Saturday, February 10, 2018

मृत्यु का देवता - यम (pluto) - ग्रह या बौना ग्रह?

प्लूटो और शेरोन
प्लूटो (Pluto - जिसे हिंदी में यम ग्रह के नाम से जाना जाता है), एक समय में हमारे सौरमंडल के नवम ग्रह के रूप में सुशोभित था. परन्तु वर्तमान में इससे मुख्य ग्रह (बाहरी ग्रह – बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून के साथ) का पद छीन लिए जाने के कारण यह अब बौना ग्रह (Dwarf Planet) माना जाता है (इसे ग्रहों की सूची से क्यों बाहर किया गया, इस पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे). इस ग्रह की खोज फरवरी 1930 में लोवेल शोधशाला (Lowell Observatory) में अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबौ (Clyde William Tombaugh) ने की थी. गणनाओं की सत्यता स्थापित होने के बाद March 13, 1930  को एक नए ग्रह की खोज की घोषणा की गयी. काइपर बेल्ट में खोजी गयी यह पहली वस्तु थी. खोज के बाद इस ग्रह के नामकरण के लिए लोवेल शोधशाला को लगभग 1000 नाम प्रस्तावित किये गए. अंततः इंग्लैंड की वैनेशिया बर्नी (Venetia Burney) के द्वारा प्रस्तावित नाम पर सहमति प्रदान की गयी. 

प्लूटो (यम) हमारे सौरमंडल में आकार के आधार पर दूसरा सबसे बड़ा बौना ग्रह है. वैसे आकार में यह हमारे चन्द्रमा से भी काफी छोटा है. आकार में छोटा होने के कारण इसे इसके उपग्रह शेरोन (Charon) के साथ जुड़वाँ ग्रह भी कहा जाता था. सूर्य से दूरी के क्रम में अंतिम स्थान पर विराजमान प्लूटो काइपर बेल्ट (Kuiper Belt) में मौजूद है. इस बेल्ट या घेरे में मौजूद सभी खगोलीय पिंड सौरमंडल के बाहरी घेरे में माने जाते हैं और इनके आकार और द्रव्यमान सौरमंडल की सभी वस्तुओं से काफी कम है और प्लूटो इस काइपर बेल्ट पर सबसे बड़ा खगोलीय पिंड है. इसका व्यास केवल 2376 किलोमीटर ही है.  प्लूटो जमी हुयी नाइट्रोजन की बर्फ, पानी की बर्फ और चट्टानों से बना हुआ है जैसा इस क्षेत्र में स्थित समस्त पिंड बने हुए हैं. 

जहाँ तक रही बात इसकी परिक्रमा की तो वह भी थोड़ी अजीब है. जहाँ बाकी ग्रह अपनी वलयाकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं वहीँ प्लूटो की कक्षा काफी विचलित है. यह नेपच्यून की कक्षा में प्रवेश करता  है और इसका उपसौर (सूर्य से न्यूनतम दूरी) जहाँ 4.43 अरब किलोमीटर तक होती है वहीँ अपसौर (सूर्य से अधिकतम दूरी) 7.31 अरब किलोमीटर तक हो जाती है.  जिसके कारण इसे सूर्य की परिक्रमा में लगभग 247.68 पृथ्वी-वर्ष लग जाता है. 

सूर्य से अत्यधिक दूरी पर स्थित प्लूटो पर बहुत ही क्षीण वायुमंडल है जो मुख्यतः नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनो-ऑक्साइड का मिश्रण है. एक मजेदार बात यह भी है कि सूर्य से जब यह अपसौर की स्थिति में अपनी अधिकतम दूरी पर होता है तो यहाँ और अधिक ठण्ड हो जाती है जिसके कारण नाइट्रोजन जैसी गैसें जम कर इसकी सतह पर गिर जाती हैं और वायुमंडल पतला होते जाता है. उपसौर की स्थिति में इन जमी गैसों का कुछ  भाग वाष्पीकृत हो जाता है और वायुमंडल में आ जाता है, परन्तु यह सतत प्रक्रिया लगातार वायुमंडल को महीन बना रही है. 

