Sunday, May 14, 2017

50 करोड़ प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक-दुसरे की ओर भागती आकाशगंगाओं की जोड़ी



अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था और यूरोपियन अन्तरिक्ष संस्था द्वारा विगत दिनों अद्भुत चित्र जारी किया गया . पृथ्वी से कल्पना से परे 50 करोड़ प्रकाशवर्ष की दूरी में स्थित हेयर तारामंडल के लिए गए इस चित्र में एक अद्भुत आकाशगंगा या गैलेक्सी (IRAS 06076-2139) नजर आ रही है. इस आकाशगंगा की सबसे ख़ास बात यह है कि यह एक नजर आने वाली आकाशगंगा वास्तव में दो आकाशगंगाएं हैं जो २० लाख किलोमीटर प्रति घंटे की तीव्र गति से एक दूसरी की ओर तेजी से बढ़ रही हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार इनकी गति इतनी अधिक तेज है कि इनका आपस में एक-दुसरे से विलय होकर एक आकाशगंगा का रूप लेना असंभव प्रतीत होता है.

इन आकाशगंगाओं के बीच केवल २० प्रकाशवर्ष की दूरी है जिसके कारण ये वर्त्तमान में दो अलग आकाशगंगाएं ही बनी हुई हैं और शायद आगे भी अलग ही रहेंगी. परन्तु इतनी कम दूरी की वजह से जब वे एक दुसरे के बिलकुल समीप से गुजरेंगी तो इनके रूप में तीव्र गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से विकृति आना अवश्यभावी है जो इनकी संरचना में बड़े पैमाने में परिवर्तन लेकर आएगा.

आप भी देखिये अतुल्य-अद्भुत-असीमित अन्तरिक्ष का यह खूबसूरत दृश्य.

मंगल ग्रह पर मानव बस्ती - बज एल्ड्रिन का भविष्य के प्रति दृष्टिकोण



मंगल ग्रह को आज वैज्ञानिक भविष्य का निवास स्थान मान रहे हैं और  नासा सहित विश्व की सभी अन्तरिक्ष संस्थाएं अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन ISS) को अन्तरिक्ष अध्ययन और मंगल ग्रह तक पहुचने के प्रयास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी मानते हैं, वहीँ अपोलो 11 अन्तरिक्ष अभियान के द्वारा चन्द्रमा की धरती पर कदम रखने वाले सबसे पहले मानवों में से एक बज एल्ड्रिन ऐसा नहीं सोचते.

एल्ड्रिन ने विगत 9 मई को मंगल पर मानव के सम्बन्ध में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि यदि नासा और उसके सहयोगी संस्थाएं मंगल पर मानव ले जाने के बारे में वास्तव में गंभीर हैं तो उन्हें जल्द से जल्द अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष केंद्र को बंद कर देना चाहिए. ऐसा कहने के पीछे उनकी वजह इस अभियान में प्रतिवर्ष आने वाला बहुत अधिक खर्च है. उनका मानना है कि नासा को निचली कक्षा से सम्बंधित कार्य निजी संस्थानों जैसे स्पेस-एक्स, ऑर्बिटल एटीके आदि को दे देना चाहिए. वैसे खुद नासा भी विगत दिनों में इन कंपनियों को अन्तरिक्ष केंद्र में सामान और इंधन के काम को सौंप कर उनके विचारों से सहमती प्रकट कर चुकी है.   

उनका कहना है कि इन कंपनियों को अन्तरिक्ष केंद्र से स्वतंत्र निचली कक्षाओं में ठिकाने बनाने चाहिए. उनका ये भी कहना है कि ये आउटपोस्ट 2020 में चीन के प्रस्तावित अन्तरिक्ष केंद्र के साथ समन्वय बनाकर चीन के साथ इस दिशा में सहयोग को आगे बढ़ा सकते हैं. इस तरह के निजी ठिकाने या केंद्र बनाना उनकी मंगल पर मानव बस्ती स्थापति करने के अभियान की रणनीति का पहला चरण है. उनका कहना है कि मंगल पर मंगल बस्ती बनाने का कार्य 'सायकलर (Cycler)'पर निर्भर होगा जो कि इन केन्द्रों  और मंगल के बीच मानव और सामग्रियां लाने ले जाने के प्रमुख साधन होंगे. 

