Sunday, April 2, 2017

प्लेनेट X - हमारे सौरमंडल में छुपी अनदेखी -अनजानी दुनिया


नासा की पारिकल्पना में प्लेनेट X

आप में से कई लोगों ने बुध, शुक्र, मंगल और बृहस्पति को चमकते हुए आसमान में जरुर देखा होगा. ये तो हम सभी जानते हैं कि ग्रहों की अपनी रौशनी नहीं होती और वे अपने सितारे के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और इसी वजह से उन्हें देखा जा सकता है; पर क्या हो अगर किसी स्याह ग्रह को अपने सितारे से इतनी कम रौशनी मिल पाए की वो उसे ठीक से परावर्तित न कर सके तो - तब तो उस काले ग्रह को देखना संभव ही नहीं. आश्चर्य की बात है न - और कुछ हद तक असंभव भी लगता है. 

पर हमारे कुछ वैज्ञानिकों को इस बात पर पूरा यकीं है कि ऐसा कोई ग्रह है और वो भी और कहीं नहीं हमारे अपने सौर मंडल में. उनका मानना है कि हमारे सौर मंडल के सुदूर किनारे पर कोई बड़ा सा ग्रह चुपचाप छिपकर बैठा है. इस दुनिया के बारे में उनका मानना है कि यह हमारी धरती से तीन गुना अधिक विशाल और दस गुना भारी है जो कि अगर वाकई में हो, तो निर्विवाद रूप से हमारे सौर परिवार का नौंवा ग्रह बन सकता है.  


तो जब यह दीखता ही नहीं तो वैज्ञानिकों ने इसका पता लगाया कैसे? वैज्ञानिकों ने बौने ग्रहों और दुसरे पिंडों के पथ का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि कोई बड़ी सी चीज़ इनके परिक्रमा पथ को प्रभावित कर रही है और यह हो न हो कोई ग्रह ही है. 

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के ग्रेग लौलीन कहते हैं - "अगर हमारे सौर परिवार में कोई और ग्रह है तो फिर वह यही है, और अगर हम सहीं हुए तो यह परिणाम वाकई आश्चर्यचकित कर देने वाला होगा."

प्राचीन काल के बाद से अब तक हमारे सौर परिवार में केवल दो ही असली ग्रह ढूंढें जा सके है, प्रारंभ के सभी ग्रह प्राचीन काल से ही ज्ञात रहे हैं, तो अगर ये सच है तो हमें तीसरा नया ग्रह मिल जाएगा. वैज्ञानिकों को इसके होने पर इसलिए भी यकीं हैं क्योंकि अभी भी सौर मंडल का काफी भाग खोजा जाना बचा है और इसके आखिरी छोर के बारे में तो अभी हमें नगण्य ही मालूम है.  

वैसे इसकी दूरी के बारे में वैगानिकों की गणना बेहद दिलचस्प है. उनके अनुसार इसकी अत्यधिक दूरी की वजह से शायद इसको सूर्य की परिक्रमा करने में हजारों साल लगेंगे. अपनी सूर्य से नजदीकी में भी यह सूर्य-पृथ्वी की नजदीकी दूरी से कम से कम 2००-३०० गुणा ज्यादा दूर होगा ही. 


इसके सौर-क्षेत्र के अंतिम छोर पर होने के बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि यह रहस्यमय ग्रह बृहस्पति और शनि के गुरुत्वाकर्षण की वजह से अपने सुदूर स्थान पर सौपहुँच गया होगा. और यही सबसे विकट स्थिति है. इतनी दूर पर उस ग्रह को सूर्य प्रकाश का बेहद कम भाग मिलता होगा, इसलिए उससे परावर्तित होने वाला सौर प्रकाश इतना कम होगा की बड़े-बड़े दूरबीनों से भी उसे देखा जाना लगभग असंभव ही होगा.   
   