भले ही प्लूटो एक बौना ग्रह है जिसका आकार बहुत ही छोटा है, लेकिन चंद्रमाओं (उपग्रहों) के मामले में यह काफी धनी है. प्लूटो के कुल पाँच उपग्रह ज्ञात हैं – जिसमें सबसे बड़ा है 1978 में खोजा गया शेरोन. खोज के काफी वर्षों तक इसे इसका एकमात्र उपग्रह माना जाता रहा था और वैज्ञानिकों का एक समूह इस प्रणाली को जुड़वाँ-ग्रह भी कहते रहे हैं. 2005 के बाद पता चला कि इसके चार और चाँद हैं - जिनका नाम निक्स (Nix), हाइड्रा (Hydra), स्टिक्स (Styx) और कर्बेरोस (Kerberos) रखा गया. 

वायेजर (Voyager) के बाद न्यू होराइजन्स (New Horizons) सौरमंडल
न्यू होराइजन्स (New Horizons)
के इस क्षेत्र तक जाने वाला अन्तरिक्ष यान बना और यह 14 जुलाई 2015 को इस ग्रह से केवल 12500 किलोमीटर की दूरी से गुजरा. इस यान से प्रेषित आंकड़े प्लूटो के बारे में हमारी समझ को और विकसित करेंगे. मृत्यु के देवता ‘यम’ के अँधेरे में न जाने कितने छुपे सवालों के जवाब शायद हमें तब मिल पाएं. 


प्लूटो से ग्रह का दर्जा क्यों छीन लिया गया –
अपने खोज के समय से ही इसे सौर-मंडल के मुख्य ग्रहों में सूर्य से दूरी के क्रम में नौंवा (अंतिम) ग्रह माना गया था. लेकिन समय के साथ अनेक अन्तरिक्ष अभियानों और पृथ्वी केन्द्रित खोजों ने इस ग्रह और सौरमंडल के बारे में नयी जानकारियाँ प्रदान की – 

सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को प्लूटो का परिक्रमा पथ विचलित करता रहा.
जहाँ बाकी सभी आठ ग्रहों के परिक्रमा पथ एक समतल में थे वहीँ प्लूटो का परिक्रमा पथ कोण के रूप में था (चित्र से यह स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जायेगी). सभी ग्रहों के परिक्रमा पथ से इतर इस अनोखे परिक्रमा पथ की वजह से भी जिसमें यह नेपच्यून की कक्षा में प्रवेश कर जाता है; और अपने अत्यधिक छोटे आकार के कारण (यह हमारे चाँद से भी छोटा है) कई वैज्ञानिकों को यह लगने लगा कि यह ग्रह ना होकर नेपच्यून का कोई भागा हुआ उपग्रह है. हालांकि यह सम्भावना जल्द ही ख़ारिज कर दी गयी क्योंकि कभी भी यह दोनों ज्यादा नजदीक नहीं आते और प्लूटो का ग्रह का दर्जा बचा रह गया. 

परन्तु धीरे-धीरे वैज्ञानिकों को लगातार नेपच्यून के परे काइपर बेल्ट (Kuiper Belt) में लगातार अनेक खगोलीय पिंड मिलने लगे जो प्लूटो के सदृश्य थे. इसका आकार बहुत ही छोटा था। इस से पहले सब से छोटा ग्रह बुध (Mercury) था। प्लूटो बुध से आधे से भी छोटा था। आगे अन्वेषणों में पता चला कि वहां तो एक पूरा घेरा बना हुआ है जिसमें अनगिनत खगोलीय पिंड परिक्रमारत हैं. वैज्ञानिकों ने इस घेरे का नाम काइपर बेल्ट रखा और लगातार वहाँ से ह्यूमिया (Haumea) और मेकमेक (Makemake) जैसे पिंड मिलने लगे. एरिस (Eris) के मिलने के बाद वैज्ञानिकों के सामने एक नयी चुनौती आ पड़ी कि क्या ऐसे पाए जाने वाले सभी पिंडों को ग्रह कहा जाए जो प्लूटो के जैसे लगते हैं. ऐसा होना अव्यवहारिक था क्योंकि समय के साथ अगणित पिंडों की खोज भविष्य में अवश्यभावी थी. अतः वैज्ञानिकों के संघ ने अनेक विचार-मंथन के बाद 13 सितम्बर 2006 को ‘बौने ग्रहों’ की एक नयी श्रेणी स्थापित की और प्लूटो के साथ ह्यूमिया (Haumea), मेकमेक (Makemake), एरिस (Eris) और सेरेस (Ceres) को इनमें स्थान दिया गया. 