इसके बाद आता है दूसरा चरण . बज एल्ड्रिन का कहना है कि इसके बाद हमें सबसे पहले मानवों को चन्द्रमा की यात्रा पर लाना-ले जाना होगा. इस कार्य के अंतर्गत लूनर बेस का निर्माण मुख्य होगा ताकि वहां पर मंगल में रहने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें और सम्बंधित तकनीक को पृथ्वी से दूर अन्तरिक्ष के वातावरण में परखा जा सके. 

अंतिम चरण में वे पृथ्वी और मंगल के बीच के लिए cyclers की बात करते हैं. उनके अनुसार ये सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगा. वे मानते हैं कि अगर इस योजना पर कार्य किया जाए तो पृथ्वी के पास के क्षुद्र ग्रहों पर मानवों को 2020 तक ले जाना संभव हो जाएगा और शायद २०३० तक मानव पर रहने मनुष्य पहुँच जाए. और अगर एल्ड्रिन का दृष्टिकोण सच हुआ तो मंगल पर जाने वाले ये मानव केवल यात्री नहीं होंगे वरन मंगल ग्रह के प्रथम स्थायी निवासी होंगे. 

है ना रोचक! देखिये भविष्य में क्या होता है. तब तक मंगल पर मानव बस्ती के रोचक ख्यालों में खो जाइए. 

Sunday, April 2, 2017

प्लेनेट X - हमारे सौरमंडल में छुपी अनदेखी -अनजानी दुनिया


नासा की पारिकल्पना में प्लेनेट X

आप में से कई लोगों ने बुध, शुक्र, मंगल और बृहस्पति को चमकते हुए आसमान में जरुर देखा होगा. ये तो हम सभी जानते हैं कि ग्रहों की अपनी रौशनी नहीं होती और वे अपने सितारे के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और इसी वजह से उन्हें देखा जा सकता है; पर क्या हो अगर किसी स्याह ग्रह को अपने सितारे से इतनी कम रौशनी मिल पाए की वो उसे ठीक से परावर्तित न कर सके तो - तब तो उस काले ग्रह को देखना संभव ही नहीं. आश्चर्य की बात है न - और कुछ हद तक असंभव भी लगता है. 

पर हमारे कुछ वैज्ञानिकों को इस बात पर पूरा यकीं है कि ऐसा कोई ग्रह है और वो भी और कहीं नहीं हमारे अपने सौर मंडल में. उनका मानना है कि हमारे सौर मंडल के सुदूर किनारे पर कोई बड़ा सा ग्रह चुपचाप छिपकर बैठा है. इस दुनिया के बारे में उनका मानना है कि यह हमारी धरती से तीन गुना अधिक विशाल और दस गुना भारी है जो कि अगर वाकई में हो, तो निर्विवाद रूप से हमारे सौर परिवार का नौंवा ग्रह बन सकता है.  


तो जब यह दीखता ही नहीं तो वैज्ञानिकों ने इसका पता लगाया कैसे? वैज्ञानिकों ने बौने ग्रहों और दुसरे पिंडों के पथ का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि कोई बड़ी सी चीज़ इनके परिक्रमा पथ को प्रभावित कर रही है और यह हो न हो कोई ग्रह ही है. 

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के ग्रेग लौलीन कहते हैं - "अगर हमारे सौर परिवार में कोई और ग्रह है तो फिर वह यही है, और अगर हम सहीं हुए तो यह परिणाम वाकई आश्चर्यचकित कर देने वाला होगा."

प्राचीन काल के बाद से अब तक हमारे सौर परिवार में केवल दो ही असली ग्रह ढूंढें जा सके है, प्रारंभ के सभी ग्रह प्राचीन काल से ही ज्ञात रहे हैं, तो अगर ये सच है तो हमें तीसरा नया ग्रह मिल जाएगा. वैज्ञानिकों को इसके होने पर इसलिए भी यकीं हैं क्योंकि अभी भी सौर मंडल का काफी भाग खोजा जाना बचा है और इसके आखिरी छोर के बारे में तो अभी हमें नगण्य ही मालूम है.  

वैसे इसकी दूरी के बारे में वैगानिकों की गणना बेहद दिलचस्प है. उनके अनुसार इसकी अत्यधिक दूरी की वजह से शायद इसको सूर्य की परिक्रमा करने में हजारों साल लगेंगे. अपनी सूर्य से नजदीकी में भी यह सूर्य-पृथ्वी की नजदीकी दूरी से कम से कम 2००-३०० गुणा ज्यादा दूर होगा ही. 


