Wednesday, February 22, 2017

पृथ्वी सदृश्य सात नए ग्रहों की खोज



अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने सौर परिवार से बाहर एक या दो नहीं बल्कि पूरे नौ नए ग्रहों की खोज की घोषणा की है जो हमारी पृथ्वी के सदृश्य हैं, और इनमें से तीन तो अपने तारे से जीवन की प्रबल संभावनाओं इतनी दूरी (ऐसी दूरी जहाँ पर तरल रूप में द्रव कठोर धरातल के ऊपर स्थित हो, और ग्रह न तो ज्यादा गर्म हो और ना ही ज्यादा ठंडा जैसे हमारी अपनी धरती) पर स्थित हैं ये सभी ग्रह त्रेपिस्ट - 1 (TRAPPIST - I) नाम के तारे का चक्कर लगा रहे हैं. 

अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले दस वर्षों में शायद हम किसी एलियन (परग्रही) सभ्यता का पता लगा सकें, तब तक रोमांचित रहिये...

Sunday, January 29, 2017

प्लूटो के पाँच चन्द्रमा या उपग्रह

किसी समय सौर-परिवार में नौवे ग्रह के पद पर सुशोभित प्लूटो, भले ही अपनी ग्रह का पद खो चूका हो. परन्तु एक बौने या वामन ग्रह (Dwarf Planet) के रूप में इसका स्थान सबसे अलग है. प्लूटो आकार में हमारे चन्द्रमा से भी छोटा है, परन्तु इसके पास अपने एक या दो नहीं बल्कि पूरे पाँच चंद्रमाएं या उपग्रह हैं जो इसकी परिक्रमा करते रहते  हैं.



आज प्लूटो के इन चंद्रमाओं के बारे में, अपने ग्रह से दूरी के क्रम में, थोड़ा जानते हैं – 

शेरोन (Charon)
प्लूटो का सबसे आंतरिक या नजदीकी और सबसे बड़ा उपग्रह है – शेरोन (Charon). शेरोन की खोज जेम्स क्रिस्टी ने 22 जून 1978 में की थी. इस उपग्रह की खोज के बाद प्लूटो के बारे में धारणाएं बदलती चली गयी क्यूंकि उपग्रह की खोज के बाद की गयी नयी गणनाओं से पता चला की प्लूटो अपने अनुमानित आकार से काफी छोटा है.  शेरोन व्यास में प्लूटो के आधे से भी अधिक है और अपने ग्रह के साथ टाइडली लॉक्ड है, जिसके कारण दोनों के एक ही भाग हमेशा एक-दुसरे की ओर होता है. इनके बीच समानताओ की वजह से कई अन्तरिक्ष विज्ञानी इन्हें द्वितीयक ग्रह प्रणाली (Binary Planets) भी मानते हैं. पर अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ में इस बारे में एकमत न होने की वजह से इसे प्लूटो का उपग्रह ही माना जाता है. 



स्टाईक्स (Styx) – 
स्टाईक्स, प्लूटो से दूरी के क्रम में दूसरा उपग्रह है, परन्तु इसकी खोज सबसे अंत 11 जुलाई 2012 में की गयी थी. 



निक्स (Nix) – 
निक्स दूरी के क्रम में प्लूटो का तीसरे क्रम का उपग्रह है. यह प्लूटो के बाह्य परिक्षेत्र में परिक्रमा करता है.  इसकी खोज प्लूटो के सबसे दूर स्थित चन्द्रमा, हाईड्रा के साथ हबल स्पेस टेलिस्कोप की मदद से जून 2005 में की गयी थी. 





कर्बेरोस (Kerberos)
कर्बेरोस, प्लूटो का छोटा सा उपग्रह है जो की अधिकतम 12km चौड़ा है. खोज के क्रम में इसकी खोज चौथे स्थान पर हुयी थी. वैसे अपने ग्रह से दूरी के अनुसार भी इसका क्रम चौथा ही है. इसकी खोज की विधिवत घोषणा 20 जुलाई 2011 में हुयी थी. इसकी खोज प्लूटो कम्पैनियन सर्च टीम ने हबल स्पेस टेलिस्कोप की मदद से की थी.


हाईड्रा (Hydra)
हाईड्रा, प्लूटो का सबसे बाहरी ज्ञात उपग्रह है. इसकी खोज निक्स के साथ जून 2005 में की गयी थी. इसकी सतह संभवतः जलीय बर्फ से ढंकी हुयी है. 






न्यू होराइजन्स (New Horizons) ने अपने जुलाई 2015 फ्लाई-बाई के समय प्लूटो की सबसे नजदीकी तस्वीरों के साथ उसके चंद्रमाओं की भी तसवीरें ली थी. 