ऐसा करने के पीछे वैज्ञानिकों ने अपने तर्क रखे थे. किसी पिंड को ग्रह का दर्जा दिए जाने के लिए तीन शर्तें पूरी करनी आवश्यक मानी गयीं –
1.    वह सूर्य की परिक्रमा करता हो.
2.    उसके पास पर्याप्त द्रव्यमान हो जिससे वह लगभग गोलाकार आकृति प्राप्त कर सके.
3.    उसने अपने परिक्रमा पथ के अंतर्गत अपने गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के आस-पास के क्षेत्र को साफ़ कर दिया हो – या यूं कहें कि उसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में उसके उपग्रहों के अलावा और कोई पिंड न रह सके. जो भी पिंड हो वह प्लूटो के गुरुत्वीय प्रभाव में बंधा रहे. प्लूटो यह नहीं कर पाया क्योंकि उसके आस-पास अनेकों काइपर बेल्ट पिंड हैं जो उसके गुरुत्वीय प्रभावों से विचलित नहीं होते. बस यही एक कारण था कि इसे मुख्य ग्रह का ताज छोड़ना पड़ा और नियमानुसार तीसरी शर्तें पूरी न करने पर ‘बौने ग्रह’ के नए पद से संतुष्ट होना पड़ा. 


आशा है ये जानकारी आपको पसंद आई होगी, जल्द ही सौरमंडल के विशालतम ग्रह - बृहस्पति पर लेख के साथ ...

Monday, January 29, 2018

ज्वालामुखियों से भरा नर्क या सौन्दर्य की देवी - शुक्र (Venus)

जवालामुखी की धरती - शुक्र ग्रह
प्राचीन भारतीय सभ्यता में ‘भोर का तारा (The Morning Star)’ और ‘सांध्य-तारा (The Evening Star)’ के नाम से पहचाने जाने वाला शुक्र ग्रह (Planet Venus), सूर्य से दूरी के क्रम में दूसरे स्थान पर है. पृथ्वी से देखने पर आकाश में चन्द्रमा के बाद सबसे चमकीले इस आकाशीय पिंड का नामकरण  पाश्चात्य सभ्यताओं में प्रेम और सौन्दर्य की रोमन देवी वीनस (Venus) के ऊपर किया गया है. 
शुक्र (Venus) ग्रह की गति में एक दिलचस्प बात है – जहाँ लगभग सभी ग्रहों की घूर्णन काल (Rotation Period) यानि अपने अक्ष (Axis) पर एक चक्कर लगाने में लगने वाला समय, परिक्रमण काल (Period of Revolution - सूर्य का चक्कर लगाने में लगने वाला समय) से कम ही होती है, वही शुक्र के साथ यह बिलकुल उलट है. अपने अक्ष पर धूमने के नाम पर सौन्दर्य की यह देवी बहुत धीमी है.  जहाँ इसे सूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे 224.7 पृथ्वी दिवस लगते हैं वहीं अपने अक्ष पर इसे एक चक्कर लगाने में पूरे 243 पृथ्वी-दिवस लग जाते हैं. एक और बात शुक्र बाकी ग्रहों की तुलना में उलटी दिशा (दक्षिणावर्त) घूमता है. शुक्र की कक्षा भी अनोखी है लगभग पूर्ण वृत्ताकार. यह 10,80,00,000 किलोमीटर की औसत दूरी पर सूर्य की परिक्रमा करता है. 

