षण दिवस के रूप में अंकित हो गया. 

वेलेन्तिना का लेकिन यह ऐतिहासिक सफ़र आसान नहीं था. 06 मार्च 1937 में जन्मी वेलेन्तिना  जब तीन वर्ष की भी नहीं थी, उनके पिता की मृत्यु हो गयी और छोटी सी उम्र में माँ के साथ राई के खेतों में किये कठोर परिश्रम ने उनमें कठिनाइयों का सामना करने का जज़्बा भर दिया. द्वितीय विश्व युद्ध ने उन्हें अन्दर से और मजबूत बना दिया. क्रेस्नी पेरेकोप मिल में काम करने के दौरान उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और अपने प्रेरणास्त्रोत यूरी गागरिन की तरह वे भी अन्तरिक्ष में जाने के सपने बुनने लगीं. 

तेरेश्कोवा एक पैराशूट क्लब की सदस्य थीं और यही से उनके सपने पूरे होने का सफ़र शुरू हुआ. अन्तरिक्ष प्रशिक्षण के लिए ‘पब्लिक सर्विस सोसाइटी’ नामक संस्था के सदस्यों ने इस क्लब के बेहतर सदस्यों का चयन किया और कठिन प्रशिक्षण के बाद वेलेन्तिना तेरेश्कोवा का चुनाव हो गया. 


वेलेन्तिना के अनुसार भले ही महिलाएं पुरुष से कम नहीं हैं परन्तु वे नारीत्व की प्रशंसक थी और एक नारी के स्वाभाविक जीवन के गरिमामयी पलों से विमुख नहीं रहना चाहती थीं इसलिए अपनी ऐतिहासिक यात्रा के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने अन्तरिक्ष यात्री एन्द्रीयन निकोलायेव से विवाह कर लिया. 

वेलेन्तिना तेरेश्कोवा का जीवन नारी के व्यक्तित्व की गाथा है. 83 वर्ष की उम्र में भी वे सक्रिय हैं. पहले सोवियत संघ कम्युनिस्ट पार्टी और सोवियत संघ के विघटन के बाद यूनाइटेड रसिया (United Russia) पार्टी की सदस्य के रूप में वे लगातार राजनैतिक और सामजिक कार्यों में व्यस्त हैं.   


Tuesday, March 31, 2020

छिद्रयुक्त एस्टेरोइड - रयुगु (Ryugu)




पहले हायाबुसा अभियान की कामयाबी के बाद इसका अगला संस्करण हायाबुसा 2 क्षुद्रग्रह (एस्टेरोइड) रयुगु (Ryugu) के अभियान पर है. इसी वर्ष दिसम्बर में इसकी वापसी प्रस्तावित है. अपने इस अभियान में इसने बारीकी से इस एस्टेरोइड का अध्ययन किया है.  हायाबुसा-2 के द्वारा ली गयी तस्वीरों में साफ़ नजर आता है कि यह क्षुद्रग्रह अत्यधिक छिद्रयुक्त, हल्का और नर्म सा है. शायद ऐसे छिद्रों से भी युक्त जो एक छोर से दूसरे छोर तक जाते हों.      

जापान की अंतरिक्ष अन्वेषण संस्था के वैज्ञानिक ओकादा इसकी तुलना फ्रीज़ में रखी सूख चुकी कॉफ़ी से करते हैं. उनके अनुसार संभवतः हमारे ग्रह भी कुछ ऐसे ही रहे होंगे अपने निर्माण के पहले. यहाँ यह बताना आवश्यक है कि रयुगु एक बेहद प्राचीन क्षुद्रग्रह है जो कि सौर मंडल के निर्माण के पहले से उपस्थित है. इस छुद्रग्रह में कार्बन की प्रचुर उपलब्धता है. हायाबुसा-2 ने एस्टेरोइड से पृथ्वी पर लाने के लिए दो नमूने भी लिए हैं जो सौरमंडल के निर्माण की प्रारंभिक अवस्था और परिस्तिथियों को समझने में हमारी मदद करेंगे. यान ने इसके साथ ही इस बात का भी पता लगाया है कि यह क्षुद्रग्रह किस तरह से गर्मी को सतह पर रोके रखता है. इसकी संरचना कैसी है. 

