Saturday, August 5, 2017

मंगल ग्रह का नियाग्रा फॉल (जलप्रपात)




धरती के वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल और आशाओं के प्रतीक मंगल ग्रह की नासा ने कुछ तस्वीरें विगत दिनों जारी की हैं जिसमें नियाग्रा जलप्रपात की तरह का एक विशाल झरना नजर आ रहा है. वैसे यहाँ दो बातें जरूरी है - एक यह कि यह झरना पानी से नहीं बल्कि पिघले हुए लावा की वजह से बना हुआ है. दूसरा कि यह झरना सक्रिय नहीं है. वैज्ञानिकों के अनुसार एक समय मंगल पर लावा बहता रहता था, उसी लावे के प्रवाह के निशान इस सूखे झरने में देखे जा सकते हैं.

2005 में मंगल ग्रह पर भेजे गए यान MRO ने ये तस्वीरें भेजी हैं। यह यान पिछले काफी समय से मंगल की तस्वीरें भेज रहा है। नासा ने कहा कि मंगल पर पानी की तलाश में काफी समय खर्च किया गया है। अगर यहां पानी मिलता है, तो यह जीवन की मौजूदगी का संकेत होगा। अब ये नई तस्वीरें बताती हैं कि एक समय में मंगल आज की स्थितियों के मुकाबले ज्यादा जीवंत हुआ करता था। मंगल की सतह पर फैला पिघला हुआ लावा इसी बात का संकेत करता है। ये तस्वीरें उसी लावा प्रवाह का नतीजा दिखाती हैं।

सूर्य के अन्दर तक जाएगा नासा का सोलर प्रोब



यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से शायद एक होगी। नासा अगले साल अंतरिक्ष यान को सूरज पर ले जाने की तैयारी में है। सूरज की यह यात्रा मानव सभ्यता की पहली यात्रा होगी। नासा ने इसे लेकर घोषणा करते हुए कहा है कि 2018 की गर्मियों में इस अंतरिक्ष यान को लॉन्च करने की तैयारी की जा रही है।


सोलर प्रोब प्लस सूरज की सतह में 40 लाख मील अंदर तक यानी बिल्कुल सौर वातावरण तक जाएगा। ऐसी स्थिति में यान को जितनी ज्यादा गर्मी और विकिरण का सामना करना होगा उतना आज तक किसी भी मानव-निर्मित चीज ने नहीं किया होगा। इस प्रॉजेक्ट का उद्देश्य सूरज के बाहरी हिस्से का अध्ययन करना है।

सोलर प्रोब सूरज की सतह के 62 लाख किलोमीटर के दायरे में चक्कर लगाएगा और लगभग 1377 डिग्री सेल्सियस तापमान का सामना करेगा। नासा के मुताबिक अबतक कोई भी यान जितना नजदीक पहुंचा है उससे 7 गुना अधिक नजदीक यह यान जाएगा। पिछली बार 1976 में हिलियस-2 नाम का अंतरिक्ष यान सूरज के पास पहुंचा था। तब इस यान की सूरज से दूरी 430 लाख किलोमीटर थी।

नासा ने एक बयान में कहा कि स्पेसक्राफ्ट सूरज के बाहरी वातावरण का अध्ययन करेगा। इससे मिली जानकारियों से दशकों पुराने उस सवाल का हल मिलेगा कि तारे कैसे काम करते हैं। इस सोलर प्रोब प्लस को सूरज के ताप से बचान के लिए इसमें स्पेशल कार्बन कंपोजिट हीट शिल्ड लगाई गई है। इस हीट शिल्ड की मोटाई 11.43 सेमी है।

ब्रम्हांड के सबसे छोटे सितारे की खोज

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमण्डल के शनि ग्रह जितने आकार के सितारे की खोज हमसे 600 प्रकाशवर्ष दूरी पर की है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सबसे छोटे आकार का सितारा है जिससे छोटा सितारा सैद्धांतिक रूप से संभव नहीं है।




इंग्लॅण्ड में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के इस तारे को पृथ्वी से करीब ६०० प्रकाशवर्ष की दूरी पर खोज निकाला है. यह सितारा हमारी अपनी आकाशगंगा में स्थित है. अभी इसका नाम EBLM J0555-57Ab रखा है. उन्होंने इसकी खोज की जब यह अपने से अधिक बड़े पिंड के सामने से गुजरा था.