शुक्र चट्टानी ग्रह है जिसका आकार और बाह्य-संरचना हमारी पृथ्वी के तरह नजर आती है. पृथ्वी के समान आकार और संरचना की वजह से इसे कभी-कभी पृथ्वी की ‘बहन’ भी कहा जाता है. परन्तु जहाँ पृथ्वी जीवन के अनुकूल वातावरण से समृद्ध है वहीँ शुक्र में सल्फ्यूरिक अम्ल की बारिश होती रहती है. सल्फ्यूरिक अम्ल का यह अपारदर्शी बादल शुक्र के धरातल को सबकी नजरों से बचाकर रखे हुए है. जहाँ बुध ग्रह में वायुमंडल नगण्य है, ठीक अगले ग्रह याने शुक्र में यह सभी आतंरिक ग्रहों में सबसे सघन है और मुख्यतः कार्बन डाईऑक्साइड से बना है. वैसे यहाँ हवा भी बड़े ही धीमे गति से चलती है. 

शुक्र के अध्ययन में एक दिलचस्प बात सामने आई है कि यहाँ अरबों साल पहले पानी हो सकता था लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड की प्रचुरता से लगातार होते ग्रीन-हाउस प्रभाव की वजह से वह वाष्पीकृत होते चले गए होंगे और आज शुक्र की धरती ज्वालामुखियों की धरती है जहाँ सौरमंडल के किसी भी ग्रह की तुलना में सबसे अधिक सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं. इसकी भूमि ज्वालामुखी से निकले लावा और चट्टानों के सूखे टुकड़ों से भरी पड़ी एक मृत धरती है, जिसमें अगली हलचल किसी ज्वालामुखी की सक्रियता से ही होती है. बेसाल्ट से बनी इस धरातलीय संरचना का 65% हिस्सा इन्हीं ज्वालामुखी के लावा से बना हुआ है. शुक्र के ज्वालामुखी शील्ड प्रकार के ज्वालामुखियों के अंतर्गत आते हैं जिसमें विष्फोट नहीं होता बल्कि लावा द्रव्य बाहर निकलते रहता है. सीफ मोंस (Sif Mons), गुला मोंस (Gula Mons), सफास मोंस (Safas Mons) आदि ऐसे ही ज्वालामुखी हैं. वैसे शुक्र में एक लाख से भी अधिक ज्वालामुखी होने की सम्भावना हैं. 

जैसा बुध के समय भी इस बात का उल्लेख हुआ था कि आंतरिक ग्रहों के उपग्रह नगण्य हैं. चार आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल) के मिलाकर कुल केवल तीन प्राकृतिक उपग्रह या चाँद हैं. सम्पूर्ण सौरमंडल में केवल  बुध और शुक्र ही ऐसे ग्रह हैं जिनका कोई उपग्रह नहीं है. इसका कारण इसकी सूर्य से नजदीकी है जिसके कारण कोई भी पिंड इनकी कक्षा में आने के पहले ही सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में फंसकर उससे टकरा जाता है और नष्ट हो जाता है. 
शुक्र पारगमन (Transit of Venus)

एक बात और शुक्र की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष थोड़ी झुकी हुई है; इसलिए, जब यह ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुजरता है तो यह सूर्य के एक हिस्से के ऊपर नजर आता है, इसे शुक्र पारगमन (Transit of Venus) कहते हैं. 
मेरिनर-2 (Mariner-2) USA