जैसा हम जानते हैं कि घने चट्टानों वाली संरचनाएं धीरे से गर्मी सोखती है और ज्यादा देर तक गर्म रहती हैं वहीँ छिद्रयुक्त संरचनाएं किसी रेगिस्तान की तरह होती हैं जो जल्दी-जल्दी अपना तापमान खोती जाती हैं. कुछ वैसे ही जैसे रेगिस्तानी क्षेत्र दिन में बेहद गर्म तो रात को काफी ठन्डे हो जाते हैं. रयुगु के साथ भी यही बाद वाली स्थिति आती है. 

इस छिद्रयुक्त की आधी संरचना यानी 50% भाग में छिद्र है. एक अनुमान के अनुसार 70 करोड़ वर्ष पहले किसी बड़े पिंड के टूटने के बाद इसका निर्माण हुआ है और यह भुरभुरा सा है. शायद जिस पिंड से यह बना है वो भी ऐसा ही था हो. वैज्ञानिक इसे ग्रहों के निर्माण से भी जोड़ते हैं और कहते हैं कि सौर मंडल के शुरुआत में ऐसी ही ढीली संरचनाएं बनी होंगी और पुनः तुरंत टूट गयी होंगी. इसका यही मतलब है कि ग्रहों के निर्माण के समय की प्रारंभिक अवस्था बड़ी जोड़-तोड़ वाली रही होगी जहाँ नित नए पिंड बनते रहते थे और टूट कर पुन: निर्माण की प्रक्रिया में जुड़ जाते थे जब तक कि एक परिपक्व और स्थायी संरचना न जाए जिसे हम ग्रह के नाम से जानते हैं.

WASP 76b – एक दुनिया जहाँ लोहे की बारिश होती है


बारिश तो हम सभी ने देखी है और अगर आप मेरे जैसे हैं तो बारिश का मौसम और उमड़ते-घुमड़ते बादलों का दृश्य मेरे लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है और उसपर अगर इन्द्रधनुष दिख जाए तो क्या कहने...

लेकिन सुदूर अन्तरिक्ष में हमसे करीब 400 प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक ग्रह की बारिश बड़ी अनोखी है – कैसे? वैज्ञानिकों की मानें तो वहां लोहे की बारिश होती है. यह ग्रह जिसका नाम WASP 76b रखा गया है, यह हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित ऐसा बाह्यग्रह (ExoPlanet) है जो के बेहद तप्त गैसीय दानव है. ये ग्रह अपने तारे से इतना अधिक रेडिएशन ग्रहण करता है कि इसका दिन का तापमान तारों को टक्कर देने लगता है.

वैसे अभी तक तो इतने दूर स्थित ग्रहों के अध्ययन में बहुत ज्यादा जानकारी प्राप्त करने की तकनीक आने में समय है परन्तु 2018 में जब यह ग्रह अपने तारे के सामने से गुजरा और प्रकाशित था तब इसके वातावरण से फ़िल्टर हुए इसके तारे के प्रकाश का अध्ययन करने से इसके विभिन्न क्षेत्रों की रासायनिक संरचना का पता चला था.

खगोल वैज्ञानिकों के एक और बात का पता लगाया कि दिन के समय इस ग्रह के वातावरण में लोहे की प्रचुर मात्र दिखती है वहीँ रात से दिन के समय में (जब इसका तापमान दिन के तापमान से लगभग 1000 डिग्री सेल्सियस कम रहता है) वातावरण में लोहे की उपस्थिति नहीं दिखाई दी. अध्ययन के अनुसार संभवतः रात के तापमान में गैस के रूप में उपलब्ध लोहा ठंडा होता है और तेज बारिश के रूप में गिर जाता है. चूँकि इस ग्रह पर कोई ठोस धरातल तो है नहीं इसलिए लोहे की इन गैसों का पता चल नहीं पाता है क्योंकि ये संघनित लौह कणों की बूंदे काफी अन्दर तक चली जाती हैं और पुनः गहराई में जाकर वाष्पित हो जाती हैं और दिन में वाष्पीकरण और रात में बारिश के रूप में नीचे आ जाती है और लोहे की बारिश का सिलसिला हर रात होता है.

