Friday, December 30, 2016

चीन - चाँद के सुदूर क्षेत्र में जाने वाला पहला देश!

विगत वर्षों में चीन ने अपने अन्तरिक्ष अनुसन्धान कार्य में तेजी लायी है और चाँद पर जाने वाले चुनिन्दा देशों की कतार में खड़ा हो चूका है. परन्तु विगत दिनों चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अन्तरिक्ष योजना के अंतर्गत घोषणा की है कि वह चाँद के धरती से नजर ना आने वाले सुदूर या अँधेरे क्षेत्र (धरती से हम चाँद का केवल एक हिस्सा देख पाते हैं, दुसरे भाग की तस्वीर हमें अन्तरिक्ष में भेजे विभिन्न अभियानों से ही प्राप्त हुयी है)  में जाने का इच्छुक है और उसने 2018 के लिए प्रस्तावित इस अभियान की व्यापक तैयारियां भी प्रारंभ कर दी है. 

चाँद पर वैसे तो दर्जनों अभियानों के तहत विभिन्न अन्तरिक्ष यान (मानव रहित और मानवीय ) भेजे जा चुके हैं, परन्तु अगर चीन अपने अभियान में सफल हुआ तो वह ऐसा करने वाले विश्व का प्रथम देश बन जाएगा क्यूंकि अभी तक किसी भी अभियान में चाँद के सुदूर क्षेत्र में अन्तरिक्ष यान नहीं उतारा गया है. 

इस प्रस्तावित लूनर प्रोब का नाम चैंग-इ- 4 (Chang'e-4) रखा गया है. चीन अन्तरिक्ष में यान भेजने और उन्हें पुनः वापस लाने की तकनीक पर काम कर रहा है. इस अभियान के तहत चीन चन्द्रमा की धरातलीय संरचाने का अध्ययन करेगा और उसके धरातल से नमूने एकत्रित करेगा ताकि चन्द्रमा के बनने की प्रक्रिया के बारे में और विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सके. 

Sunday, October 16, 2016

स्पुतनिक २ - पहली बार जीवित प्राणी अन्तरिक्ष में

स्पुतनिक –  1 (Sputnik-1) के सफल प्रक्षेपण के साथ अन्तरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में प्रथम कदम बढाने के बाद उत्साहित सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने केवल 32 दिनों के अन्दर स्पुतनिक अभियान का दूसरा उपग्रह सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर विश्व को पुनः आश्चर्य में डाल दिया. इतने कम समय के भीतर दूसरा अभियान वैसे ही कम आश्चर्य की बात नहीं थी, पर इस अभियान की जो सबसे हैरत में डालने वाली बात थी इस अभियान में जीवित पशु को अन्तरिक्ष भेजना – दुसरे शब्दों में कहें तो मानव को अन्तरिक्ष भेजने की चुनौती का सामना करने की दिशा में पहला कदम . इस उपग्रह में लाइका (Laika) नामक कुतिया को अन्तरिक्ष भेजा गया और वह पहली ऐसी जीवित प्राणी बनी जो अन्तरिक्ष में पहुची, ये अलग बात है कि दुर्भाग्यवश वह अन्तरिक्ष में ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी. 

स्पुतनिक-2 (Sputnik-2), नामक विश्व का दूसरा कृत्रिम उपग्रह 3 नवम्बर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया. सोवियत संघ का यह उपग्रह लगभग 4 मीटर ऊँचा था जिसका उपरी आकर एक कोने की तरह का था. इस बार जीवित प्राणी के साथ इस उपग्रह में बहुत से नए यन्त्र लगाए गए थे ताकि यान के अनेक पहलुओं पर नजर रखी जा सके और उसे कण्ट्रोल किया जा सके.