सौन्दर्य की देवी के नाम पर पड़े इस ग्रह की ओर शुरू से वैज्ञानिकों की बेहद दिलचस्पी रही और अनगिनत अन्तरिक्ष अभियान इस ग्रह के अध्ययन के लिए भेजे गए. शुरुआत हुयी सोवियत संघ (USSR) द्वारा 12 फरवरी 1961 को वेनेरा-1 (Venera-1) के साथ, परन्तु प्रक्षेपण के सातवे दिन यान ने संपर्क खो दिया. अगले साल 22 जुलाई 1962 को संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने मेरिनर (Mariner-1) नामक यान शुक्र की ओर भेजा परन्तु शायद इस देवी तक पहुँचना इतना आसान नहीं था और विफल प्रक्षेपण के साथ यह अभियान भी असफल हो गया. परन्तु कुछ ही दिनों बाद मेरिनर मिशन का दूसरा अन्तरिक्ष यान मेरिनर-2 (Mariner-2)शुक्र की धरती से 34,883 किमी उपर से गुजरा और दुनिया का पहला सफलतम अन्तर्ग्रहीय अन्तरिक्ष मिशन बन गया। इसने शुक्र के तापमान की 425 डिग्री होने की पुष्टि की और जीवन की संभावनाओं की तलाश को पहला बड़ा सदमा लगा. 

आने वाले समय में वेनेरा (Venera), मेरिनर (Mariner), कॉसमॉस (Cosmos), वेगा (Vega), स्पुतनिक (Sputnik) जैसे अनेक अभियानों ने इस ग्रह के बारे में हमारी समझ को और विकसित किया. हर अन्वेषण इस सौन्दर्य की देवी के उस चेहरे को सामने लाता गया जो सौन्दर्य की परिभाषा के पूर्णतः विपरीत है; और पता चला कि सुन्दर समझा जाने वाला यह ग्रह अन्दर से पूरी तरह ज्वालामुखियों से तप्त एक नरक है जिसमें आकाश भी तेज़ाब बरसाते हैं.

Saturday, January 27, 2018

बुध (Mercury) – सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह

क्रेटरों से भरी हुयी बुध की धरा 
बुध (Mercury), हमारे सौरमंडल में सूर्य से दूरी के क्रम में पहला और सभी प्रमुख आठ ग्रहों में सबसे छोटा  है. इतना छोटा कि सौर मंडल के कुछ उपग्रह जैसे गेनीमेड (Ganymede) और टाइटन (Titan) से भी छोटा है. परन्तु इसका द्रव्यमान उनसे जरूर ज्यादा है. इसका कोर भी इसके आयतन का कुल 42% घेरता है जो इसके कोर को अनुपातिक तौर पर बहुत बड़ा बना देता है. सूर्य के नजदीक होने की वजह से यह सूर्य की एक परिक्रमा केवल 88 पृथ्वी दिवसों (Earth-Days) में लगा लेता है, परन्तु अपने अक्ष (Axis) पर एक चक्कर लगाने में इसे पूरे 59 पृथ्वी दिवस लग जाते हैं. इसके इस घूर्णन काल (Rotation Period - अपने अक्ष पर एक चक्कर याने बुध का एक दिन) और परिक्रमण काल  (Period of Revolution - सूर्य का एक चक्कर याने बुध पर एक वर्ष) के बीच के इस कम अंतराल से एक रोचक बात होती है  - वह यह कि वहाँ पर एक दिन (सूर्योदय से सूर्योदय तक) पूरे 176 पृथ्वी-दिवसों के बराबर होता है क्योंकि कोई एक क्षेत्र वापस भले ही अपनी स्थिति में 59 दिनों में आ जाता हो, परन्तु सूर्य की ओर उसकी दिशा तीन घूर्णन या दो परिक्रमण काल के बाद ही पहले जैसी हो होती है. 