एक दूसरा कारण यह भी है कि आसपास के क्षेत्र में कई सारे पिंड हैं जो तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक चमकदार हैं. उदाहरण के लिए प्लूटो ही इस ग्रह से लगभग दस हजार गुना ज्यादा चमकीला माना जा रहा है. इसलिए ऐसी स्थिति में इसे खोजने का एकमात्र तरीका आस-पास के पिंडों की परिक्रमा पथ की गणना करना ही है. माइकल ब्राउन और कोंस्टेंटीन बेटिजिन के रिसर्च पेपर के अनुसार सुदूर क्षेत्र में कुछ तो ऐसा है जो वहां के पिंडों की गति में बाधा डाल रहा है. इन दोनों अन्वेषकों ने इस ग्रह की संभावना के बारे में पता लगाया जब वे इस क्षेत्र के पास के चट्टानीय पिंडों को देख रहे थे. उन्होंने पाया की ये चट्टान परिक्रमा करते नजर आ रहे थे जो यूँहीं संभव नहीं है. इससे वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सौर मंडल का कोई विशालकाय नौंवा ग्रह (प्लूटो अब ग्रह नहीं रहा है तो वर्तमान में सौरमंडल में केवल आठ ग्रह हैं) घने अँधेरे में अदृश्य सा बैठा हुआ है. 

वैसे इस रहस्यमय ग्रह के होने की सम्भावना सौ साल से भी अधिक से व्यक्त की जा रही है. और प्लूटो की खोज इसी ग्रह को खोजने की पहल के दौरान हुयी थी. इसका नाम वैज्ञानिकों ने प्लेनेट - एक्स (Planet X) रखा हुआ है. तो देखते हैं क्या वाकई बृहस्पति से भी बड़ा कोई ग्रह हमारे सौर परिवार में हैं, जिससे अभी तक हम अनजान है. अन्तरिक्ष में कुछ भी संभव है...इसलिए आशा कायम रखिये.

Saturday, April 1, 2017

गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b


गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b (NASA की कल्पना में)
आज से कुछ वर्ष पूर्व सन २००३ में हवाई में अन्तरिक्ष वज्ञानिकों ने हमारी दुनिया से लगभग 57 प्रकाश वर्ष दूर एक नए ग्रह की खोज की है जिसका रंग गहरा गुलाबी है. अनोखे रंग के साथ अद्भुत बात यह भी है कि यह ग्रह आकार में हमारे महाग्रह बृहस्पति के बराबर का है, परन्तु द्रव्यमान में तो उससे भी कई-कई गुना ज्यादा. इस खोज की एक रोचक बात और भी है और वह ये, कि इसकी खोज सीधे टेलिस्कोप से हुयी है न कि इसके तारे की स्थिति के अनुसार गणना करके. इस ग्रह का नाम वैज्ञानिकों ने GJ 504b रखा है. 

वैसे सच कहा जाए तो भले ही बृहस्पति हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है परन्तु सौर-मंडल के बाहर उसके इतने बड़े ग्रहों का मिलना बहुत ही सामान्य सी बात है. यूं कहा जाए कि हमारे वैज्ञानिकों ने सुदूर सितारों के परिवारों में ऐसे अनेक ग्रह ढूंढ निकाले हैं. इस ग्रह की जो सबसे अनोखी बात है कि यह अपने सितारे से लगभग 4.०५ बिलियन मील दूर स्थित है या यह कहें कि अगर हमारे सौरमंडल को मॉडल मानकर तुलना करें तो यह सूर्य और नेपच्यून की दूरी से भी दूर होगा.  

यहाँ से हमारे मेधावी अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए एक समस्या की शुरुआत होती है. ग्रहों की रचना याने उनके अपने आकार लेने के सम्बन्ध में अभी जो प्रचलित थ्योरी है उसे केन्द्रित या मूल अभिवृद्धि सिद्धांत (Core accretion theory) कहा जाता है. सामायतः बृहस्पति जैसे विशालकाय गैसीय ग्रह की रचना इस सिद्धांत से जानी जाती है. इसके अनुसार जब एक सितारा अपना रूप लेता है तब यह विशालकाय टुकड़ों के क्षेत्र से घिरा होता है.  किसी समय कोई धूमकेतु या क्षुद्र ग्रह इस क्षेत्र से आ टकराता है और विखंडित होकर कहीं अधिक विशालकाय संरचना का निर्माण करता है. यह प्रक्रिया चलती रहती है यानि यह टुकड़ों का क्षेत्र किसी और पिंड से टकराता रहता और और बढ़ता चला जाता है. जैसे जैसे यह संरचना और विशालकाय होती चली जाती है, इसका गुरुत्व क्षेत्र भी बढ़ता चला जाता है और यह उसे मलबे से गैसों और धूलकणों को केंद्र की ओर खीचने लगती है, और धीरे-धीरे गैसीय महाग्रह अपना रूप प्राप्त करता है. 