तो कैसे लगा लोहे की बारिश की दुनिया....भयंकर...है न !!!

Monday, December 9, 2019

दिलचस्प अंतर-तारकीय पुच्छल तारा - बोरिसोव


एक बेहद दिलचस्प अंतर-तारकीय (हमारे सौर मंडल के बाहर का) धूमकेतु या पुच्छल तारा वर्तमान में हमारे सौरमंडल में सूर्य के बेहद नजदीक है (इस रविवार को यह लगभग 30 करोड़ किलोमीटर दूर था) और 28 दिसम्बर 2019 को यह पृथ्वी के बेहद नजदीक से गुजरेगा.

इस पुच्छल तारे का नाम है कॉमेट 2I बोरिसोव (Comet 2I/Borisov) या C/2019 Q4 बोरिसोव  . यह शौकिया अन्तरिक्ष खोजी गेनादी बोरिसोव के द्वारा 30 अगस्त 2019 को खोजा गया था. इसका परिक्रमा पथ बेहद लम्बा है जिससे यह बात तय है कि यह सौरमंडल के बाहर से आ रहा है जहाँ सूर्य का प्रभुत्व नहीं चलता.  


प्रेक्षण से प्राप्त जानकारी के अनुसार बोरिसोव का एक छोटा परन्तु चमकदार सिर या मुख्य भाग है तथा अभी इसकी पूँछ धुंधली सी है तथा धरातल लाल रंग लिया हुआ है. जैसे ही यह सूर्य से होकर गुजरेगा – बर्फ और धूल का वाष्पीकृत गुबार से बढ़ा इसका तापमान इसकी चमक को और वृद्धि प्रदान करेगा और यह बेहतर ढंग से नजर आएगा. अभी यह 33 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से गतिमान है.



एक सम्भावना यह भी है कि यह सूर्य के गुरुत्व तथा विकिरण से शायद टुकड़े-टुकड़े हो जाए क्योंकि इसका आकार काफी छोटा है लगभग 2-16 किलोमीटर एक छोर से दुसरे छोर तक और इसकी पूँछ लगभग 1,50,000  किलोमीटर लम्बा.

अब भविष्य ही बतायेगा कि सौर मंडल के बहार से आया यह पिंड हमारी समझ को विकसित करेगा या नष्ट होकर इतिहास हो जाएगा.

Sunday, December 8, 2019

अपने ग्रह को वाष्पीकृत करता श्वेत वामन तारा

श्वेत वामन तारा और वाष्पीकृत होगा ग्रह 
क्या कभी आपने सुना है कि कोई ग्रह अपने सितारे से भी बड़ा हो. नहीं ना. पर कुछ ऐसा ही हमारे खगोलशास्त्रियों ने खोज निकाला है – वैसे सच बात यह भी है कि यह सितारा श्वेत वामन तारा (White Dwarf Star) है जो मृतप्राय हो चुका है. इस सितारे की परिक्रमा करने वाला ग्रह नेपच्यून के बराबर है और अपने सितारे से चार गुना बड़ा. और मरता हुआ यह सितारा अपने साथ इस ग्रह को भी नष्ट कर रहा है. भले ही इस सितारे में संलयन की प्रक्रिया बंद हो चुकी है लेकिन अभी भी इस सितारे का तापमान २८००० सेल्सियस के करीब है और यह इतनी उर्जा लगातार उत्सर्जित कर रहा है कि यह ग्रह से ३००० टन  के करीब सामग्री हर सेकंड वाष्पित कर रहा है जिससे यह ग्रह किसी पुच्छल तारे की तरह प्रतीत होता होगा जिसकी एक लम्बी पूँछ हो.