बुध ग्रह का नाम रोमन मिथको के अनुसार मरकरी (Mercury)  के ऊपर रखा गया है जो कि व्यापार और यात्रा देवता है. मरकरी यूनानी देवता हर्मिश (Hermes) का रोमन रूप है जो कि देवताओ का संदेशवाहक देवता है। इसे संदेशवाहक देवता का नाम इस कारण मिला क्योंकि यह ग्रह आकाश में काफी तेजी से गमन करता है।
बुध का अक्षीय झुकाव (Axial tilt) सम्पूर्ण सौरमंडल में सबसे कम केवल 1/30 डिग्री है, परन्तु बुध के अक्ष की विकेन्द्रता सौरमंडल में सबसे अधिक है. यह ग्रह अपसौर (Aphelion - किसी ग्रह की अपनी कक्षा पर सूर्य से अधिकतम दूरी - 69,816,900 कि.मी.) तथा उपसौर (Perihelion - किसी ग्रह की अपनी कक्षा पर सूर्य से न्यूनतम दूरी - 46,001,200 कि.मी.) की स्थिति में सूर्य से करीब 1.5 गुणा ज्यादा दूर होता है.

एक और मजेदार बात है कि बुध पृथ्वी से केवल सुबह या शाम को दिखाई देता है, आधी रात को यह नजर नहीं आता है. साथ ही पृथ्वी से देखने पर यह हमारे चन्द्रमा जी तरह कलाएं प्रदर्शित करता है. वैसे सूर्य के काफी नजदीक होने के कारण भले ही यह काफी चमकीला है पर इसी चमक और नजदीकी होने के कारण इसे देखना शुक्र की तुलना में थोड़ा ज्यादा कठिन है. 

किसी ग्रह का वायुमंडल सूर्य से सतह तक आने वाली किरणों से वापस जाने से रोकता है जिससे ग्रह पर गर्माहट बने रहती है जो कि रात्रिकाल में उसके तापमान को व्यवस्थित करती है. परन्तु बुध में वायुमंडल नगण्य है और इसके कारण सौर वायु के साथ आये सभी परमाणु वापस अन्तरिक्ष में चले जाते हैं. इस कारण दिन और रात के तापमान में बहुत अधिक अंतर है. यह तापमान जहाँ दिन में यह अधिकतम 427°C तक चला जाता है वहीँ रात कि यह न्यूनतम −173 °C तक भी हो जाता है. तापमान में इस भीषण विविधता के चलते बुध की धरा फट सी गयी है और यह किसी सूख चुके कोयले के ढेर की तरह नजर आता है. चन्द्रमा की तरह इसकी धरातल भी क्रेटरों से भरी पड़ी है जो इस ग्रह पर जीवन के विकास की किसी भी संभावनों को नकार देती है. वैसे बुध को मौसमों का भी कोई अनुभव नहीं है और इसका वातावरण हमेशा नवीन बना रहता है. 

आंतरिक ग्रह उपग्रहों के मामले में काफी गरीब हैं. चार आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल) के मिलाकर कुल केवल तीन प्राकृतिक उपग्रह या चाँद हैं. सम्पूर्ण सौरमंडल में केवल  बुध और शुक्र ही ऐसे ग्रह हैं जिनका कोई उपग्रह नहीं है. इसका कारण इसकी सूर्य से नजदीकी है जिसके कारण कोई भी पिंड इनकी कक्षा में आने के पहले ही सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में फंसकर उससे टकरा जाता है और नष्ट हो जाता है.  

बुध के अन्वेषण के लिए अब तक दो अन्तरिक्ष यान मेरिनर-10
मेरिनर-10 (Meriner - 10)
(Mariner-10) तथा मेसेंजर (Messenger) बुध ग्रह पर जा चुके हैं. मेरिनर-10, 1974-1975 के मध्य तीन बार इस ग्रह के समीप जा चूका है. इसने इस ग्रह का धरातलीय नक्शा तैयार किया था. मेसेंजर 2008 से 2011 ने मेरिनर के न देखे हिस्से की तसवीरें भेजी थी. वर्तमान में हबल टेलिस्कोप की मदद से लगभग 45% हिस्से का नक्शा तैयार किया जा चूका है, बाकी हिस्सा तेज चमक की वजह से दृश्य नहीं होने के कारण बाकी भू-भाग का धरातलीय नक्शा तैयार नहीं हो पाया है. बुध के प्रमुख स्थानों में कैलोरिस घाटी है जो 1300 किलोमीटर से ज्यादा व्यास की है जो शायद किसी धूमकेतु की टक्कर से बनी है. इसके अलावा यहाँ एन्गकोर घाटी, केरल घाटी और टिमगेड घाटी प्रमुख हैं.