इस सितारे की सबसे खास बात यही है कि यह उतना ही छोटा है जितना कोई सितारा हो सकता है. इसका द्रव्यमान ठीक उतना ही अनुमानित है जितने में हाइड्रोजन का हीलियम में संविलियन हो सके. अगर यह थोड़ा सा भी और छोटा होता तो इसमें यह प्रक्रिया संभव ही नहीं हो पाती और यह कभी भी दीप्तमान नहीं हो पाता.

भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी नई गैलक्सी 'सरस्वती'



अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हमारा देश भारत लगातार नयी सफलताओं के साथ विश्व के चुनिन्दा देशों में शामिल हो चूका है. इसी कड़ी में पहली बार भारत में वैज्ञानिकों की एक टीम ने अब तक की सबसे बड़ी आकाशगंगाओं यानि गलाक्सियों एक बड़ा समूह खोजने का दावा किया है जिसे सुपरक्लस्टर (एक क्लस्टर में लगभग 1000 से 10,000 गैलेक्सी होती हैं। एक सुपरक्लस्टर में 40 से 43 क्लस्टर शामिल होते हैं) भी कहा जाता है। यह गैलक्सी पृथ्वी से 400 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर बताई जा रही है और इसका आकार 200 लाख अरब सूरजों के बराबर बताया जा रहा है। उनकी गणना के मुताबिक यह आकाशगंगा दस अरब साल पुरानी होनी चाहिए. इस गैलक्सी को वैज्ञानिकों ने 'सरस्वती' नाम दिया है।

पुणे के इंटरयूनिवर्सटी सेंटर फॉर एस्ट्रॉनोमी ऐंड एस्ट्रोफिजिक्स और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों के दल ने यह खोज की है। इस संस्थान के वैज्ञानिक पिछले वर्ष गुरुत्वाकर्षीय तरंगों की बड़ी खोज में भी शामिल थे। साइंटिस्ट्स के मुताबिक यह गैलक्सी समूह काफी चमकदार है।

जेम्स वेब अन्तरिक्ष दूरबीन James Webb Space Telescope (JWST)


अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अमेरिकी अतरिक्ष संस्था नासा यूरोपीयन स्पेस एजेंसी और कैनेडियन स्पेस एजेंसी के साथ मिलकर नए युग के लिए जेम्स वेब अन्तरिक्ष दूरबीन James Webb Space Telescope (JWST) का निर्माण कर रहा है (पहले इसका नाम नेक्स्ट जनरेशन स्पेस टेलिस्कोप रखा गया था). इस निर्माणाधीन दूरबीन की अगले साल अक्टूबर २०१८ में पूर्ण होने की सम्भावना है. जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप जैसे अन्य मिशनों की वैज्ञानिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए डिजायन किया गया है.

अत्याधुनिक यह दूरबीन अन्तरिक्ष में और दूर तक झांकने में अभूतपूर्व सहयोग प्रदान करेगी. इसका रिजल्युसन और संवेदनशीलता अत्यधिक बेहतरीन है. जहाँ हबल टेलिस्कोप का व्यास 2.4 मीटर है वहीँ यह दूरबीन 6.५ मीटर व्यास की है. 

नासा की यह जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन हाल में खोजी गई 'ट्रैपिस्ट-1' ग्रह प्रणाली के पृथ्वी के आकार के ग्रहों और बृहस्पति ग्रह के उपग्रह 'यूरोपा' पर जीवन के संकेत खोजेगी.

वाशिंगटन में नासा मुख्यालय में जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन के निदेशक एरिक स्मिथ ने कहा कि यह दूरबीन हमारे ब्रहमांड में कुछ अतुलनीय चीजों को खोजेगी. 2100 से अधिक प्रस्तावित शुरुआती अवलोकन के साथ आगे भविष्य में यह दूरबीन अन्तरिक्ष में गहरे देखकर अनगिनत आश्चर्यों को सामने लाएगी.