स्लोन डिजिटल स्काई सर्वे (Sloan Digital Sky Survey –SDSS) से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वारविक के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस सितारे और ग्रह का अध्ययन किया है. जहाँ एक ओर श्वेत वामन तारे मुख्यत ऑक्सीजन और कार्बन के बने होते हैं और उनमें हाइड्रोजन ख़त्म हो चुका होता है यह तारा अभी भी हाइड्रोजन की चिंगारी उगल रहा है. नजदीकी अध्ययन से पता चला कि इस तारे के चारों ओर वलयाकार संरचना या रिंग मौजूद है.  


वारविक विश्वविद्यालय के डॉ. बोरिस जीनसेक करते हैं कि आज तक ऐसी प्रणाली नहीं देखी गयी और यह एक अद्भुत सितारा है. इस सितारे का एक ग्रह भी है जिसे हम देख नहीं सकते क्योंकि अभी भी इसकी रौशनी काफी तेज है परन्तु यह निःसंदेह है कि सितारे की गर्मी ग्रह को वाष्पीकृत कर रही है और यह ग्रह तेजी से अपना वातावरण खो रहा है. इस खोज से इस बात को भी बल मिला है कि श्वेत वामन तारा मंडल में भी कोई ग्रह जीवित रह सकता है.

वैसे सभी श्वेत वामन तारे  (White Dwarf Stars) इतने गर्म नहीं होते. वैसे अनुमान के मुताबिक हमारी आकाशगंगा में ही करीब 10 अरब ऐसे तारे होंगे. इस प्रणाली को WDJ0914+1914 का नाम दिया गया है.

Saturday, November 30, 2019

धरती से सबसे दूर आकाशीय पिंड - अरोकोथ (Arrokoth)



अल्टिमा थुले या आराकोथ 
अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्थान का न्यू होराइजन्स (New Horizons) अपने नाम को चरितार्थ करता हुआ नए क्षितिज का निर्माण कर रहा है. 2006 में प्लूटो के अध्ययन के लिए छोड़े गये अन्तरिक्ष यान ने इस वर्ष के प्रारंभ में हमसे सबसे दूर स्थित आकाशीय पिंड की खोज की थी. उस समय इसे अल्टिमा थुले (Ultima Thule) का नाम दिया गया था. यह बर्फीला पिंड अल्टिमा थुले प्लूटो से भी करीब एक बिलियन मील (1.6 बिलियन किलोमीटर) मील दूर है. 16 किमी लम्बे और 32 किमी चौड़ाई वाले इस पिंड के बारे में नासा के प्रबंधक जिम ब्रिडेंस्टाइन का मानना है कि अल्टिमा थुले में उन अंशों को पाया गया है, जिससे सौर मंडल का निर्माण हुआ है.

हाल में हमसे लगभग 6 बिलियन मील दूर खोजे गए पिंड को अरोकोथ (Arrokoth) का आधिकारिक नाम दिया गया है. देसी अमेरिकी भाषा में इसका मतलब आकाश होता है. इस सम्बन्ध में साउथवेस्ट रिचर्स इंस्टीट्यूट के मुख्य वैज्ञानिक एलन स्टर्न के अनुसार, 'अरोकोथ नाम आसमान (यानी ऊंचाई) की ओर देखने को प्रेरित करता है. साथ ही ये शब्द तारों की दुनिया के बारे में और जानने की उत्सुकता को दर्शाने वाला भी है. यह सौर मंडल के सबसे बाहरी क्षेत्र के कुइपर बेल्ट में स्थित है.'