इस यान में रेडियो ट्रांसमीटर, तापमान नियंत्रण करने के लिए प्रणाली, एक टेलीमेट्री प्रणाली, प्रोगाम इकाई जैसे कई यूनिट थे. लाइका के लिए एक अलग से केबिन बनाया गया था. इस उपग्रह से हरेक चक्कर में कुल 15 मिनट के लिए डाटा धरती में स्थित कण्ट्रोल रूम तक ट्रान्सफर किया जाता था. साथ ही इसमें सूर्य के विकिरण और कॉस्मिक किरणों के अध्ययन के लिए दो फोटोमीटर लगाए गए थे.

मजे की बात यह है कि संसार का पहला उपग्रह प्रक्षेपित कर पूरी दुनिया को स्तंभित कर देने वाले यह दोनों  अभियान (स्पुतनिक-1 और स्पुतनिक-2) सोवियत संघ के मुख्य उपग्रह प्लान का हिस्सा नहीं थे. मुख्य प्लान बाद में स्पुतनिक-3 के रूप में दुनिया के सामने आया. वास्तव में सोवियत संघ के मुख्य प्लान की सफलता में कुछ संदेह था क्यूंकि मुख्य उपग्रह का आकर बहुत बड़ा था. इसलिए इस बड़े पैमाने की योजना के बदले कोरोलेव (स्पुतनिक सीरीज के निर्माता) ने दो छोटे उपग्रह का प्रस्ताव रखा. एक बात और भी है कि स्पुतनिक सीरीज के इन दोनों उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की एक वजह अमेरिका से पहले अन्तरिक्ष क्षेत्र में बाजी मारने की भी थी, जिसमे वे पूर्ण रूप से सफल भी रहे.

इस अभियान की सबसे महत्पूर्ण सफलता किसी जीवित प्राणी को अन्तरिक्ष में सुरक्षित ले जाने की थी जिसमें यह मिशन सफल भी रहा. उस समय सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने लाइका के दस दिनों पर जीवित रहने की आशा की थी. कक्षा में उपग्रह के स्थापित होने के पश्चात् के प्रथम दो चक्कर तक लाइका पूर्णतः सुरक्षित थी परन्तु तीसरे चक्कर के पश्चात केबिन का तापमान बढ़ने लगा और कुछ ही घंटों में उच्च तापमान की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी. यह जानकारी सोवियत युग के बाद पता चली, उस समय यह बताया गया था कि वह लगभग एक सप्ताह तक जीवित थी.

स्पुतनिक-2 की एक प्रमुख खोज और रही थी – उसने धरती के रेडिएशन (विकिरण) बेल्ट का पता लगा लिया था और उससे होकर गुजरा भी. परन्तु वह कोई महत्वपूर्ण जानकारी न दे सकता क्यूंकि वह रुसी ट्रैकिंग स्टेशन से काफी दूर था. अन्यथा अन्तरिक्ष की दुनिया की एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज सोवियत संघ के नाम होती. यहाँ पर अमेरिका के पहले उपग्रह एक्स्प्लोरर–1 (Explorer-1) ने बाजी मार ली और इस बेल्ट का नाम वान-एलन बेल्ट (Van-Allen Radiation Belt) रखा गया.

अपनी यात्रा पूर्ण कर स्पुतनिक-2, 14अप्रैल 1958 को धरती पर वापस लौटा. सोवियत संघ के इन दोनों सफल अभियानों ने जहाँ सोवियत संघ के स्वप्न को मजबूती प्रदान की वहीं अमेरिका की नींद भी उड़ सी गयी. इन दोनों देशों के बीच लगी इस होड़ से अल्प समय में ही अनगिनत अन्तरिक्ष अभियान का एक लम्बा सिलसिला चल पड़ा और अन्तरिक्ष के प्रति दीवानगी बढती ही चली गयी.