लेकिन GJ504b अपने सितारे से बहुत अधिक दूरी पर है - इस दूरी पर यह मलबा विशालकाय और घना न होकर छितरा हुआ होता है, जिससे विशालकाय ग्रह के निर्माण की संभावना इस सिद्धांत में संभव नहीं है. किन यह गुलाबी ग्रह अपनी दूरी और विशालता से इस सिद्धांत को चुनौती दे रहा है और वैज्ञानिक ग्रहों के निर्माण के बारे में पुनः सोचने विवश हो उठे हैं. 

देखिये, अन्तरिक्ष के गर्भ में दबे नए रहस्य हमारे ज्ञान को और कितनी चुनौतियां देते हैं...हमारे समर्पित और महान वैज्ञानिकों को श्रद्देय नमन के साथ ... अन्तरिक्ष का यह छोटा सा ज्ञान कोष जारी रहेगा...

Friday, March 31, 2017

वाष्पीकृत होता ग्रह CoRoT-2b

अन्तरिक्ष की दुनिया अद्भुत चीजों से भरी पड़ी है. लगातार विस्तृत होते अन्तरिक्ष में नित-नए चमत्कार होते रहते हैं. मानव अपने सीमित संसाधनों से इस असीमित दुनिया को जानने का प्रयत्न लगातार कर रहा है और जितना ही नया जानता है उतना और जानने को उत्सुक हो उठता है. रोचकता का इस क्षेत्र में अंत ही नहीं है.

एक ऐसा ही अद्भुत नजारा अन्तरिक्ष में है - अक्विला नक्षत्र समूह में स्थित ग्रह कोरोट-2b (CoRoT-2b). इस ग्रह पर गैसों का डेरा है जो लगातार घूर्णन गति में हैं - कुछ कुछ अपने बृहस्पति जैसा. पर जो बात इसे अलग बनती है वह है इसकी अपने सितारे से नजदीकी. इस ग्रह के बिलकुल नजदीक में इसका विशाल तप्त सूर्य अपना भयंकर मुंह खोले खड़ा है जिससे वह खतरनाक एक्स-रे विकिरण छोड़ रहा है. यह विकिरण हमारे सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्राप्त विकिरण से लाखों गुना ज्यादा है जिससे यह ग्रह लगातार अपने विनाश को ओर बढ़ रहा है . और तो और अन्धकार से भरे विशाल निशानों से भरा यह सितारा अपने गुरुत्वाकर्षण से इस ग्रह को नष्ट होने की कगार तक अपने समीप ले आया है.

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सितारे के इस अन्याधिक एक्स-किरण विकिरण की वजह से यह ग्रह वाष्पीकृत हो रहा है. यह विकिरण तीव्र गति से पवन भी उत्पन्न करता है जिससे ग्रह से कण अलग होकर अन्तरिक्ष में पहुँच रहे हैं. हर एक सेकंड में यह तीव्र पवन इस ग्रह के सतह से 4५ लाख टन कण उड़ा ले जा रहा है, मानों जैसे धूमकेतु के कोर या केन्द्रक से जैसे कण सूर्य की तेज ऊष्मा से वाष्पीकृत होते रहते हैं. किसी ग्रह पर ऐसे नज़ारे वाला दृश्य संभवतः पहली बार ज्ञात हुआ है.

वाकई, अन्तरिक्ष की दुनिया अनोखी और रोचकता से परिपूर्ण है. 

Wednesday, February 22, 2017

पृथ्वी सदृश्य सात नए ग्रहों की खोज



अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने सौर परिवार से बाहर एक या दो नहीं बल्कि पूरे नौ नए ग्रहों की खोज की घोषणा की है जो हमारी पृथ्वी के सदृश्य हैं, और इनमें से तीन तो अपने तारे से जीवन की प्रबल संभावनाओं इतनी दूरी (ऐसी दूरी जहाँ पर तरल रूप में द्रव कठोर धरातल के ऊपर स्थित हो, और ग्रह न तो ज्यादा गर्म हो और ना ही ज्यादा ठंडा जैसे हमारी अपनी धरती) पर स्थित हैं ये सभी ग्रह त्रेपिस्ट - 1 (TRAPPIST - I) नाम के तारे का चक्कर लगा रहे हैं. 

अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले दस वर्षों में शायद हम किसी एलियन (परग्रही) सभ्यता का पता लगा सकें, तब तक रोमांचित रहिये...

Sunday, January 29, 2017

प्लूटो के पाँच चन्द्रमा या उपग्रह

किसी समय सौर-परिवार में नौवे ग्रह के पद पर सुशोभित प्लूटो, भले ही अपनी ग्रह का पद खो चूका हो. परन्तु एक बौने या वामन ग्रह (Dwarf Planet) के रूप में इसका स्थान सबसे अलग है. प्लूटो आकार में हमारे चन्द्रमा से भी छोटा है, परन्तु इसके पास अपने एक या दो नहीं बल्कि पूरे पाँच चंद्रमाएं या उपग्रह हैं जो इसकी परिक्रमा करते रहते  हैं.



आज प्लूटो के इन चंद्रमाओं के बारे में, अपने ग्रह से दूरी के क्रम में, थोड़ा जानते हैं – 

शेरोन (Charon)
प्लूटो का सबसे आंतरिक या नजदीकी और सबसे बड़ा उपग्रह है – शेरोन (Charon). शेरोन की खोज जेम्स क्रिस्टी ने 22 जून 1978 में की थी. इस उपग्रह की खोज के बाद प्लूटो के बारे में धारणाएं बदलती चली गयी क्यूंकि उपग्रह की खोज के बाद की गयी नयी गणनाओं से पता चला की प्लूटो अपने अनुमानित आकार से काफी छोटा है.  शेरोन व्यास में प्लूटो के आधे से भी अधिक है और अपने ग्रह के साथ टाइडली लॉक्ड है, जिसके कारण दोनों के एक ही भाग हमेशा एक-दुसरे की ओर होता है. इनके बीच समानताओ की वजह से कई अन्तरिक्ष विज्ञानी इन्हें द्वितीयक ग्रह प्रणाली (Binary Planets) भी मानते हैं. पर अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ में इस बारे में एकमत न होने की वजह से इसे प्लूटो का उपग्रह ही माना जाता है. 



स्टाईक्स (Styx) – 
स्टाईक्स, प्लूटो से दूरी के क्रम में दूसरा उपग्रह है, परन्तु इसकी खोज सबसे अंत 11 जुलाई 2012 में की गयी थी. 



निक्स (Nix) – 
निक्स दूरी के क्रम में प्लूटो का तीसरे क्रम का उपग्रह है. यह प्लूटो के बाह्य परिक्षेत्र में परिक्रमा करता है.  इसकी खोज प्लूटो के सबसे दूर स्थित चन्द्रमा, हाईड्रा के साथ हबल स्पेस टेलिस्कोप की मदद से जून 2005 में की गयी थी. 





कर्बेरोस (Kerberos)
कर्बेरोस, प्लूटो का छोटा सा उपग्रह है जो की अधिकतम 12km चौड़ा है. खोज के क्रम में इसकी खोज चौथे स्थान पर हुयी थी. वैसे अपने ग्रह से दूरी के अनुसार भी इसका क्रम चौथा ही है. इसकी खोज की विधिवत घोषणा 20 जुलाई 2011 में हुयी थी. इसकी खोज प्लूटो कम्पैनियन सर्च टीम ने हबल स्पेस टेलिस्कोप की मदद से की थी.


हाईड्रा (Hydra)
हाईड्रा, प्लूटो का सबसे बाहरी ज्ञात उपग्रह है. इसकी खोज निक्स के साथ जून 2005 में की गयी थी. इसकी सतह संभवतः जलीय बर्फ से ढंकी हुयी है. 






न्यू होराइजन्स (New Horizons) ने अपने जुलाई 2015 फ्लाई-बाई के समय प्लूटो की सबसे नजदीकी तस्वीरों के साथ उसके चंद्रमाओं की भी तसवीरें ली थी.