Wednesday, October 9, 2019

भौतिक का नोबेल पुरस्कार 2019 - अन्तरिक्ष विज्ञान के नाम


इस वर्ष 2019 में भौतिक का नोबेल पुरस्कार अन्तरिक्ष विज्ञान को समर्पित रहा. कनाडा मूल के अमेरिकी ब्रह्मांड वैज्ञानिक जेम्स पीबल्स को यह पुरस्कार उनकी सैद्धांतिक खोजों के लिए दिया गया है. उन्होंने बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड के विकास के संबंध में विभिन्न सैद्धांतिक खोजें की हैं. वहीँ दो स्विस खगोलशास्त्रियों माइकल मेयर तथा डीडियर क्वेलोज को संयुक्त रूप से उनके पहले अनुसंधान के लिए यह पुरस्कार दिया गया है. इन दोनों वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से सौर मंडल के बाहर एक ग्रह का पता लगाया था जो मिल्की वे में एक तारे की परिक्रमा कर रहा था. वैज्ञानिकों ने यह खोज 1995 में की थी. जूरी ने बताया कि इन वैज्ञानिकों को उनके उन अनुसंधानों के लिए यह पुरस्कार दिया गया है जो ब्रह्मांड में हमारे स्थान की बढ़ती समझ से जुड़ा हुआ है.


Tuesday, October 8, 2019

शनि ग्रह के 20 नए चंद्रमाओं की खोज





शनि – अद्भुत वलयों से सुशोभित सौर मंडल का सबसे सुन्दर ग्रह (मेरे लिए तो हमारी वसुधा) अब और भी शानदार हो चला है. वैज्ञानिकों ने इसके 20 नए साथियों यानि चंद्रमाओं की खोज की घोषणा की है. इस खोज के साथ ही शनि के ज्ञात चंद्रमाओं की संख्या 82 हो गयी है और अब वह महाग्रह बृहस्पति से आगे निकल गया है जिसके वर्तमान तक 79 ज्ञात उपग्रह हैं. इसके पहले पिछले ही वर्ष 12 नए चंद्रमाओं के साथ बृहस्पति का कद और ऊँचा हो गया था.


ग्रह से काफी दूर स्थित इन बाह्य चंद्रमाओं के साथ अब इसके आस-पास का घेरा चंद्रमाओं से समृद्ध लगने लगा है तो वहीँ कई और नए चंद्रमाओं की उपस्थिति की संभावना भी बढ़ गयी हैं. इन नए चंद्रमाओं की खोज के साथ सौर मंडल के निर्माण की प्रारंभिक अवस्था में ग्रहों और अन्य पिंडों के मध्य होने वाले टक्करों को समझने और चंद्रमाओं के निर्माण की प्रणालियों को समझने में बेहतर मदद मिलेगी, विशेषकर गैसीय दानव ग्रहों की स्थिति में, क्योंकि इन्हीं ग्रहों के पास उपग्रहों का समृद्ध भण्डार है अन्यथा आतंरिक चार ग्रहों के पास कुल 3 ही चाँद हैं जिनमें से 2 (बुध और शुक्र) उपग्रह  विहीन हैं.

ये नए चाँद केवल 3 मील चौड़े हैं और बेहद धुंधले नजर आते हैं. फिर भी सौभाग्यवश वे हवाई के मौना केया ज्वालामुखी पर लगे खोजी सुबारू टेलिस्कोप की नजरों में आ गए. मुश्किल से दिखने वाले इन चंद्रमाओं की खोज में लगभग 15 वर्ष लग गए. वैज्ञानिक स्कॉट एस. शेप्पर्ड और उनके साथी इसकी खोज में 2004 से प्रयासरत रहे थे. अत्याधुनिक कंप्यूटर और यंत्रों से इतने वर्ष तक एकत्रित चित्रों और डाटा के अध्ययन से इन नए पड़ोसियों का पता चला.

इन खोजे गए 20 उपग्रहों में से 17 उपग्रह शनि के घूर्णन के विपरीत दिशा में परिक्रमा करते हैं और शेष 3 ग्रह की दिशा में. शेप्पर्ड और उनके साथियों का विश्वास है कि ये चन्द्रमा सौरमंडल में शनि के नजदीक पहुंचे किसी वृहद् पिंड के टुकड़े है जिसे शनि ने अपने गुरुत्व में कैद कर लिया था. कालांतर में अनेकों टक्करों से यह पिंड छोटे छोटे पिंडों के रूप में विखंडित हो गया और यहीं इन बाह्य चंद्रमाओं के निर्माण का कारण रहा होगा. वैसे भी वैज्ञानिकों के अनुसार सौर मंडल की प्रारंभिक अवस्था में ऐसे टक्कर आम बात रही होगी.