इसके सौर-क्षेत्र के अंतिम छोर पर होने के बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि यह रहस्यमय ग्रह बृहस्पति और शनि के गुरुत्वाकर्षण की वजह से अपने सुदूर स्थान पर सौपहुँच गया होगा. और यही सबसे विकट स्थिति है. इतनी दूर पर उस ग्रह को सूर्य प्रकाश का बेहद कम भाग मिलता होगा, इसलिए उससे परावर्तित होने वाला सौर प्रकाश इतना कम होगा की बड़े-बड़े दूरबीनों से भी उसे देखा जाना लगभग असंभव ही होगा.   
   
एक दूसरा कारण यह भी है कि आसपास के क्षेत्र में कई सारे पिंड हैं जो तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक चमकदार हैं. उदाहरण के लिए प्लूटो ही इस ग्रह से लगभग दस हजार गुना ज्यादा चमकीला माना जा रहा है. इसलिए ऐसी स्थिति में इसे खोजने का एकमात्र तरीका आस-पास के पिंडों की परिक्रमा पथ की गणना करना ही है. माइकल ब्राउन और कोंस्टेंटीन बेटिजिन के रिसर्च पेपर के अनुसार सुदूर क्षेत्र में कुछ तो ऐसा है जो वहां के पिंडों की गति में बाधा डाल रहा है. इन दोनों अन्वेषकों ने इस ग्रह की संभावना के बारे में पता लगाया जब वे इस क्षेत्र के पास के चट्टानीय पिंडों को देख रहे थे. उन्होंने पाया की ये चट्टान परिक्रमा करते नजर आ रहे थे जो यूँहीं संभव नहीं है. इससे वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सौर मंडल का कोई विशालकाय नौंवा ग्रह (प्लूटो अब ग्रह नहीं रहा है तो वर्तमान में सौरमंडल में केवल आठ ग्रह हैं) घने अँधेरे में अदृश्य सा बैठा हुआ है. 

वैसे इस रहस्यमय ग्रह के होने की सम्भावना सौ साल से भी अधिक से व्यक्त की जा रही है. और प्लूटो की खोज इसी ग्रह को खोजने की पहल के दौरान हुयी थी. इसका नाम वैज्ञानिकों ने प्लेनेट - एक्स (Planet X) रखा हुआ है. तो देखते हैं क्या वाकई बृहस्पति से भी बड़ा कोई ग्रह हमारे सौर परिवार में हैं, जिससे अभी तक हम अनजान है. अन्तरिक्ष में कुछ भी संभव है...इसलिए आशा कायम रखिये.

Saturday, April 1, 2017

गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b


गहरा गुलाबी ग्रह - GJ504b (NASA की कल्पना में)
आज से कुछ वर्ष पूर्व सन २००३ में हवाई में अन्तरिक्ष वज्ञानिकों ने हमारी दुनिया से लगभग 57 प्रकाश वर्ष दूर एक नए ग्रह की खोज की है जिसका रंग गहरा गुलाबी है. अनोखे रंग के साथ अद्भुत बात यह भी है कि यह ग्रह आकार में हमारे महाग्रह बृहस्पति के बराबर का है, परन्तु द्रव्यमान में तो उससे भी कई-कई गुना ज्यादा. इस खोज की एक रोचक बात और भी है और वह ये, कि इसकी खोज सीधे टेलिस्कोप से हुयी है न कि इसके तारे की स्थिति के अनुसार गणना करके. इस ग्रह का नाम वैज्ञानिकों ने GJ 504b रखा है. 

वैसे सच कहा जाए तो भले ही बृहस्पति हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है परन्तु सौर-मंडल के बाहर उसके इतने बड़े ग्रहों का मिलना बहुत ही सामान्य सी बात है. यूं कहा जाए कि हमारे वैज्ञानिकों ने सुदूर सितारों के परिवारों में ऐसे अनेक ग्रह ढूंढ निकाले हैं. इस ग्रह की जो सबसे अनोखी बात है कि यह अपने सितारे से लगभग 4.०५ बिलियन मील दूर स्थित है या यह कहें कि अगर हमारे सौरमंडल को मॉडल मानकर तुलना करें तो यह सूर्य और नेपच्यून की दूरी से भी दूर होगा.  