भारतीय डाक टिकटों में अन्तरिक्ष विज्ञान

असीम अन्तरिक्ष के अनंत विस्तार में समाये असंख्य रहस्यों ने मानव मन में सदा से ही उत्सुकता और आश्चर्य के दीप जला रखे हैं. ऐसे में रोजाना के जीवन में उपयोगी डाक टिकिटों में भला इन्हें कैसे स्थान नहीं मिलता. भारत तो वैसे भी आध्यात्म के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न राष्ट्र रहा है, तो आज बात करते हैं भारत में छपे ऐसे डाक टिकिटों की जिनमें अन्तरिक्ष विज्ञान के सराहनीय प्रयासों का सम्मान किया गया है  - 

(नीचे दी गयी जानकारियों में कोई गलती हो या आपके पास अधिक जानकारियाँ हों तो आपकी प्रविष्टियों का स्वागत है)


संभवतः अन्तरिक्ष विज्ञान को समर्पित सबसे पहला भारतीय डाक टिकिट 1969 में ‘चन्द्रमा पर मानव के पहले कदम’ के ऐतिहासिक पड़ाव को सम्मानित करते हुए प्रकाशित किया गया था. ‘चन्द्रमा पर मनुष्य के चरण (Man on the Moon) शीर्षक के साथ प्रकाशित इस डाक टिकिट की कीमत रखी गयी थी 20 पैसे.

इस प्रथम टिकिट के बाद काफी सारे और भी डाक टिकिट प्रकाशित किये
गए जिनमें से मेरी जानकारी में जो हैं उनका उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ – 
आर्वी उपग्रह भूमिकेंद्र (Arvi Satellite Earth Station) के नाम से 1972 में प्रकाशित डाक टिकिट जिसका मूल्य 20पैसे निर्धारित था. 



अन्तरिक्ष विज्ञान की दिशा में भारत के बढ़ते कदम का परिचायक 1975 में स्थापित हमारे पहले कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ को समर्पित डाक टिकिट (मूल्य 25 पैसे)


आर्यभट्ट, भले ही भारत का पहला उपग्रह था, परन्तु इसका प्रक्षेपण तत्कालीन सोवियत रूस के सहयोग से किया गया था. बाद में भारत ने स्वयं अपने उपग्रह प्रक्षेपण की तकनीक विकसित की और इसके अंतर्गत SLV राकेट का उपयोग किया गया., 1979 में प्रथम रोहिणी अभियान की आंशिक सफलता के बाद 1980 में रोहिणी श्रंखला के द्वितीय उपग्रह (RS-1) को सफलता पूर्वक स्लव लांच व्हीकल के माध्यम से प्रक्षेपित और स्थापित किया गया. इस महान उपलब्धि को सम्मानित करते हुए 1981 में एक डाक टिकिट जारी किया गया जिसमें SLV-3 और रोहिणी उपग्रह की तस्वीरें अंकित थीं. इसका मूल्य एक रूपया निर्धारित किया गया था. 

1982 में भारत के पहले दूरसंचार उपग्रह एप्पल उपग्रह (APPLE Satellite) पर दो रुपये मूल्य का एक डाक टिकिट जारी किया गया था. एप्पल का पूरा नाम था - The Ariane Passenger Payload Experiment और इसे यूरोपियन अंतरिक्ष संस्था के सहयोग से स्थापित किया गया था. 

अगले वर्ष विश्व संचार वर्ष 1983 (World Communications Day) पर डाक टिकिट का प्रकाशन एक रुपये मूल्य वर्ग में किया गया. APPLE के सफलतापूर्वक सञ्चालन के बाद भारत विश्व के प्रमुख संचार संपन्न देशों में शामिल जो हो चूका था. 




सोवियत संघ के द्वारा स्थापित विश्व के प्रथम अन्तरिक्ष केंद्र या स्पेस स्टेशन साल्युत (Salyut) का सम्मान करते हुए भारत ने 1984 में इस पर तीन रुपये मूल्य वर्ग का डाक टिकिट प्रकाशित किया था. 

अगले वर्ष 1985 में अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ, नई दिल्ली (International Astronomical union, New Delhi) के अंकन के साथ आवर्ती पुच्छल तारे हैली का धूमकेतु (Halley’s Comet) के आगमन का स्वागत एक रुपये मूल्य वर्ग वाले डाक टिकिट से किया गया.वैसे हैली धूमकेतु का हमारे आंतरिक सौर मंडल में आगमन 1986 में हुआ था, जब इसे पृथ्वी से देखा गया था.   

आगे भी जारी...जल्द ही, इस आशा के साथ 



Thursday, January 19, 2017

चन्द्रमा पर सबसे अंत में चले अन्तरिक्ष यात्री नहीं रहे :-(



चन्द्रमा पर मानवीय कदम पड़ने के बाद से धरती से अनेक अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर जाने का सु-अवसर मिला. इन सभी अंतरिक्ष यात्रियों में यूजीन एंड्रू सेरनन का अपना एक विशिष्ट स्थान है. उन्हें हमारे चन्द्र अभियान पर जाने का मौका दो बार मिला – सबसे पहले अपोलो – 10 अभियान और उसके बाद अपोलो – 17 में जो कि नासा का अंतिम मानवीय चन्द्र अभियान था. वे अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने तीन बार अन्तरिक्ष की यात्रा की थी. सबसे पहले जैमिनी – 9 AA के पायलट के रूप में और फिर दो अपोलो अभियान के सदस्यों के रूप में. वे चन्द्रमा पर चलने वाले अंतिम व्यक्ति रहे.
16 जनवरी 2017 के दिन 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.