  ख़ास बात   शेप्पर्ड और उनके साथियों ने इन 20 चंद्रमाओं के नामकरण के लिए जनता से सुझाव मांगे हैं. आप भी इस प्रतियोगिता में भाग लेकर नाम सुझा सकते हैं और शायद आपका दिया नाम इतिहास में दर्ज हो जाए. अंतिम तिथि है – 6 दिसम्बर 2019.

 नाम देने के लिए   @SaturnLunacy पर TWIT कीजिये Twitter से, और साथ ही यह बताएं कि आपने यह नाम क्यों चुना 
जल्दी कीजिये फिर...



Saturday, August 31, 2019

16 साइके (16 Psyche) – क्षुद्रग्रह या सोने से बना खरबों का धातु-भण्डार

अमरीकी अन्तरिक्ष संस्थान नासा – सुनहरे क्षुद्रग्रह के पीछे है जो धरती पर हर किसी को खरबपति बना सकता है (सैद्धांतिक रूप में) क्योंकि इसमें सोने और लोहे का अकूत भण्डार है जिसमें से केवल लोहे का भण्डार आज की कीमत में 8000000000000000000 डॉलर का है (कितनी है यह राशि आप ही गिनिये), सोने की कीमत की तो गणना ही नहीं.
16 साइके का काल्पनिक चित्रण 
है न अद्भुत सी बात, पर अनजाने अन्तरिक्ष में हर दिन आश्चर्यचकित करने वाली घटनाओं का एक पूरा अबूझ संसार है. ऐसी ही एक दुनिया है हमारे अपने सौरमंडल में – क्षुद्रग्रहों का एक पूरा लेकिन अव्यवस्थित संसार. इसी संसार में 16 साइके (16 Psyche) नामक एक विशाल क्षुद्रग्रह है जिसमें कीमती धातुओं का अतुल्य भण्डार है. लगभग 140 मील यह क्षुद्रग्रह या एस्टेरोइड, मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के मध्य रहकर अपनी कक्षा में सूर्य का चक्कर लगाता रहता है. इस क्षुद्रग्रह पर नासा 2022 में अभियान भेजना चाहता है. परन्तु इसकी वजह केवल ये कीमती धातु नहीं हैं, हालांकि खनन या माइनिंग उद्योग  के लोगों की लालची नजरें वसुधा को नष्ट करने के बाद अब सौरमंडल के इस संसार पर टिक गयी है.
प्रस्तावित अन्तरिक्ष यान का चित्रण 
नासा इस क्षुद्रग्रह के बारे में यह मानता है कि यह किसी ग्रह का कोर हो सकता है जो स्वतंत्र रूप से अन्तरिक्ष में परिक्रमारत है. पृथ्वी के कोर या केंद्र में भी कीमती धातुएं तरल रूप में तैरती रहती हैं परन्तु उन्हें निकाल पाना नामुमकिन है और धरती की स्थिरता के लिए निषिद्ध भी. इसलिए नासा का मुख्य उद्देश्य इस अभियान के पीछे यह जानना है कि क्या यह वास्तव में ही किसी पूर्व ग्रह का बाख गया केंद्र है. अगर ऐसा है तो हमें हमारी पृथ्वी और इसके सदृश्य अन्य ग्रहों के निर्माण की सबसे कठिन कड़ी जानने को मिल सकेगी.
वैसे 16साइके के अलावा UW -158 में प्लैटिनम का लगभग 90000000000 किलोग्राम का भण्डार है. परन्तु इन बेशकीमती नजरानों को इंसान की भूखी नजरों ने नुक्सान पहुँचाना शुरू किया, तो धरती से शुरु हुया तबाही का मंजर अन्तरिक्ष में भी देखने मिल जाएगा. वैसे भी कृत्रिम उपग्रहों के कबाड़ अन्तरिक्ष में प्रदूषण तेजी से उत्पन्न कर रहा है.