आशा है सौर-परिवार के क्रम से पहले ग्रह बुध पर यह जानकारी आपको अच्छी लगी होगी. मैंने प्रयास किया है कि कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी न छूट जाए, परन्तु यह भी तथ्य है कि कोई भी लेख कभी भी सम्पूर्ण नहीं हो सकता.

सुझाव के इन्तजार में ....

Thursday, December 28, 2017

सूर्य - सौर मंडल का केंद्र

सूर्य (The Sun)
हमारे सूर्य सौरमंडल के केंद्र में स्थित एक पीला बौना या वामन (Yellow Dwarf) तारा है जिसके शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण में बंधकर सौरमंडल के सभी सदस्य यथा ग्रह, क्षुद्र ग्रह, उपग्रह (अपने ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण में बंधकर), धूमकेतु और अन्य अपने परिक्रमा पथ में इसके चहरों ओर परिक्रमा करते हैं. सूर्य, सौरमंडल के विशालतम पिंड है जो समस्त सौरमंडल के कुल द्रव्यमान का  99.86% है. सूर्य का व्यास लगभग 13 लाख 90 हजार किलोमीटर है. यह हमसे लगभग 15 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसका प्रकाश हम तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट लगता है.

सूर्य का प्रकाश, सम्पूर्ण सौरमंडल की उत्पत्ति का आधार है. यह हाइड्रोजन और हीलियम नामक गैसों का विशाल गैसीय गोला है जो परमाणु संलयन की प्रक्रिया के द्वारा अपने केंद्र में उर्जा उत्पन्न करता है. सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हीलियम के साथ ही लोहा, निकल, ऑक्सीजन, सिलिकॉन, सल्फर और कार्बन जैसे तत्वों से हुआ है. जिसमें से प्रारंभिक दो तत्व लगभग 98% उपस्थित हैं. इसका आकार लगभग गोलाकार है जो ध्रुवीय क्षेत्र में थोडा चिपटा हुआ है, लेकिन चट्टानी ग्रहों की तरह इसकी कोई निश्चित सीमा रेखा निर्धारित नहीं है.

यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि समस्त आकाशीय पिंडों की तरह सूर्य भी हमारी आकाशगंगा (The Milky Way) के केंद्र के चारों ओर परिक्रमा करता है. 251 किलोमीटर प्रति सेकंड की अनुमानित गति से इसे एक परिक्रमा करने में लगभग 25 करोड़ वर्ष लगते हैं. सूर्य को शक्तिशाली दूरबीन से देखने पर इसकी सतह पर कई छोटे-बड़े धब्बे दिखाई देते हैं जिन्हें वैज्ञानिक सौर कलंक के नाम से पुकारते हैं. ये धब्बे अपना स्थान लगातार बदलते रहते हैं जिसके अध्ययन से वैज्ञानिकों ने इसके अक्ष पर परिक्रमा अवधि 27 पृथ्वी दिवस के बराबर की गणना की है.

सूर्य का निर्माण अन्य तारों की तरह ही आणविक बादलों से हुआ माना जाता है जो करीब 4.57 अरब वर्ष पहले बना. वर्त्तमान सूर्य अपने जीवन की मध्य अवस्था में पीले वामन तारे के रूप में है. करीब 5.4 अरब वर्ष eके पश्चात इसके लाल दानव तारा बनने का अनुमान है जिस स्थिति में यह इतना बड़ा हो जाएगा कि यह सौरमंडल के समस्त आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल )  की कक्षा को निगल जाएगा. वैसे डरने की कोई बात नहीं है क्योंकि इसके पहले ही यह हमे पृथ्वी को जलाकर शुक्र जितना गर्म बना चूका होगा और यहाँ पर केवल आग का दरिया बहेगा.