यहाँ से हमारे मेधावी अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए एक समस्या की शुरुआत होती है. ग्रहों की रचना याने उनके अपने आकार लेने के सम्बन्ध में अभी जो प्रचलित थ्योरी है उसे केन्द्रित या मूल अभिवृद्धि सिद्धांत (Core accretion theory) कहा जाता है. सामायतः बृहस्पति जैसे विशालकाय गैसीय ग्रह की रचना इस सिद्धांत से जानी जाती है. इसके अनुसार जब एक सितारा अपना रूप लेता है तब यह विशालकाय टुकड़ों के क्षेत्र से घिरा होता है.  किसी समय कोई धूमकेतु या क्षुद्र ग्रह इस क्षेत्र से आ टकराता है और विखंडित होकर कहीं अधिक विशालकाय संरचना का निर्माण करता है. यह प्रक्रिया चलती रहती है यानि यह टुकड़ों का क्षेत्र किसी और पिंड से टकराता रहता और और बढ़ता चला जाता है. जैसे जैसे यह संरचना और विशालकाय होती चली जाती है, इसका गुरुत्व क्षेत्र भी बढ़ता चला जाता है और यह उसे मलबे से गैसों और धूलकणों को केंद्र की ओर खीचने लगती है, और धीरे-धीरे गैसीय महाग्रह अपना रूप प्राप्त करता है. 

लेकिन GJ504b अपने सितारे से बहुत अधिक दूरी पर है - इस दूरी पर यह मलबा विशालकाय और घना न होकर छितरा हुआ होता है, जिससे विशालकाय ग्रह के निर्माण की संभावना इस सिद्धांत में संभव नहीं है. किन यह गुलाबी ग्रह अपनी दूरी और विशालता से इस सिद्धांत को चुनौती दे रहा है और वैज्ञानिक ग्रहों के निर्माण के बारे में पुनः सोचने विवश हो उठे हैं. 

देखिये, अन्तरिक्ष के गर्भ में दबे नए रहस्य हमारे ज्ञान को और कितनी चुनौतियां देते हैं...हमारे समर्पित और महान वैज्ञानिकों को श्रद्देय नमन के साथ ... अन्तरिक्ष का यह छोटा सा ज्ञान कोष जारी रहेगा...

Friday, March 31, 2017

वाष्पीकृत होता ग्रह CoRoT-2b

अन्तरिक्ष की दुनिया अद्भुत चीजों से भरी पड़ी है. लगातार विस्तृत होते अन्तरिक्ष में नित-नए चमत्कार होते रहते हैं. मानव अपने सीमित संसाधनों से इस असीमित दुनिया को जानने का प्रयत्न लगातार कर रहा है और जितना ही नया जानता है उतना और जानने को उत्सुक हो उठता है. रोचकता का इस क्षेत्र में अंत ही नहीं है.

एक ऐसा ही अद्भुत नजारा अन्तरिक्ष में है - अक्विला नक्षत्र समूह में स्थित ग्रह कोरोट-2b (CoRoT-2b). इस ग्रह पर गैसों का डेरा है जो लगातार घूर्णन गति में हैं - कुछ कुछ अपने बृहस्पति जैसा. पर जो बात इसे अलग बनती है वह है इसकी अपने सितारे से नजदीकी. इस ग्रह के बिलकुल नजदीक में इसका विशाल तप्त सूर्य अपना भयंकर मुंह खोले खड़ा है जिससे वह खतरनाक एक्स-रे विकिरण छोड़ रहा है. यह विकिरण हमारे सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्राप्त विकिरण से लाखों गुना ज्यादा है जिससे यह ग्रह लगातार अपने विनाश को ओर बढ़ रहा है . और तो और अन्धकार से भरे विशाल निशानों से भरा यह सितारा अपने गुरुत्वाकर्षण से इस ग्रह को नष्ट होने की कगार तक अपने समीप ले आया है.

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सितारे के इस अन्याधिक एक्स-किरण विकिरण की वजह से यह ग्रह वाष्पीकृत हो रहा है. यह विकिरण तीव्र गति से पवन भी उत्पन्न करता है जिससे ग्रह से कण अलग होकर अन्तरिक्ष में पहुँच रहे हैं. हर एक सेकंड में यह तीव्र पवन इस ग्रह के सतह से 4५ लाख टन कण उड़ा ले जा रहा है, मानों जैसे धूमकेतु के कोर या केन्द्रक से जैसे कण सूर्य की तेज ऊष्मा से वाष्पीकृत होते रहते हैं. किसी ग्रह पर ऐसे नज़ारे वाला दृश्य संभवतः पहली बार ज्ञात हुआ है.

वाकई, अन्तरिक्ष की दुनिया अनोखी और रोचकता से परिपूर्ण है.