भारतीय वैज्ञानिक शिशिर कुमार मित्रा के नाम पर चाँद का क्रेटर


अन्तरिक्ष के क्षेत्र में भारत का नया दूत चंद्रयान-2 अपने ऐतिहासिक लक्ष्य से बस कुछ ही दूर है और चन्द्रमा के अनजाने हिस्से में उतरने और अध्ययन के पहले वह अपने अत्याधुनिक मैपिंग कैमरे से चन्द्रमा की शानदार तस्वीरें भेज रहा है – इन तस्वीरों में चन्द्रमा के गड्ढों (क्रेटरों) की अनेक तस्वीरें हैं. इन्हीं क्रेटरों की तस्वीरों में एक क्रेटर है – चंद्रा क्रेटर जो कि भारत के महान वैज्ञानिक श्री शिशिर कुमार मित्रा के नाम पर सम्मानपूर्वक रखा गया है. आइये इनके बारे में जानने का प्रयास करते हैं -


शिशिर कुमार मित्रा जी का जन्म वर्ष 1890 में बंगाल प्रेसिडेन्सी में हुआ था. आशुतोष मुखर्जी, डॉ. सीवी रमन, चार्ल्स फैब्री, मैरी क्यूरी और कैमिल गटन जैसे विश्व के महान वैज्ञानिकों के साथ उन्होंने कार्य किया. मित्रा जी ने ओजोन परत के क्षेत्र में विस्तृत शोध व विश्लेषण के पश्चात् पृथ्वी के वायुमंडल के बारे में सिद्धांत दिए. उन्होंने पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में स्थित ई लेयर और एफ लेयर के बारे में अनेक नवीन तथ्यों को उजागर किया. अपने शोध उपरी वायुमंडल (TheUpper Atmosphere) के प्रकाशन के बाद उनकी गणना चर्चित भौतिक वैज्ञनिकों में होने लगी.



भारत में सर्वप्रथम मित्रा जी ही कलकत्ता स्थित विज्ञान यूनिवर्सिटी कॉलेज की अपनी प्रयोगशाला से मित्रा रेडियो ट्रां​समिशन के ज़रिए 1926 में कार्यक्रम जारी करते थे.


1927 में पहली बार भारतीय ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना हुई थी जो बाद में ऑल इंडिया रेडियो के रूप में स्थापित किया गया था.



अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय यूनियन ने जब खोजे गए आकाशीय पिंडों के नामकरण का निर्णय लिया तो एक समूह की स्थापना की गयी जिसके आधार पर पद्म भूषण से सम्मानित मित्रा के नाम पर एक क्रेटर का नाम रखे जाने की घोषणा 1970 में की थी. वैसे उनको ये सम्मान मृत्यु के सात साल बाद मिला.


वह समय भारत अन्तरिक्ष क्षेत्र में बस शुरुआत ही कर रहा था, परन्तु आज हमने चन्द्रमा, मंगल के प्रथम सफल अभियानों के बाद पुनः चाँद के अनजाने हिस्से के अध्ययन (चंद्रयान-2), सूर्य के लिए (आदित्य-1) और मानव मिशन के लिए (गगनयान) के साथ अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में देश और ध्वज का नाम प्रकाशित कर लिए है.

भारतीय वैज्ञानिकों, जन और इसरो को इस उपलब्धि हेतु – जय भारत माँ

Friday, August 23, 2019

स्पेस क्विज - चंद्रयान 2 (MyGov तथा ISRO के सौजन्य से)


भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान केंद्र - इसरो के द्वारा चंद्रयान-2 सम्बंधित क्विज का आयोजन किया गया है. 26 अगस्त इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथि है.