सौरमंडल के स्वामी और हमारे पृथ्वी पर जीवनदाता सूर्य के बारे में अध्ययन करने के लिए अनेक अभियान संचालित किये जाते रहे हैं जिनमें सर्वप्रथम पायनियर श्रृंखला (1959-1968) ने सौर वायु और उसके चुम्बकीय क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया. 1970 के दशक में अमेरिका और जर्मनी के संयुक्त सहयोग से हेलिओस 1 व 2 ने सौर वायु और कोरोना के बारे में नए आंकड़े प्रदान किये. 

नासा के स्कायलैब अन्तरिक्ष स्टेशन में एक सौर वेधशाला का मोड्यूल स्थापित किया गया था. इसके अलावा अनेक अभियान जैसे यूलिसिस, जेनेसिस आदि समय-समय पर इस सितारे के विविध अध्ययन हेतु संचालित होते रहे हैं, परन्तु इनमें सबसे महत्वपूर्ण सौर मिशन रहा है सोहो (सोलर एंड हेलिओस्फेरिक ओब्सर्वेटरी). 2 दिसम्बर 1995 को शुरू हुआ यह नासा और यूरोपीय अन्तरिक्ष संस्था का संयुक्त अभियान था. सोहो पृथ्वी और सूर्य के बीच के लोंग्रेगियन बिंदु, जहाँ दोनों पिंडों का गुरुत्वीय बल बराबर होता है, पर स्थापित किया गया था. इसने अनेक तरंगदैर्ध्यों पर सूर्य की विस्तृत तस्वीरे प्रदान की तथा अनेक धूमकेतुओं की खोज और अध्ययन भी किया. इसकी सफलता से उत्साहित होकर सोलर डायनामिक्स ऑब्जर्वेटरी अभियान फरवरी 2010 में शुरू किया गया. 

वर्तमान में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन याने इसरो ने आदित्य उपग्रह का प्रक्षेपण किया है जो सोलर कोरोना की गतिशीलता का अध्ययन करेगा.

आने वाले समय में सूर्य की आंतरिक संरचना और इसके अनसुलझे रहस्यों से और परदे उठेंगे, तब तक के लिए हमारे सूर्य देव को नमन...

Saturday, August 5, 2017

मंगल ग्रह का नियाग्रा फॉल (जलप्रपात)




धरती के वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल और आशाओं के प्रतीक मंगल ग्रह की नासा ने कुछ तस्वीरें विगत दिनों जारी की हैं जिसमें नियाग्रा जलप्रपात की तरह का एक विशाल झरना नजर आ रहा है. वैसे यहाँ दो बातें जरूरी है - एक यह कि यह झरना पानी से नहीं बल्कि पिघले हुए लावा की वजह से बना हुआ है. दूसरा कि यह झरना सक्रिय नहीं है. वैज्ञानिकों के अनुसार एक समय मंगल पर लावा बहता रहता था, उसी लावे के प्रवाह के निशान इस सूखे झरने में देखे जा सकते हैं.

2005 में मंगल ग्रह पर भेजे गए यान MRO ने ये तस्वीरें भेजी हैं। यह यान पिछले काफी समय से मंगल की तस्वीरें भेज रहा है। नासा ने कहा कि मंगल पर पानी की तलाश में काफी समय खर्च किया गया है। अगर यहां पानी मिलता है, तो यह जीवन की मौजूदगी का संकेत होगा। अब ये नई तस्वीरें बताती हैं कि एक समय में मंगल आज की स्थितियों के मुकाबले ज्यादा जीवंत हुआ करता था। मंगल की सतह पर फैला पिघला हुआ लावा इसी बात का संकेत करता है। ये तस्वीरें उसी लावा प्रवाह का नतीजा दिखाती हैं।