स्पुतनिक I - संसार का पहला कृत्रिम उपग्रह


अनंत अन्तरिक्ष सदा से मानव को अपनी अबूझ दुनिया की ओर आकर्षित करते रहा है, और मानव ने भी अपने ग्रह से पार अन्तरिक्ष की असीमित परिधि में छुपे रहस्यों से पर्दा उठाने के अपने दृढ प्रयास में लगातार सफलताएं प्राप्त की हैं. सदियों से अनेक महान वैज्ञानिकों ने अन्तरिक्ष के बारे में हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी की परन्तु ४ अक्टूबर १९५७ का दिन इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण दिन था जब पहली बार धरती की सीमा को चीर कर मानव ने अपने दूत को अन्तरिक्ष में भेजा. इस दिन तात्कालिक सोवियत संघ के द्वारा निर्मित प्रथम कृत्रिम उपग्रह को धरती की अंडाकार लघु कक्षा (लगभग ५७७ किलोमीटर की दूरी पर) में सफलता पूर्वक स्थापित किया गया और पहली बार धरती को अपने चाँद के अलावा एक दूसरा उपग्रह मिला. इस उपग्रह का प्रक्षेपण साईट नं. 1 (बाद में गागरिन साईट नाम दिया gaya) से किया गया था. 


स्पुतनिक ५८ सेंटीमीटर व्यास का एक गोलाकार मानव निर्मित उपग्रह था जिसमें रेडियो पल्स को धरती पर भेजने के लिए कुल चार रेडियो ऐन्टेना लगे हुए थे. अन्तरिक्ष में सोवियत संघ की इस लम्बी छलांग ने चिर प्रतिद्वंद्वी अमेरिका की नींद उड़ा दी और इसी के साथ अन्तरिक्ष अभियान की होड़ चल पड़ी. और चाँद महीनों में ही अमेरिका ने भी अपना प्रथम कृत्रिम उपग्रह ३१ जनवरी १९५८ को प्रक्षेपित कर दिया. 

स्पुतनिक ने धरती के उपरी वातावरण के बारे में जानकारी जुटाने में वैज्ञानिकों की मदद की. परन्तु केवल तीन महीने कक्षा में रहने के बाद ४ जनवरी १९५८ को धरती के वातावरण में प्रवेश के समय यह जल गया. 
भले ही स्पुतनिक का जीवन काल और कार्य-क्षेत्र सीमित था परन्तु अन्तरिक्ष की असीम संभावनाओं के द्वार खोलने वाला यह उपग्रह इतिहास में हमेशा के लिए अपनी गौरवशाली उपस्थिति दर्ज करा गया. 

अमेरिकी फिल्मों और कॉमिक्स में हमेशा अन्तरिक्ष यात्राओं की चर्चा होती रही, परन्तु पहला कदम उठाकर सोवियत संघ ने पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया. इसके बाद लगी इस होड़ में नित नए उपग्रह प्रक्षेपण और मानव-अन्तरिक्ष अभियानों का सिलसिला चल निकला जिसने अन्तरिक्ष के बारे में हमारी समझ को और मजबूत किया.  

Wednesday, August 31, 2016

HD 164595 - पृथ्वी से 94 प्रकाशवर्ष दूर की दुनिया से मिला सिग्नल

मई २०१५ में रेडियो टेलिस्कोप से अन्वेषण करते रूसी अन्तरिक्ष अनुसन्धान कर्ताओं को HD 164595 नाम सौर प्रणाली से एक तीव्र रेडियो सिग्नल प्राप्त हुआ. 

रूसी वैज्ञानिकों के इस खुलासे के बाद इस सौर प्रणाली के एकमात्र ग्रह में जीवन की संभावनाओं को टटोला जा रहा है. 

यह प्रणाली हमसे ९४ प्रकाशवर्ष दूर है और एकमात्र ग्रह का आकर नेपच्यून जितना है. वैसे हमारी जानकारी के अनुसार यह ग्रह अपने सितारे से काफी नजदीक है, इसलिए जीवन संभव दिखता नहीं है.

भविष्य इस बारे में यकीनी तौर पर बताएगा, तब तक पड़ोसियों की उम्मीद पर...