अगर आप भी इसरो से मिले प्रमाण-पत्र / सर्टिफिकेट को पाकर गौरवान्वित महसूस करना चाहें तो नीचे दिए गए लिंक पर जाकर क्विज में भाग लेवें .

https://quiz.mygov.in/quiz/online-space-quiz/

Tuesday, August 20, 2019

चन्द्रमा की कक्षा में हमारा चंद्रयान-2


हमारे देश भारत का ऐतिहासिक चंद्रयान-2 अपने 30 दिनों के अन्तरिक्षीय सैर के बाद आज मंगलवार 20 अगस्त 2019 को चन्द्रमा की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया. इसरो के अनुसार यह इस चन्द्र-अभियान की अब तक की सबसे मुश्किल कड़ी थी.

चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित करने के लिए इसकी गति और झुकाव को बिलकुल सहीं रखना जरूरी था, थोड़ी भी तेज गति इसे चन्द्रमा से दूर सुदूर अन्तरिक्ष में फेंक देती वहीँ कम गति में चन्द्रमा इसे खींचकर अपने धरातल पर ला पटकता और नष्ट कर देता.   

लेकिन अभी परीक्षा समाप्त नहीं हुयी है. अभी तीन बार इसकी कक्षा को धीरे-धीरे कम करते हुए इसे चन्द्रमा के बिलकुल नजदीक दक्षिण ध्रुव की ओर ले जाना है. 2 सितम्बर को असली परीक्षा शुरू होगी जब इसके लैंडर को अलग किया जाएगा और फिर क्रमशः गति कम करते-करते यह 7 सितम्बर को चन्द्रमा के अनछुए धरातल पर उतरेगा.

ज्ञात हो कि चन्द्रमा के दक्षिण ध्रुव पर पहुँचने वाला यह पहला अभियान होगा.

शुभकामनाओं के साथ
जय इसरो- जय भारत    

वायेजर 2 – सौरमंडल के बाहर विचरता पृथ्वी का संदेशवाहक

सूदूर अन्तरिक्ष में वायेजर 2 


आज ही के दिन 20 अगस्त 1977 को, आज से ठीक 42 साल पहले नासा ने वायेजर 2 का प्रक्षेपण किया था, तब शायद किसी ने भी न सोचा था होगा कि यह प्रोब सौरमंडल के न केवल अंतिम ग्रह तक जाएगा बल्कि उससे आगे की अनजानी दुनिया को पार करता हुआ एक दिन सौरमंडल की सीमा को भी पार कर दुसरे तारे के क्षेत्र में प्रवेश करेगा – वैसे अगर सब ठीक भी रहा तो भी उसे  कम से कम 40000 वर्ष लगेंगे – एंड्रोमेडा तारामंडल के छोटे से तारे रॉस 248 तक पहुँचने में.

आज सौरमंडल के बाह्य गैसीय दानवों और क्षुद्र ग्रह प्लूटो और इनके अनेकों चंद्रमाओं की जो जानकारियाँ हैं वे मुख्यतः वायेजर 2 और इसके साथी वायेजर 1 की देन है. हम नहीं जानते कि कभी ये किसी अन्य जीवन तक पहुंचेगा भी या नहीं. परन्तु हमने इसमें एक गोल्ड ग्रामोफ़ोन डिस्क और उसे चलाने के लिए सांकेतिक निर्देश भेजे हैं जिसमें धरती की 55 भाषाओँ में सन्देश है और उसमें से 10 भाषाएँ हमारे भारत की हैं.

वायेजर में भेजी गयी डिस्क और प्रतीक चिन्ह (The Sound of Earth)

शायद हम कभी न जान पाये क्योंकि 2036 के बाद इससे हमारा संपर्क टूट जाएगा परन्तु इस आशा के साथ कि शायद कोई अति-विकसित सभ्यता इसे ढूंढ ले और इसमें बने पृथ्वी के अन्तरिक्षीय पते पर पहुँच सके. इसी सकारात्मक आशाओं के साथ वायेजर 2 को वर्षगाँठ की शुभकामनाओं के साथ....\